Home Created by potrace 1.16, written by Peter Selinger 2001-2019Hindi Created by potrace 1.16, written by Peter Selinger 2001-2019Opinion Created by potrace 1.16, written by Peter Selinger 2001-2019नीतीश कुमार राज्यसभा सांसद बनने के बाद भी मुख्यमंत्री पद क्यों नहीं छोड़ रहे?

नीतीश कुमार राज्यसभा सांसद बनने के बाद भी मुख्यमंत्री पद क्यों नहीं छोड़ रहे?

इस्तीफे में देरी या फिर नई 'सौदेबाजी'? राज्यसभा जाने के बाद भी नीतीश क्यों नहीं छोड़ रहे बिहार के मुख्यमंत्री का पद.

मनीष आनंद
नजरिया
Published:
<div class="paragraphs"><p>नीतीश कुमार के राज्यसभा में चुने जाने को अब एक सप्ताह हो गया है, लेकिन वह अब भी बिहार के मुख्यमंत्री के तौर पर पूरी तरह सक्रिय हैं.</p><p></p></div>
i

नीतीश कुमार के राज्यसभा में चुने जाने को अब एक सप्ताह हो गया है, लेकिन वह अब भी बिहार के मुख्यमंत्री के तौर पर पूरी तरह सक्रिय हैं.

(फोटो: द क्विंट द्वारा संपादित)

advertisement

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार फिलहाल अपनी कुर्सी छोड़ने के मूड में बिल्कुल नहीं दिख रहे हैं. हाल ही में उन्होंने राज्यभर में अपनी 'समृद्धि यात्रा' का एक और चरण शुरू कर दिया है, जो साफ इशारा है कि वह अभी भी 'फुल फॉर्म' में हैं.

नीतीश के राज्यसभा सांसद चुने जाने के बाद भी बिहार के अगले मुख्यमंत्री को लेकर सस्पेंस खत्म नहीं हुआ है. आलम यह है कि उन्होंने अभी तक बिहार विधान परिषद की सदस्यता से इस्तीफा देने में भी कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई है. इधर पटना में बीजेपी (BJP) नेता भी नए मुख्यमंत्री के चुनाव में हो रही इस देरी से अब धीरे-धीरे असहज और बेचैन होने लगे हैं.

नीतीश कुमार अपनी सख्त सौदेबाजी और अचानक चौंकाने वाले फैसलों के लिए जाने जाते हैं. यही वजह है कि पटना की गलियों में उन्हें लेकर कयासों का बाजार गर्म है और सियासी हलचल तेज है. जब तक कुछ हो न जाए, तब तक यहां कुछ भी तय मान लेना जल्दबाजी होगी. फिलहाल, पूरी बाजी नीतीश कुमार के हाथ में ही नजर आ रही है.

नीतीश अब भी एक्शन में हैं

नीतीश कुमार को राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए अब एक सप्ताह का समय बीत चुका है. लेकिन वे अभी भी बिहार के सीएम प्रतीत हो रहे हैं, और यात्रा के दौरान जिलों में प्रोजेक्ट्स का उद्घाटन कर रहे हैं. ये मार्च शायद उनके जनता से विदाई संवाद की तरह लग सकते हैं, लेकिन उन्होंने राजनीतिक हमले करने से कोई कसर नहीं छोड़ी है. इसे बीजेपी के शीर्ष नेताओं के लिए स्पष्ट संदेश के तौर पर ही समझा जा सकता है कि वह अभी भी अपने लोगों के बीच हैं और उनकी लोकप्रियता बरकरार है.

राज्यसभा के लिए चुने जाने के बाद नीतीश को तुरंत बिहार विधान परिषद की सदस्यता से इस्तीफा दे देना चाहिए था. कम से कम, BJP नेताओं की तो यही इच्छा रही होगी.

तकनीकी तौर पर, उन्हें इस महीने के आखिर तक मेंबरशिप छोड़ देनी चाहिए ताकि वे 16 मार्च को राज्यसभा के चुनाव के बाद 14 दिन की डेडलाइन का पालन कर सकें.

लेकिन जब तक नीतीश एमएलसी पद से इस्तीफा नहीं देते, तब तक उनके पास चौंकाने वाला फैसला लेने का मौका बना हुआ है. इस्तीफे में जल्दबाजी न दिखाकर उन्होंने यह साफ कर दिया है कि बिहार की राजनीति की 'फाइनल स्क्रिप्ट' अभी लिखी जानी बाकी है.

भूमिका बदलने की मांग

नीतीश के मुख्यमंत्री पद से हटने का मतलब है कि टेक्निकली यह पद अब बीजेपी के पास चला गया है. लेकिन भगवा पार्टी के लिए नीतीश की 'कड़क राजनीति' से निपटना इतना आसान नहीं है. इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में भारी जीत के बावजूद, मंत्रियों के बीच विभागों के बंटवारे में कई दिन लग गए थे.

पटना की राजनीतिक हवा को अपने पक्ष में मोड़ने और सत्ता पर पूरी पकड़ बनाने के इरादे से बीजेपी ने न केवल विधानसभा अध्यक्ष (स्पीकर) का पद अपने पास रखा, बल्कि गृह विभाग भी झटक लिया, वही विभाग जो बरसों से नीतीश कुमार के पास था.

राजनीति में स्पीकर का पद तब बहुत अहम हो जाता है जब 'दलबदल विरोधी कानून' के बावजूद विधायकों के पाला बदलने का ड्रामा शुरू हो.

