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Ground Report: UP के मीरपुर हिंदू गांव में कचरा प्रबंधन प्लांट का विरोध क्यों?

2012 में 120 एकड़ भूमि लैंडफिल साइट के लिए चिन्हित की गई थी, तब से ही किसान इसके खिलाफ विरोध कर रहे हैं.

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"डंपिंग ग्राउंड बनने से खेती से ज्यादा स्वास्थ्य पर असर पड़ेगा. हम यहां अपनी नस्ल और अपनी फसल बचाने के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं." यह कहना है मीरपुर गांव के चेतन त्यागी का.

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के बॉर्डर से सटे बदरपुर खादर गांव के ठीक दूसरी ओर उत्तर प्रदेश की सीमा शुरू हो जाती है. और इसी इलाके के मीरपुर हिंदू गांव के आसपास इन दिनों हवाओं में ऑक्सीजन कम और अविश्वास की गंध ज्यादा है. यह संघर्ष किसी बड़ी विकास परियोजना या हाईवे के खिलाफ नहीं, बल्कि उस कचरे के खिलाफ है जिसे शहर अपने से दूर फेंक देना चाहता है, और गांव उसे अपने बीच स्वीकार करने को तैयार नहीं है.

उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले में प्रस्तावित सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट और वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट को लेकर ग्रामीणों का विरोध तेज हो रहा है. किसानों का कहना है कि यह परियोजना उनकी खेती, भूजल और सेहत पर गंभीर असर डाल सकती है, इसलिए इसे आबादी और कृषि भूमि से दूर शिफ्ट किया जाए.

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प्रदर्शन के दौरान लाठीचार्ज के आरोप

15 फरवरी को प्रदर्शन के दौरान पुलिस और ग्रामीणों के बीच झड़प हो गई. ग्रामीणों का आरोप है कि लाठीचार्ज में करीब 50 से 60 लोग घायल हुए, जबकि पुलिस इससे इनकार कर रही है. वहीं नगर निगम ने तोड़फोड़ के आरोप में पांच नामजद समेत 150 अज्ञात लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कराया है.

35 वर्षीय मनीषा त्यागी अपने हाथ पर लगे चोट का निशान दिखते हुए कहती हैं, "बर्बरता के साथ पुलिस ने गांव की महिलाओं और छोटे बच्चों पर अत्याचार किया. हमने कोई तोड़फोड़ नहीं की, शांतिपूर्वक धरना दे रहे थे, फिर पीटने का क्या कारण था?"

इसी तरह स्थानीय किसान राजेन्द्र का आरोप है कि पुलिस लाठीचार्ज में उनका हाथ टूट गया और उनके 22 वर्षीय बेटे को बुरी तरह पीटा गया. वो कहते हैं, "उस दिन चार सिपाही मेरे जवान बेटे पर लगातार लाठी बरसा रहे थे."

वहीं प्रदर्शन स्थल पर मौजूद कई नाबालिग बच्चों से लेकर महिलाओं ने भी शरीर पर चोट के निशान दिखाते हुए पुलिस पर लाठीचार्ज का आरोप लगाया.

हालांकि इन आरोपों से इनकार करते हुए ट्रॉनिका सिटी थाने के SHO मनोज कुमार ने द क्विंट को बताया कि प्रदर्शनकारी गेट का ताला तोड़कर निर्माणाधीन प्लांट के अंदर घुस गए थे. समझाने के बावजूद वे नहीं माने, रास्ता जाम किया और पुलिस पर पथराव किया गया.

उन्होंने आगे कहा, "लाठीचार्ज हमारा उद्देश्य नहीं था, भीड़ को हटाने के दौरान हल्का बल प्रयोग हुआ हो सकता है."

आबादी के बीच कूड़े का पहाड़ बनने का डर

किसान नेता नीरज त्यागी कहते हैं, "प्रस्तावित प्लांट में पूरे गाजियाबाद जिले का कूड़ा लाया जाएगा, जबकि 500 मीटर की दूरी पर कई गांव बसे हैं और दो किलोमीटर के दायरे में करीब 16–17 गांव आते हैं. सरकार कहती है कि कचरे का वैज्ञानिक निस्तारण होगा, लेकिन हम जानते हैं कि अंत में यहां कूड़े का पहाड़ ही बनेगा."

