लगभग दो दशकों तक राजनीतिक पैंतरों की बदौलत बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज रहे नीतीश कुमार ने आखिरकार मुख्यमंत्री पद छोड़ दिया, बिना किसी राजनीतिक वारिस की घोषणा किये. इस तरह बिना किसी खास टकराव अथवा विरोध के बिहार में नीतीश युग का अंत हो गया.
अपनी राजनीति की उत्तर बेला में नीतीश कुमार राज्यसभा जाने को तैयार हो गये हैं. गुरुवार को अपने सोशल मीडिया हैंडल फेसबुक, एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर उन्होंने इसकी घोषणा की और कहा कि राज्यसभा जाना उनकी दिली इच्छा थी.
ये सियासी घटनाक्रम आश्चर्यजनक जरूर है लेकिन अप्रत्याशित बिल्कुल भी नहीं है क्योंकि पिछले साल बिहार विधानसभा चुनाव की सरगर्मी के दौरान ही ये कहा जाने लगा था कि नीतीश कुमार ज्यादा से ज्यादा एक साल तक ही मुख्यमंत्री रहेंगे.
लेकिन, एक साल भी नहीं बीता और शांतिपूर्ण तरीके से नीतीश कुमार की मुख्यमंत्री पद से विदाई हो गई.
माना जा रहा है कि नीतीश कुमार ने भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के लिए सीएम की कुर्सी छोड़ी है. लेकिन, सवाल है कि बिना किसी फायदे के ‘सुशासन बाबू’ ने कैसे मुख्यमंत्री पद छोड़ दिया? जानकारों का कहना है कि संभवतः बीजेपी उनके पुत्र निशांत कुमार को डिप्टी सीएम बनाने को राजी हुई है और इसलिए उन्होंने ये ‘बलिदान’ दिया है.
2025 में ही लिखी जा चुकी थी पटकथा
5 मार्च को बिहार की सियासत में जो बड़ा बदलाव देखने को मिला, उसकी पटकथा साल 2025 के विधानसभा चुनाव में ही लिख दी गई थी, जब मुख्य विपक्षी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) महज 25 सीटों पर सिमट गई और सभी महागठबंधन पार्टियों को मिलाकर महज 35 सीटें आईं.
वहीं, नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (एनडीए) ने 202 सीटों के साथ ऐतिहासिक जीत दर्ज की. 89 सीटें जीत कर बीजेपी राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी जबकि जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) को 85 मिलीं. एनडीए के अन्य सहयोगी दलों लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) ने 19, हिन्दुस्तानी आवास मोर्चा (सेक्युलर) ने पांच और राष्ट्रीय लोक मोर्चा ने चार सीटों पर जीत हासिल की.
विपक्षी पार्टियों को ठीकठाक सीट मिलना नीतीश कुमार के लिए हमेशा से फायदेमंद रहा, क्योंकि इस वजह से वह बीजेपी को नियंत्रण में रखते थे. जब वह बीजेपी के साथ असहज महसूस करते, एनडीए से अलग हो जाते और महागठबंधन के साथ सरकार बना लेते. जब महागठबंधन में असहज महसूस करते, तो एनडीए में शामिल हो जाते थे.
2020 चुनाव में एनडीए ने 125 सीटों पर जीत दर्ज की थी और महागठबंधन को 110 सीटें मिली थीं. जेडीयू को महज 43 सीटें मिली थी, जो साल 2015 के चुनाव के मुकाबले 28 सीटें कम थीं, जबकि बीजेपी ने 74 सीटों पर जीत हासिल की थी. महागठबंधन उस समय मजबूत स्थिति में थी, तो नीतीश कुमार बीच में ही बीजेपी का साथ छोड़ महागठबंधन में शामिल हो गये थे.
लेकिन, पिछले साल हुए बिहार विधानसभा चुनाव में विपक्षी गठबंधन इतना कमजोर हो गया कि नीतीश कुमार अगर एड़ी-चोटी का प्रयास कर लें, तब भी महागठबंधन की सरकार बनना मुश्किल है.
ऐसे में उनके लिए कोई विकल्प नहीं बचा था सिवाय इसके कि थोड़ा समझौता कर बीजेपी के साथ बने रहें. इसी समझौते का परिणाम है उनका राज्यसभा जाना.
लेकिन, जानकार बिहार के संदर्भ में इस समझौते का दूरगामी परिणाम देख रहे हैं.
किस राह चलेगी बिहार की राजनीति?
बीच के कुछेक वर्षों को छोड़ दें, तो पिछले दो दशकों तक एनडीए की सरकार में नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री रहे. एनडीए में उनकी भूमिका हमेशा ही बड़े भाई की रही. कुछ अपवादों को छोड़ दें, तो नीतीश कुमार ने बीजेपी की उग्र राजनीति को कभी हावी नहीं होने दिया. लेकिन अब जब वह मुख्यमंत्री नहीं रहेंगे, तो जानकारों का कहना है कि राज्य में सियासी फिजा में बड़ा बदलाव आएगा.
राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार रमाकांत चंदन इस घटनाक्रम को समाजवादी राजनीति के अंत के तौर पर देखते हैं.
“बिहार में समाजवादी राजनीति कमजोर और दक्षिणपंथी राजनीति बेलगाम होगी और इसके लिए प्रत्यक्ष और परोक्ष तौर पर नीतीश कुमार जिम्मेवार हैं.”
हाल ही में खुले में नॉनवेज बेचने पर प्रतिबंध और नॉनवेज बेचने के लिए लाइसेंस की अनिवार्यता का बिहार सरकार का फैसला, इसी राजनीति का आगाज है.
