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मोदी सरकार आखिर डेटा क्यों छिपा रही है और इससे किसे फायदा हो रहा है?

क्या आप जानते हैं कि जनगणना, हेट क्राइम, जीडीपी ग्रोथ, कोविड से हुई मौतें, AQI और ‘वोट चोरी’ में क्या समानता है?

आकृति हांडा
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<div class="paragraphs"><p><strong>जनगणना, अपराध के आंकड़े, हेट क्राइम, घरेलू खपत, भारत की असली जीडीपी (GDP), रोज़गार, कोविड से हुई मौतें, एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) और कांग्रेस के 'वोट चोरी' के आरोपों में क्या समानता है?</strong></p></div>
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जनगणना, अपराध के आंकड़े, हेट क्राइम, घरेलू खपत, भारत की असली जीडीपी (GDP), रोज़गार, कोविड से हुई मौतें, एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) और कांग्रेस के 'वोट चोरी' के आरोपों में क्या समानता है?

(इमेज क्रेडिट: द क्विंट/@अरूप मिश्रा)

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जनगणना (Census), अपराध के आंकड़े, हेट क्राइम, घरेलू खर्च, देश की जीडीपी (GDP), रोजगार, कोविड से हुई मौतें, हवा की क्वालिटी (AQI) और कांग्रेस का 'वोट चोरी' का आरोप- क्या आप जानते हैं इन सबमें क्या कॉमन है?

जवाब है: मोदी सरकार द्वारा डेटा (आंकड़ों) को लेकर अपनाई गई 'ना' की नीति.

हालात ये हैं कि या तो सरकार ने लंबे समय से आंकड़े जुटाए ही नहीं, या फिर डेटा मौजूद ही नहीं है. कभी आंकड़े गिनने का तरीका ग्लोबल स्टैंडर्ड के हिसाब से नहीं होता, तो कभी सरकार दुनिया भर की रिपोर्ट्स को ही सिरे से खारिज कर देती है. अक्सर ऐसा भी देखा गया है कि सरकार डेटा को दबाकर बैठ जाती है.

हद तो तब हो गई जब केंद्र सरकार ने हाल ही में संसद में बताया कि उनके पास पिछले 5 सालों की RTI (सूचना का अधिकार) को लेकर भी कोई डेटा नहीं है. सरकार का कहना है कि कितने RTI आवेदन बिना जानकारी दिए लौटाए गए या रिजेक्ट हुए, इसका हिसाब केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) रखता ही नहीं है.

अब सवाल यह उठता है कि आखिर मोदी सरकार इतने जरूरी आंकड़े जुटा क्यों नहीं रही है? आलम यह है कि पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम समेत कांग्रेस के कई दिग्गज नेता अक्सर तंज कसते हुए कहते हैं कि NDA का असली मतलब है- "No Data Available".

लेकिन याद रखिए, आंकड़े न होने का मतलब यह नहीं है कि समस्या खत्म हो गई है. जब ये बेसिक डेटा ही मौजूद नहीं है, तो मोदी सरकार यह कैसे तय कर रही है कि किन लोगों को मदद की सबसे ज्यादा जरूरत है? जनता के टैक्स के पैसे से चलने वाली जन-कल्याणकारी योजनाएं (Welfare Schemes) सही लाभार्थियों तक पहुंच भी रही है या नहीं, इसका पता कैसे चल रहा है?

इस रिपोर्ट में हम विस्तार से समझेंगे कि कैसे सरकार की इस 'डेटा से दूरी' का खामियाजा आम नागरिकों को भुगतना पड़ रहा है.

जनगणना

हाल ही में भारत जापान को पीछे छोड़ते हुए दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है. लेकिन क्या होगा अगर मैं आपसे कहूं कि हमारी 4.18 ट्रिलियन डॉलर की यह इकोनॉमी अपने ज्यादातर बड़े फैसले सिर्फ 'अंदाजों' के दम पर ले रही है? क्या आप मानेंगे कि करोड़ों की सरकारी योजनाएं पुराने और बासी आंकड़ों के भरोसे चल रही हैं?