बीजेपी ने साफ कर दिया था कि वह बिहार में अब जेडीयू का 'छोटा भाई' बनकर नहीं रहेगी. विधानसभा अध्यक्ष, गृह विभाग और दो-दो डिप्टी सीएम के जरिए बीजेपी ने राज्य की राजनीति में अपना दबदबा पूरी तरह कायम कर लिया है.

अगर बीजेपी को मुख्यमंत्री का पद मिल जाता है, साथ ही वह विधानसभा स्पीकर और गृह विभाग का पद बनाए रखती है, तो जेडीयू के नेताओं को पार्टी के तेजी से हाशिए पर जाने का सामना करना पड़ सकता है, भले ही उनकी ताकत 85 विधायकों की हो, जो बीजेपी के 89 विधायकों से केवल चार कम हैं.

हालांकि, अब जेडीयू के अंदरूनी सूत्रों के हवाले से यह खबर निकलकर आ रही है कि नीतीश कुमार पूरी बाजी पलटने की तैयारी में हैं. इसका सीधा सा मतलब यह है कि नीतीश अब वो सब कुछ वापस चाहते हैं, जो 2025 के विधानसभा चुनाव के बाद बीजेपी ने उनसे छीन लिया था.
ADVERTISEMENT
ADVERTISEMENT

दो डिप्टी सीएम का पेच

शुरुआत में यह खबर आई थी कि नीतीश कुमार के बेटे, निशांत कुमार बिहार के अगले डिप्टी सीएम बनेंगे. तब बीजेपी नेताओं ने यह तर्क दिया था कि निशांत अकेले डिप्टी सीएम होने चाहिए, क्योंकि अगर पार्टी से कोई दूसरा डिप्टी सीएम बनाया गया, तो इससे निशांत का राजनीतिक कद छोटा हो जाएगा.

लेकिन अब, जेडीयू खेमे ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि नीतीश कुमार की इन तर्कों में कोई दिलचस्पी नहीं हैं और वे दोनों ही पद जेडीयू के पास ही रखना चाहते हैं. इसका सीधा मतलब यह भी है कि बीजेपी न तो मुख्यमंत्री पद पर अपना दावा ठोक सकती है और न ही अपने कोटे से एक उपमुख्यमंत्री का पद बरकरार रख सकती है.

नीतीश के इस दांव ने बीजेपी को मुश्किल में डाल दिया है. पार्टी को बिहार में अपना 'जातीय समीकरण' साधने के लिए कम से कम दो बड़े पदों की जरूरत है.

अगर बीजेपी कोटे से अगला मुख्यमंत्री अति पिछड़ा वर्ग (EBC) से आता है, तो सवर्णों को साधे रखने के लिए डिप्टी सीएम का पद बहुत जरूरी हो जाएगा. सवर्ण पहले से ही UGC के विवादित नियमों की वजह से पार्टी से थोड़े नाराज चल रहे हैं.

जेडीयू के बड़े नेताओं के दावों के मुताबिक, नीतीश ने बीजेपी को दिखा दिया है कि वह एक शख्त नेगोशिएटर हैं.

जेडीयू के 'दो गुट' और पर्दे के पीछे का खेल

नीतीश कुमार की 'कोर टीम' में दो तरह के नेता हैं. एक वो जो पुराने समाजवादी स्कूल से आते हैं, और दूसरे वो जो बीजेपी आलाकमान के काफी करीबी माने जाते हैं. जब नीतीश के बेटे निशांत की जेडीयू में एंट्री हुई, तब संजय झा और राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह जैसे नेता सुर्खियों में छाए हुए थे.

लेकिन अब खबर है कि जेडीयू का दूसरा गुट, जिसमें विजय कुमार चौधरी जैसे दिग्गज शामिल हैं, नीतीश पर अपना प्रभाव जमाने की कोशिश कर रहे हैं. जेडीयू के अंदरूनी सूत्रों ने 'द क्विंट' को कन्फर्म किया है कि "पर्दे के पीछे खेल चल रहा है."

अक्सर कहा जाता है कि जब नीतीश कुमार अपनी पार्टी के कुछ नेताओं के उनके आदेश न मानने पर नाराज हो जाते हैं, तो उनका पसंदीदा जवाबी वाक्य होता है- आगे से यहां एंट्री बंद कर देंगे.

243 सदस्यों वाली बिहार विधानसभा में आज जेडीयू के पास 85 विधायक हैं. 2020 के चुनाव में पार्टी सिर्फ 43 सीटों पर सिमट गई थी, लेकिन अब नीतीश की टीम संख्या के मामले में काफी मजबूत है. जेडीयू खेमे का मानना है कि नीतीश के मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद पटना में जो भी नया पावर गेम सेट हो, उसमें जेडीयू की इस बढ़ी हुई ताकत का पूरा सम्मान होना चाहिए.

हालांकि, अंदरूनी सूत्रों का दावा है कि नीतीश सिर्फ 'सम्मान' से संतुष्ट नहीं होने वाले. वह ऐसा पक्का इंतजाम चाहते हैं जिससे भविष्य में बीजेपी उनकी पार्टी को हाशिए पर न धकेल सके.

(लेखक दिल्ली स्थित वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्होंने दो दशकों से अधिक समय तक देश के प्रमुख अंग्रेजी अखबारों के लिए जेडीयू और बीजेपी को कवर किया है. ये लेखक के निजी विचार हैं. 'द क्विंट' न तो इनका समर्थन नहीं करता है और न ही इसके लिए जिम्मेदार है.)

(ट्रांसलेशन: नौशाद मलूक)

Published: undefined

ADVERTISEMENT
SCROLL FOR NEXT