रमाकांत चंदन का यह भी कहना है कि जिस समय और जिस तरीके से नीतीश कुमार की विदाई हुई है, उससे साफ है कि जेडीयू के शीर्ष नेतृत्व पर ब्लैकमेल करने की हद तक दबाव डाला गया है. “इसके अलावा जेडीयू में जो अगड़ी जातियों का खेमा है, उसने भी बीजेपी की अप्रत्यक्ष मदद की है,” उन्होंने कहा.
हालांकि, बीजेपी अभी तुरंत कोई रैडिकल कदम नहीं उठाएगी क्योंकि नीतीश कुमार भले ही राज्यसभा चले जाएंगे, लेकिन बिहार पर उनकी निगाह रहेगी. ऐसे में बीजेपी नहीं चाहेगी वह रैडिकल कदम उठाकर जेडीयू को नाराज करे. लेकिन भगवा पार्टी धीरे-धीरे अपनी पकड़ बढ़ाएगी.
टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (पटना) के पूर्व प्रोफेसर पुष्पेंद्र कहते हैं, “वह शुरुआत आयोगों और समितियों से करेगी. जितने भी आयोग और समितियां हैं, उनके शीर्ष पदों से वह जेडीयू के वफादार लोगों को हटाएगी और उनकी जगह अपने लोगों को बैठाएगी. फिर ब्यूरोक्रेसी के स्तर पर भी ऐसा ही होगा. उन्हें अपनी वफादारी बीजेपी की तरफ लाने पर मजबूर किया जाएगा और जो नहीं लायेंगे, उन्हें किनारे लगाया जाएगा.”
इसके अलावा वह जेडीयू को भी अपने शिकंजे में लेगी. वह कहते हैं, “शुरुआत जेडीयू की पंचायत और प्रखंड स्तर की इकाइयों से की जाएगी तथा बाद में जेडीयू सांसदों व विधायकों को अपने पाले में लाएगी, क्योंकि केंद्र में बीजेपी की सरकार जेडीयू की बदौलत ही चल रही है, तो वह चाहेगी कि केंद्र की सरकार सुरक्षित हो जाए.”
“इस तरह वह जेडीयू को एक अल्पसंख्यक पार्टी में तब्दील करेगी. फिर बिहार को धार्मिक उन्माद के रंग में रंग देगी,” प्रो. पुष्पेंद्र ने कहा.
विपक्ष की स्थिति
बिहार विधानसभा चुनाव में बुरी हार के सदमे से विपक्षी पार्टियां खासतौर से आरजेडी अब भी बाहर नहीं निकल पाई है. ऐसे में लगता नहीं कि आने वाले समय में विपक्षी पार्टियां, बिहार की राजनीति में कोई बड़ी भूमिका निभा सकेंगी. अगर ऐसा होता है, तो बीजेपी को एक खुला मैदान मिलेगा, जहां वह जैसे चाहे वैसा करेगी.
राजनीतिक विश्लेषक महेंद्र सुमन कहते हैं, “आरजेडी नेतृत्व ओरिएंटेशनलेस है. पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में कोई जज्बा नहीं दिख रहा है. बिल्कुल हाइबरनेशन में है. वहीं, लेफ्ट अपने बने बनाये रिंग में ही उछलता है. लेफ्ट के डिस्कोर्स का लेफ्ट के कोर आधार में ही अपील नहीं है.”
महेंद्र सुमन का मानना है कि विपक्षी पार्टियों को अपने संगठन में आमूलचुल परिवर्तन करना चाहिए. “विपक्षी पार्टियों के शीर्ष नेताओं को चाहिए कि वे सिरे से अपनी पार्टियों को पुनर्गठित करें. पार्टी के नेता जनता से मिलें, गांव-गांव जाएं. तभी कुछ हो सकता है.”
बिहार का अगला मुख्यमंत्री कौन होगा?
राज्यसभा जाने के नीतीश कुमार के ऐलान के बाद यह सवाल भी उठने लगा है कि उनकी जगह बिहार का मुख्यमंत्री कौन होगा?
सूत्रों का कहना है कि बीजेपी अपना मुख्यमंत्री बनाना चाहती है, लेकिन जेडीयू का शीर्ष नेतृत्व इसके लिए तैयार नहीं है.
चूंकि केंद्र सरकार में जेडीयू अहम भूमिका में है, तो बीजेपी फिलहाल बहुत ज्यादा दबाव डालने की स्थिति में भी नहीं है. ऐसे में एक थ्योरी ये भी चल रही है कि बीजेपी, जेडीयू से किसी ऐसे चेहरे को सीएम बनाने की मंजूरी दे सकती है, जो कठोर समाजवादी न हो और वह अतिपिछड़ा या दलित समुदाय से हो.
महेंद्र सुमन कहते हैं, “अगर बीजेपी, जेडीयू से ही किसी और को सीएम बनाने पर राजी होती है, तो वह चाहेगी कि वैसा नेता सीएम बने, जो ओबोसी न हो और न ही विचारधारा के तौर पर कट्टर समाजवादी हो. वह ऐसे व्यक्ति को सीएम बनाना चाहेगा, जो हिन्दुत्व के एजेंडे को भी आगे बढ़ाए. अगर बीजेपी अपना सीएम बनाएगी, तो वह भी किसी दलित या अतिपिछड़े को ही बनाएगी क्योंकि लगभग तीन दशक से अधिक समय से बिहार में ओबीसी का सीएम है और अब ईबीसी व दलित चाहते हैं कि उनके समाज से कोई नेतृत्व करे. दलित या ईबीसी का सीएम बीजेपी के लिए राजनीतिक तौर पर फायदेमंद भी है क्योंकि हाल के दिनों में बीजेपी ने इन समूहों पर ध्यान केंद्रित किया है.”