ऐसा इसलिए है, क्योंकि जब 2027 में भारत की नई जनगणना (Census) के आंकड़े आएंगे, तब तक 15 साल से ज्यादा का वक्त बीत चुका होगा. नियम के मुताबिक हर 10 साल में जनगणना होनी चाहिए. आखिरी बार यह 2011 में हुई थी और अगली 2021 में होनी थी, लेकिन कोविड महामारी के बहाने इसे टाल दिया गया और अब तक नहीं कराया गया.

दिसंबर 2025 में, केंद्रीय कैबिनेट ने 11,718.24 करोड़ रुपये के बजट के साथ 'जनगणना 2027' के प्रस्ताव को मंजूरी दी. सरकार ने यह भी ऐलान किया कि इस बार जनगणना में जातिगत गणना भी शामिल होगी.

जनगणना क्यों इतनी जरूरी है?

जनगणना किसी भी सरकार के कामकाज की रीढ़ होती है. इसी से सरकार को पता चलता है कि:

  • देश के हर घर में कितने लोग हैं, उनकी उम्र क्या है, जेंडर क्या है और (अब) उनकी जाति क्या है.

  • हाउसिंग, शहरीकरण, पलायन (Migration) और कामकाजी लोगों की स्थिति क्या है.

  • सरकारी योजनाओं का फायदा असल में किसे मिलना चाहिए.

  • विधानसभा और लोकसभा सीटों का परिसीमन (Delimitation) कैसे होगा.

  • राज्यों और नगर निकायों को कितना बजट दिया जाना चाहिए.

  • बिना जनगणना, हर सरकारी पॉलिसी महज एक 'अनुमान' है.

भारत ने जनगणना में देरी के लिए कोविड लॉकडाउन का हवाला दिया. लेकिन अमेरिका, ब्रिटेन, ब्राजील, इंडोनेशिया और बांग्लादेश जैसे देशों ने महामारी के बीच (2020 से 2022 के दौरान) अपनी जनगणना पूरी कर ली.

वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक अर्थशास्त्री औनिंद्यो चक्रवर्ती कहते हैं:

भारत के डेटा कलेक्शन में सबसे बड़ी नाकामी जनगणना का न होना है. जनगणना कोई छोटा-मोटा सर्वे नहीं है, यह घर-घर जाकर जुटाया गया डेटा है. यह 100 लोगों को चुनकर पूरे देश का अंदाजा लगाने जैसा नहीं है, बल्कि इसमें हर एक पहलू को देखा जाता है. इसके बिना हम महंगाई का सही अंदाजा तक नहीं लगा सकते, क्योंकि जनगणना से ही पता चलता है कि लोग किन चीजों पर खर्च कर रहे हैं. बिना इसके हमें सच कैसे पता चलेगा?

घरेलू खर्च

एक और बेहद जरूरी डेटा है कंज्यूमर एक्सपेंडिचर सर्वे (उपभोक्ता व्यय सर्वेक्षण). यह सर्वे सरकार को बताता है कि लोग कैसे रह रहे हैं, क्या खा रहे हैं, कितना कमा रहे हैं और कहां खर्च कर रहे हैं. 2011 तक यह सर्वे हर पांच साल में एक बार होता था.

2017-18 में भी यह सर्वे हुआ और 2019 में इसकी रिपोर्ट आने वाली थी, लेकिन सरकार ने "डेटा की क्वालिटी खराब है" कहकर खारिज दिया. हालांकि, उस वक्त लीक हुई एक ड्राफ्ट रिपोर्ट से पता चला था कि ग्रामीण भारत में लोगों का खर्च कम हुआ है और गरीबी बढ़ी है.

इसके बाद, 2022 में सरकार एक नया सर्वे लेकर आई, जिसकी रिपोर्ट फरवरी 2024 में जारी की गई.

मतलब पूरे 10 साल तक मोदी सरकार के पास गरीबी या घरेलू खर्च का कोई आधिकारिक और अपडेटेड डेटा नहीं था. इसी दौरान सरकार गरीबों के लिए एक के बाद एक योजनाएं लाती रही. सबसे बड़ी बात यह है कि इसी बीच 2020 से 2022 का कोविड काल भी गुजरा, जब इस डेटा की सबसे ज्यादा जरूरत थी ताकि यह पता चल सके कि:

  • महामारी के दौरान कितने और लोग गरीबी रेखा के नीचे चले गए?