उनका कहना है कि आबादी के बीच कूड़े का पहाड़ बनने से भारी प्रदूषण फैलेगा, पास में यमुना नदी और मंदिर भी हैं. इसी के विरोध में ग्रामीण पिछले 45 दिनों से मंदिर परिसर में शांतिपूर्वक धरना दे रहे हैं.

"निर्माणाधीन प्लांट के भीतर ही 300–400 गायों की एक गौशाला है और महज कुछ कदम की दूरी पर 500–700 गायों वाली दूसरी सरकारी गौशाला मौजूद है. कूड़ा घर इन गौशालाओं के पास बनाया जा रहा है, जिससे गायों के स्वास्थ्य पर खतरा पैदा होगा. योगी सरकार गायों की रक्षा की बात करती है, लेकिन इस फैसले से उनके लिए ही जोखिम खड़ा किया जा रहा है."
अशोक शर्मा, स्थानीय किसान

आंदोलन में शामिल 75 वर्षीय बृजेश देवी कहती हैं, "भले ही हमारी जान चली जाए, लेकिन अपने आसपास डंपिंग ग्राउंड नहीं बनने देंगे. हमारे इलाके में न ढंग का स्कूल है, न अस्पताल, लेकिन उसके बदले सरकार हमें कूड़े का पहाड़ देना चाहती है. ये कैसे विकास है?"

"सेहत के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है"

मीरपुर हिन्दू गांव में प्रस्तावित यह प्लांट शुरुआत में लोनी नगर पालिका की ठोस कचरा प्रबंधन योजना का हिस्सा था, लेकिन संचालन में दिक्कतों के चलते करीब तीन महीने पहले इसे गाजियाबाद नगर निगम को हैंडओवर कर दिया गया.

शुरुआत में 125 मीट्रिक टन प्रतिदिन क्षमता का प्लांट प्रस्तावित था, जिसे 2020 में बढ़ाकर 300 टन करने की योजना बनाई गई. अब नगर निगम के हेल्थ ऑफिसर मिथिलेश कुमार के मुताबिक तैयार प्लांट भविष्य में 1600 से 2000 मीट्रिक टन प्रतिदिन तक कचरा संभाल सकेगा, जबकि शुरुआती चरण में करीब 500 मीट्रिक टन कचरा प्रोसेस किया जाएगा.

रिटायर्ड सैनिक आर.एम. मलिक कहते हैं, "डंपिंग ग्राउंड आमतौर पर आबादी से दूर बनाए जाते हैं, लेकिन यहां धार्मिक स्थलों और रिहायशी इलाकों के बीच कूड़े का पहाड़ खड़ा किया जा रहा है. इससे प्रदूषण बढ़ेगा और लोगों की सेहत पर गंभीर असर पड़ेगा. सेहत के साथ खिलवाड़ हो रहा है, जिंदगी बर्बाद की जा रही है — इससे ज्यादा निकम्मापन सरकार का और क्या हो सकता है?”

मलिक का आरोप है कि इस फैसले से आसपास रहने वाले लोगों की जीवन-स्थितियां बदतर हो जाएंगी और पूरे इलाके का माहौल प्रभावित होगा.

मनीषा त्यागी कहती हैं, "यमुना की पानी बढ़ने पर इस इलकें में बाढ़ आ जाती है. बाढ़ आएगी तो डंपिंग ग्राउंड का कूड़ा हमारे घरों और चूल्हों तक पहुंचेगा. कूड़े से निकलने वाली गैस हमारे बच्चों को बीमार करेगी. यहां लोग वैसे ही लंबी उम्र नहीं जी पा रहे, ऐसे में यह प्लांट हमारी आने वाली पीढ़ियों का क्या भविष्य छोड़ेगा? हमें यह डंपिंग ग्राउंड नहीं चाहिए."

उन्होंने बताया कि दो साल पहले उनके घर में बाढ़ का पानी घुस चुका है और लोगों को अपने स्वास्थ्य और बच्चों के भविष्य की चिंता सता रही है.

