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बांग्लादेशी बताने वाली मशीन का सच: UP में ‘ऑपरेशन घुसपैठिया’ की पड़ताल

नागरिकता साबित करने की जद्दोजहद के बीच, बुनियादी सुविधाओं के लिए परेशान प्रवासी मजदूर.

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तारीख- 23 दिसंबर 2025. जगह- गाजियाबाद का कौशाम्बी. नीले चितकबरे कपड़े में रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) के जवान और खाकी वर्दी में कुछ पुलिस वाले एक झुग्गी झोपड़ी में पहुंचते हैं. तब ही वहां रह रहे लोगों से पुलिस वाले कहते हैं- "बांग्लादेशी हो? पीठ पर मशीन लगाओ. मशीन तो बांग्लादेशी बता रही है."

दरअसल, इन दिनों अवैध रूप से भारत में रह रहे बांग्लादेशी, रोहिंग्या रेफ्यूजीस और अवैध नागरिकों को ढूंढने का अभियान चल रहा है. कहीं ऑपरेशन टॉर्च तो कहीं ऑपरेशन घुसपैठिया चलाया जा रहा है. पुलिस झुग्गियों में जाकर अवैध नागरिकों की पहचान कर रही है, हालांकि इस अभियान का असर भारत के अपने नागरिकों पर भी देखने को मिल रहा है.

दिल्ली से लेकर उत्तर प्रदेश में असम के रहने वाले मुसलमानों को शक की नजर से देखा जा रहा है तो कहीं बांग्ला बोलने लोगों पर बांग्लादेशी होने का आरोप लगाया जा रहा है.

क्या सच में बांग्लादेशी मिले?

23 दिसंबर की घटना का वीडियो वायरल होने के बाद द क्विंट की टीम गाजियाबाद के कौशांबी और बोहापुर इलाके में गई. जहां पुलिस ने अवैध नागरिकों को ढूंढ़ने का अभियान चलाया था. इस बीच हमारी मुलाकात वीडियो में दिख रही रोशनी खातून से हुई.

रोशनी खातून ने बताया कि वे बिहार के अररिया जिले की रहने वाली हैं और पिछले 14-15 सालों से यहीं रह रही हैं. रोशनी के मुताबिक, "पुलिस ने उनके परिजनों से आईडी मांगी और मजाक में उन्हें बांग्लादेशी बताया, जिससे पूरी बस्ती में डर फैल गया है. पुलिस वालों ने खुद ही वीडियो बनाया था, और खुद ही वीडियो वायरल किया. हम तो जानते भी नहीं थे."

रोशनी के जीजा "मोहम्मद कैसर आलम" ने बताया,

"पुलिस वाले पीठ पर मोबाइल रखकर बोल रहे थे कि 'मशीन तो तुम्हें बांग्लादेशी बता रही है, सच-सच बताओ कि तुम बांग्लादेशी हो या हिंदुस्तानी?' जब उन्होंने मेरी पीठ पर फोन लगाया, तो मैंने कहा कि मैं बांग्लादेशी नहीं, इंडियन हूं."

कैसर आगे कहते हैं, "उस दिन के बाद से कोई पुलिस वाले तो नहीं आए, लेकिन मीडिया वाले लगातार आ रहे हैं. कुछ मीडिया वाले अच्छे हैं जो तमीज से बात करते हैं, लेकिन बीच में एक ऐसे पत्रकार भी आए जो बहुत बदतमीजी कर रहे थे. वे पूछ रहे थे कि यहां तुम्हारा क्या है? यहां क्यों रहते हो? किसको किराया देते हो? तुम्हारा यहां क्या गड़ा है? वे इस तरह की उल्टी-सीधी बातें कर रहे थे."

पुलिस की कार्रवाई और आधिकारिक रुख

वीडियो वायरल होने के बाद इंदिरापुरम के एसीपी ने बताया कि वीडियो में दिख रहे एसएचओ (SHO) अजय कुमार शर्मा को सख्त चेतावनी दी गई है. उन्होंने कहा,

सोशल मीडिया के माध्यम से एक वीडियो संज्ञान में आया है. जांच में पाया गया कि यह वीडियो थाना कौशांबी क्षेत्र में पुलिस टीम द्वारा किए जा रहे 'एरिया डोमिनेशन' के समय का है. इस दौरान अस्थाई बस्तियों और झुग्गियों में रहने वाले निवासियों से पूछताछ और सत्यापन किया जा रहा था. वीडियो में थाना प्रभारी निवासियों से वार्ता कर रहे हैं. उक्त संदर्भ में उन्हें सख्त चेतावनी दी गई है कि भविष्य में ऐसे व्यवहार की पुनरावृत्ति न हो. तथ्यों की जांच कर अग्रिम कार्रवाई की जा रही है.
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वहीं इस मामले पर अजय शर्मा ने कहा, "हमारी यह सामान्य जांच थी. हम बांग्लादेशी घुसपैठियों की जांच नहीं कर रहे थे. जैसे बच्चों को कहा जाता है कि चुप हो जाओ, नहीं तो पुलिस आ जाएगी. वैसा ही एक सामान्य मामला था. इसमें न तो कोई गाली गलौज हुई और न ही किसी को धमकाया गया. सब कुछ सामान्य तरीके से हुआ. झुग्गी-बस्तियों में इस तरह की जांच पांच, दस या पंद्रह दिन में होती रहती है. इस दौरान यह देखा जाता है कि कोई संदिग्ध व्यक्ति तो नहीं रह रहा है, कोई जिला बदर तो नहीं है, कोई हिस्ट्रीशीटर तो नहीं है, या कहीं बाहर अपराध करके यहां छुपा तो नहीं हुआ है. यह सोसाइटी में भी होती है."

"काम की तलाश में बंगाल से आए हैं, बांग्लादेशी नहीं हैं"

'द क्विंट' की टीम कौशांबी के भोवापुर स्थित एक स्लम एरिया में भी पहुंची, जहां ज्यादातर बिहार और बंगाल से काम की तलाश में आए मजदूर रहते हैं. यहा. भी लोगों ने बताया कि बांग्लादेशी घुसपैठियों के नाम पर पुलिस पूछताछ कर रही है. एक निवासी ने बताया,

पुलिस आई थी और उनके साथ सीआरपीएफ (CRPF) के जवान भी थे, जो छानबीन कर रहे थे.

बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष

एक तरफ जहां इन लोगों को अपनी नागरिकता साबित करने के लिए पुलिस की पूछताछ का सामना करना पड़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ ये लोग पीने के पानी और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाओं के अभाव में जी रहे हैं. लोगों को ठेले पर ड्रम रखकर दूर से पानी लाना पड़ता है और हर बार शौचालय इस्तेमाल करने के लिए पैसे देने पड़ते हैं.

यह स्थिति दर्शाती है कि सुरक्षा और पहचान के नाम पर चल रहे अभियानों में अक्सर समाज का सबसे गरीब तबका ही पिसता है.

इन झुग्गियों में रहने वाले मजदूरों की स्थिति उस मुसाफिर की तरह है, जो बरसों से एक सराय को अपना घर समझकर उसकी सेवा कर रहा है, लेकिन अचानक एक दिन उससे उसकी विरासत का ऐसा सबूत मांगा जाता है जो वक्त की धूल में कहीं ओझल हो चुका है.

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