  • सबसे कमजोर तबकों की कमर कितनी टूटी?

  • कितने लोगों का रोजगार छिन गया?

नतीजा यह निकला कि जो लोग सरकारी मदद के हकदार थे, वे सिर्फ इसलिए बाहर रह गए क्योंकि उन्हें गिना ही नहीं गया था.

जब हमने पूछा कि बिना इन आंकड़ों के सरकार यह कैसे तय कर रही है कि मदद सही लोगों तक पहुंच रही है, तो वरिष्ठ पत्रकार औनिंद्यो चक्रवर्ती का तर्क बड़ा दिलचस्प था. उन्होंने कहा,

मेरा मानना है कि डेटा उपलब्ध है और वह चुनाव नतीजों के रूप में है. साफ तौर पर, अगर हर जगह गरीबों ने मौजूदा सरकार को वोट दिया है, तो इसका मतलब है कि योजनाओं का लाभ उन तक पहुंचा है. हम जानते हैं कि जब बिहार में 10,000 रुपये दिए गए, तो सत्तारूढ़ सरकार ने दोबारा सत्ता में लौटी.

वे आगे कहते हैं, "सब्सिडी पहुंचाने में सरकार को कुछ हद तक कामयाबी मिली है, जो अलग-अलग जगहों पर उनके लिए जनसमर्थन के रूप में दिखता है. और जहां सरकार फेल होती है, वहां उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है."

हालांकि, चक्रवर्ती ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया. उन्होंने 'द क्विंट' से कहा "सर्वे हो रहे हैं, लेकिन उन्हें पब्लिक नहीं किया जा रहा. डेटा इकट्ठा तो किया जा रहा है, पर असली सवाल यह है कि उस डेटा तक पहुंच (Access) किसकी है?"

कोविड से मौतें

यह कहना गलत नहीं होगा कि कोविड महामारी के दौरान मोदी सरकार ने सिर्फ देश को ही नहीं, बल्कि उससे जुड़े तमाम आंकड़ों को भी 'लॉकडाउन' में डाल दिया था.

याद कीजिये, कैसे देशव्यापी लॉकडाउन ने प्रवासी मजदूरों को हजारों किलोमीटर पैदल अपने गांवों की ओर चलने पर मजबूर कर दिया था. वही मंजर जिसे इस साल ऑस्कर में भारत की आधिकारिक एंट्री 'होमबाउंड' (Homebound) में बखूबी दिखाया गया है. लेकिन, जब संसद में उन मजदूरों के बारे में पूछा गया जिन्होंने इस सफर में अपनी जान गंवाई, तो सरकार का सपाट जवाब था "हमारे पास ऐसा कोई डेटा नहीं है."

इतना ही नहीं, जब सरकार से उन स्वास्थ्य कर्मियों, पुलिसवालों और सफाई कर्मचारियों की संख्या पूछी गई जिन्होंने ड्यूटी करते हुए अपनी जान दे दी, तो सरकार के पास फिर कोई जवाब (डेटा) नहीं था.

फरवरी 2021 में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने संसद में बताया कि सरकार के पास इस बात का कोई डेटा नहीं है कि महामारी के दौरान कितने सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग (MSMEs) बंद हुए. हैरानी की बात यह है कि उसी दौरान बीजेपी सरकार 'आत्मनिर्भर भारत अभियान' के तहत इन्हीं उद्योगों के लिए बड़ी-बड़ी योजनाओं का ऐलान कर रही थी. सालों बाद मार्च 2025 में जाकर राज्य मंत्री शोभा करंदलाजे ने राज्यसभा को बताया कि 2020 से 2024 के बीच 75,000 से ज्यादा MSME बंद हो गए.

साल 2022 में जब स्वास्थ्य मंत्रालय से ऑक्सीजन की कमी के कारण हुई मौतों का डेटा मांगा गया, तो केंद्र ने पल्ला झाड़ते हुए कहा कि उन्होंने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से जानकारी मांगी थी. कुछ ने जवाब दिया, लेकिन किसी ने भी ऑक्सीजन की कमी से एक भी मौत होने की पुष्टि नहीं की.