हालांकि बाढ़ के आरोपों पर लोनी के एसडीएम एमदीपक सिंघनवाल ने द क्विंट को बताया कि मीरपुर हिंदू गांव "डूब क्षेत्र" (फ्लड प्लेन) में नहीं आता है. उनका कहना है कि प्रस्तावित स्थल नियमों के अनुरूप है.
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2012 से जारी है ग्रामीणों का विरोध

इस परियोजना के लिए करीब 120 एकड़ भूमि साल 2012 में चिन्हित कर ली गई थी, लेकिन स्थानीय विरोध के चलते प्रशासन वर्षों तक जमीन का कब्जा नहीं ले सका. बाद में 12 जून 2020 को पुलिस की मौजूदगी में जमीन अपने कब्जे में ली गई और लगभग 8.2 हेक्टेयर क्षेत्र में प्लांट का काम शुरू किया गया. नगर निगम के हेल्थ ऑफिसर मिथिलेश कुमार के मुताबिक, प्लांट का काम फिलहाल करीब 70 फीसदी तक पूरा हो चुका है.

द क्विंट की पड़ताल में सामने आया कि 2020 में लोनी के कचरा प्रबंधन से जुड़े एक मामले में गाजियाबाद के तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) को बताया था कि प्रस्तावित मीरपुर हिंदू प्लांट रिहायशी इलाके से करीब 7 किलोमीटर दूर स्थित है.

किसान नेता नीरज त्यागी का आरोप है, "यहां डिग्री कॉलेज बनाने के लिए शिलान्यास किया गया था, लेकिन बाद में पता चला कि यहां कूड़ा घर बनाया जा रहा है."

त्यागी का कहना है कि ग्रामीण शुरू से इसका विरोध कर रहे हैं और उनका सवाल है कि शहर का कूड़ा गांव के बीच क्यों लाया जा रहा है, जबकि यहां लोग खेती और हरियाली पर निर्भर होकर जीवन यापन कर रहे हैं.

"हमने आसपास के इलाकों में देखा है कि जहां कूड़ा जमा होता है, वहां हवा, पानी और खेती सब प्रभावित होती है. बारिश में गंदा पानी जमीन में जाता है. यहां 500 मीटर की दूरी पर गांव बसे हैं और यह पूरा इलाका हरी-भरी खेती का क्षेत्र है, ऐसे में इतने पास कूड़ा घर बनाना पूरी तरह गलत है."
अशोक त्यागी, स्थानीय निवासी

वहीं नगर निगम का कहना है कि शहर के कचरे के वैज्ञानिक निस्तारण के लिए यह प्लांट जरूरी है और इसे सभी पर्यावरणीय मानकों के तहत बनाया जाएगा.

"एमसीजी ने प्लांट और वहां तक जाने के लिए अलग सड़क के निर्माण पर 12 करोड़ रुपये और सरकारी फंड से 18 करोड़ रुपये खर्च किए हैं. प्लांट का संचालन संभालने वाले प्राइवेट वेंडर ने भी करीब 35 करोड़ रुपये निवेश किए हैं. प्लांट का काम शुरू करने से पहले सभी जरूरी कानूनी परमिशन और नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट लिए जाएंगे. वहीं किसानों और प्रदर्शनकारियों के साथ बातचीत जारी है."
-मिथिलेश कुमार, सिटी हेल्थ ऑफिसर, नगर निगम गाजियाबाद

नियम क्या कहते हैं?

Solid Waste Management Rules, 2016 के अनुसार किसी भी लैंडफिल साइट को पिछले 100 वर्षों के रिकॉर्डेड फ्लड प्लेन क्षेत्र के भीतर अनुमति नहीं दी जा सकती.

लैंडफिल नदी से कम से कम 100 मीटर, तालाब से 200 मीटर और हाईवे, आबादी, पार्क तथा जल स्रोतों से 200 मीटर दूर होना चाहिए. एयरपोर्ट से इसकी दूरी 20 किलोमीटर अनिवार्य है. पांच टन प्रतिदिन से अधिक क्षमता वाले प्लांट के चारों ओर पर्याप्त बफर जोन जरूरी है.