पिछले साल मई में, जब भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध जैसे हालात थे, सरकार ने चुपचाप जन्म और मृत्यु के आंकड़े जारी किए. इनसे पता चला कि 2021 में भारत में सामान्य से करीब 20 लाख ज्यादा मौतें हुईं.

इस पर स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारियों का कहना था कि ये सभी मौतें सीधे तौर पर कोविड से नहीं हुई थीं. उनके मुताबिक, इसमें "रिपोर्टेड और अनरिपोर्टेड कोविड मौतें, अन्य बीमारियों से हुई मौतें और महामारी के अप्रत्यक्ष प्रभाव" सब शामिल थे.

आर्थिक विकास

अभी हमने आंकड़ों को कम करके आंकने (undercounting) की बात की, अब बात करते हैं बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने की, खासकर भारत की जीडीपी (GDP) ग्रोथ की.

प्रधानमंत्री मोदी के कार्यभार संभालने के कुछ ही महीनों बाद, उनकी सरकार ने जीडीपी मापने का आधार वर्ष (Base Year) और तरीका (Methodology) दोनों बदल दिए. इसका तुरंत नतीजा यह हुआ कि जीडीपी के आंकड़े ऊंचे दिखने लगे. लेकिन दिक्कत ये हुई कि इस नए तरीके से मोदी सरकार की ग्रोथ की तुलना कांग्रेस वाली यूपीए (UPA) सरकार के दौर से करना नामुमकिन हो गया (क्योंकि पुरानी सीरीज का डेटा नवंबर 2018 तक जारी ही नहीं किया गया).

यहां तक कि उस समय के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन ने भी दावा किया था कि नए तरीके की वजह से भारत की ग्रोथ को कम से कम 2.5% बढ़ाकर दिखाया गया है.

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नवंबर 2025 में, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने भारत के वित्तीय डेटा की क्वालिटी और आंकड़ों की शुद्धता पर "C" ग्रेड दिया जो कि दूसरा सबसे खराब ग्रेड है. IMF ने टोकते हुए कहा कि भारत आज भी 2011-12 को ही आधार वर्ष मानकर जीडीपी माप रहा है, जबकि पिछले एक दशक में अर्थव्यवस्था का ढांचा पूरी तरह बदल चुका है. इसकी वजह से अर्थशास्त्रियों और नीति निर्माताओं को भारतीय अर्थव्यवस्था की सही और ताजा तस्वीर नहीं मिल पा रही है.

वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक अर्थशास्त्री औनिंद्यो चक्रवर्ती कहते हैं:

हमारा सिस्टम पुराना नहीं है, बल्कि सिस्टम ही गलत है. हमने IMF की वो बातें मान लीं जो हमें नहीं माननी चाहिए थीं. पुराने तरीके में अगर भारत ने 100 रुपये की 1000 शर्ट बनाईं, तो उत्पादन 1 लाख रुपये हुआ. अगले साल शर्ट घटकर 800 रह गईं लेकिन कीमत बढ़कर 150 रुपये हो गई, तो कुल उत्पादन 1,20,000 रुपये दिखेगा यानी 20% की ग्रोथ. लेकिन हकीकत में तो उत्पादन 20% गिर गया है! अब असल उत्पादन (Real Output) नहीं मापा जा रहा. कैलकुलेशन का यह एक बुनियादी संकट है.

अगर अमेरिका या ब्रिटेन से तुलना करें, तो भारत का आधार वर्ष पुराना है और महंगाई को मापने का तरीका भी दोषपूर्ण है. आरोप है कि इससे महंगाई कम और अर्थव्यवस्था की मजबूती जरूरत से ज्यादा दिखाई देती है.

जब औनिंद्यो चक्रवर्ती से पूछा गया कि क्या यह जीडीपी ग्रोथ जमीन पर महसूस हो रही है, तो उन्होंने कहा, "अगर कंपनियों का मुनाफा बहुत बढ़ता है, तो जीडीपी भी बढ़ेगी. लेकिन वह मुनाफा न तो निवेश (Investment) में जा रहा है और न ही मिडिल क्लास पेशेवरों को सैलरी के रूप में मिल रहा है."

हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि सबसे गरीब तबके के लिए कुछ सुधार हुआ है, लेकिन किस तरह का? चक्रवर्ती के मुताबिक, "लोगों का शहरों से गांवों की ओर लौटना बताता है कि कंस्ट्रक्शन साइट पर 12-16 घंटे खटने से बेहतर उन्हें गांव की जिंदगी लग रही है. गरीबों की स्थिति सुधरी है, लेकिन वह सिर्फ 'गुजारा करने' (Subsistence existence) तक सीमित है."

अगले महीने, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने ऐलान किया कि फरवरी 2025 में जीडीपी मापने के आधार वर्ष को अपडेट कर दिया जाएगा.

क्राइम डेटा

डेटा की कमी और देरी का सबसे बुरा असर वहां पड़ता है जहां सुरक्षा का सवाल हो. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की 'क्राइम इन इंडिया' रिपोर्ट, जो देश में अपराध की पूरी तस्वीर पेश करती है, लगातार देरी का शिकार हो रही है.

साल 2023 की रिपोर्ट जाकर 2025 के आखिर में जारी की गई. इसका मतलब सिर्फ यह नहीं है कि हमें नए अपराधों का पता देर से चला, बल्कि इसका मतलब यह भी है कि अपराध रोकने के लिए जो कदम आज उठाए जाने चाहिए थे, वो अब बीते हुए कल के हिसाब से उठाए जा रहे हैं.

उदाहरण के तौर पर: 2023 में भारत में साइबर क्राइम के मामले 30% से ज्यादा बढ़ गए, लेकिन राज्य सरकारों को इसका एहसास 2025 में जाकर हुआ. अब सवाल यह है कि क्या साइबर पुलिस स्टेशनों की संख्या भी उसी हिसाब से बढ़ी? क्या साइबर सेल्स को इतने संसाधन दिए गए कि वे बदलते दौर के अपराधों को रोक सकें?

NCRB की रिपोर्ट सिर्फ आंकड़े देती है, लेकिन अपराध के पीछे की असल वजहों जैसे गरीबी, बेरोजगारी या समाज में बढ़ते ध्रुवीकरण (Polarization) पर चुप्पी साध लेती है.

यही वजह है कि जब केंद्रीय गृह मंत्रालय से 2017 से 2022 के बीच मॉब लिंचिंग और धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ होने वाले हेट क्राइम (नफरती अपराधों) की संख्या पूछी गई, तो सरकार ने संसद में कह दिया "इन अपराधों का कोई अलग डेटा नहीं रखा जाता." सरकार का तर्क था कि NCRB ने 2017 में यह डेटा जुटाया तो था, लेकिन वह "भरोसेमंद नहीं" (unreliable) लगा, इसलिए इसे बंद कर दिया गया.

हैरानी की बात यह है कि तब तक मॉब लिंचिंग को अलग से अपराध की श्रेणी में रखा ही नहीं गया था. हालांकि अब नए कानून 'भारतीय न्याय संहिता' (BNS), 2023 में मॉब लिंचिंग को परिभाषित किया गया है, लेकिन पिछले 10 सालों में ऐसे अपराध बढ़े या घटे, इसका कोई आधिकारिक डेटा आज भी मौजूद नहीं है.

जुर्म बढ़ रहे हैं, पर 'डेटा' अब भी गायब है

एक तरफ वो अपराध हैं जिनका डेटा सरकार देरी से देती है, और दूसरी तरफ वो जिनका डेटा देने से सरकार यह कहकर पल्ला झाड़ लेती है कि उन्हें "अपराध की श्रेणी" में ही नहीं रखा गया है.

याद कीजिये, जब छात्रों ने देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET में पेपर लीक समेत भारी धांधलियों का मुद्दा उठाया था. पूरे देश में प्रदर्शन हुए, लेकिन जब केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय से उनके द्वारा आयोजित परीक्षाओं में पेपर लीक का डेटा मांगा गया, तो उनका जवाब था "कोई डेटा उपलब्ध नहीं है."