लैंडफिल के पास रहना गंभीर स्वास्थ्य जोखिम

देश के कई शहरों में ठोस कचरा प्रबंधन और लैंडफिल साइटें मौजूद हैं. इनके आसपास रहने वाले लोगों पर क्या असर पड़ता है, इसे समझने के लिए द क्विंट वैज्ञानिक अध्ययन देखे और फिर एक्सपर्ट से बात की.

दिल्ली के गाजीपुर, भलस्वा और ओखला लैंडफिल के पास रहना हर साल और मुश्किल होता गया है. इंडियन जनरल ऑफ क्लीनिकल प्रैक्टिस के जून 2018 के एक अध्ययन के मुताबिक लैंडफिल से दो किलोमीटर के दायरे में PM2.5 और PM10 का स्तर ज्यादा पाया गया, जबकि लोगों की फेफड़ों की क्षमता कम दर्ज की गई.

पानी में बढ़ा हुआ TDS और कठोरता भूजल प्रदूषण की ओर इशारा करते हैं. यानि लैंडफिल के पास रहना सिर्फ असुविधा नहीं, बल्कि गंभीर स्वास्थ्य जोखिम है.

University College Dublin में सीनियर रिसर्च साइंटिस्ट, डॉ ऋचा सिंह कहती हैं कि कृषि भूमि के पास या 500 मीटर बफर जोन के भीतर वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट लगाना गंभीर पर्यावरणीय और स्वास्थ्य जोखिम पैदा करता है. ऐसे प्लांट, खासकर जहां मिश्रित कचरा जलाया जाता है, वहां से डाइऑक्सिन, फ्यूरान, भारी धातुएं, पार्टिकुलेट मैटर और सल्फर-नाइट्रोजन के ऑक्साइड जैसे खतरनाक प्रदूषक निकलते हैं, जिनमें कई कैंसरकारी होते हैं और लंबे समय तक वातावरण में बने रहते हैं.

"ये प्रदूषक मिट्टी और फसलों पर जमकर खाद्य श्रृंखला के जरिए मानव शरीर तक पहुंचते हैं, जिससे कैंसर, हार्मोनल गड़बड़ी और प्रजनन संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ता है. केरल की एक CSIR लैब के अध्ययन में हवा और बॉटम ऐश दोनों में डाइऑक्सिन और फ्यूरान की मौजूदगी दर्ज की गई है. कृषि क्षेत्रों के पास ऐसे प्लांट लगाने से इन प्रदूषकों के फसलों, डेयरी उत्पादों और पशुओं तक पहुंचने की संभावना बढ़ जाती है, जिससे स्थानीय समुदाय के लंबे समय तक एक्सपोजर का खतरा भी बढ़ता है."

उनका कहना है कि भारत में निगरानी और नियमों के पालन की कमी के कारण जोखिम और बढ़ जाता है, और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल पहले भी कई प्लांटों पर गैर-अनुपालन के लिए जुर्माना लगा चुका है. ऐसे प्लांटों से निकलने वाली बदबू भी आसपास रहने वाले लोगों में तनाव, नींद की कमी और जीवन की गुणवत्ता में गिरावट से जुड़ी पाई गई है.

उन्होंने बताया कि यूरोप में किए गए ह्यूमन बायोमॉनिटरिंग अध्ययनों में पाया गया है कि ऐसे प्लांट से 1 से 3 किलोमीटर के दायरे में रहने वाले लोगों के खून और पेशाब में भारी धातुओं और स्थायी ऑर्गेनिक प्रदूषकों का स्तर अधिक था — और भारतीय संदर्भ में भी इसी तरह के संकेत मिलते हैं.

मीरपुर हिंदू का यह विरोध सिर्फ एक गांव की लड़ाई नहीं है, बल्कि विकास और लोगों की सेहत के बीच संतुलन का सवाल है. कचरे के वैज्ञानिक निस्तारण की जरूरत है, लेकिन प्रभावित ग्रामीणों की चिंताओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. अब देखना है कि प्रशासन ऐसा समाधान निकाल पाता है या नहीं, जो विकास और पर्यावरण दोनों को साथ लेकर चले.

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