दिसंबर 2024 में, जब संसद में पूछा गया कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों में पिछड़े तबकों के कितने छात्रों ने जातिगत भेदभाव या प्रताड़ना का सामना किया, तो सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री डॉ. वीरेंद्र कुमार ने लोकसभा में कहा कि इसका कोई 'सेंट्रल डेटा' नहीं रखा जाता.

हैरानी की बात यह है कि यूजीसी (UGC) ने खुद एक संसदीय पैनल और सुप्रीम कोर्ट को जो जानकारी दी है, उसके मुताबिक पिछले 5 सालों में जातिगत भेदभाव की शिकायतों में 118 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है.

इसके अलावा:

चुनावी डेटा

डेटा न रखना एक बात है, लेकिन जो थोड़ा-बहुत डेटा मौजूद है, उस तक पहुंच (Access) को पूरी तरह कंट्रोल करना दूसरी बात.

राहुल गांधी ने जब कर्नाटक और हरियाणा में फर्जी, डुप्लीकेट और थोक में रजिस्टर किए गए वोटरों का मुद्दा उठाया और बड़े पैमाने पर 'वोटर फ्रॉड' का आरोप लगाया, तो उन्होंने कुछ मांगें रखी थीं. उन्होंने मांग की थी कि:

  • वोटर लिस्ट 'मशीन रीडेबल' फॉर्मेट (ताकि उसे आसानी से चेक किया जा सके) में मिले.

  • पोलिंग बूथों की CCTV और वेबकास्ट फुटेज को ज्यादा समय तक संभालकर रखा जाए.

  • नतीजों की जांच और वेरिफिकेशन के लिए फॉर्म 6 और 7 का डेटा दिया जाए.

लेकिन चुनाव आयोग ने क्या किया? आयोग ने इन सभी मांगों को खारिज कर दिया और अपनी जवाबदेही से भी पल्ला झाड़ लिया.

दिल्ली के AQI (हवा की क्वालिटी) का डेटा

आखिर में बात दिल्ली के AQI (हवा की क्वालिटी) डेटा की.

अभी तक हमने देखा कि जरूरी डेटा या तो गायब था या उसमें भारी देरी हुई. लेकिन दिल्ली की हवा का मामला आंकड़ों की 'जादूगरी' का बेहतरीन उदाहरण है. यहां सरकार डेटा जुटाने से लेकर उसकी गणना (Calculation) और उसे पेश करने तक, हर कदम पर उसे अपने हिसाब से मोड़ती है.

हकीकत यह है कि दिल्ली में PM 2.5 का लेवल, वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (WHO) की तय सीमा से 18 गुना ज्यादा था. सच तो यह है कि देश की राजधानी में रहने वाली महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग हर साल कम से कम तीन महीने जहरीली हवा में सांस लेने को मजबूर हैं.

हैरानी की बात देखिये सरकार ने हाल ही में संसद में कहा कि उनके पास ऐसा कोई 'ठोस डेटा' नहीं है, जो खराब हवा (AQI) और फेफड़ों की बीमारी के बीच कोई संबंध साबित करता हो. और यह तब कहा जा रहा है जब 'लैंसेट' (Lancet) जैसी प्रतिष्ठित संस्था की रिपोर्ट 2021 से अब तक भारत में प्रदूषण के कारण लाखों मौतों का दावा कर चुकी है.

2020 में ऑक्सीजन की कमी से हुई मौतें हों या 2025 में प्रदूषण से होने वाली सांस की बीमारियां, प्रधानमंत्री मोदी ने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को चलाने के पांच साल और पूरे कर लिए हैं. लेकिन इस दौरान उन्होंने न तो एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस की और न ही जरूरी डेटा जारी किया. आम नागरिक 'वेंटिलेटर' पर है, पर आंकड़ों की फाइलें बंद हैं.

अगर बेहतर शासन के लिए सटीक और ताजा डेटा जरूरी है, तो सवाल उठता है कि सरकार की इस 'डेटा से दूरी' का फायदा आखिर किसे मिल रहा है?

हम द क्विंट में सख्त सवाल उठाते रहेंगे ताकि जिम्मेदार संस्थाओं को जवाबदेह ठहराया जा सके. कृपया मेंबर बनकर हमारा समर्थन करें.

(हिंदी अनुवाद: नौशाद मलूक)

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