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बंगाल में एक 'फूल' खिला, एक मुरझाया.. BJP की जीत के पीछे 'M' factors क्या हैं?

BJP ने अपने घोषणापत्र में सरकार बनने के 6 महीने के भीतर समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने का वादा किया है.

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"टीएमसी बोलतेई थाकलो— खेला होबे, खेला होबे... आर एखने बीजेपी खेला कोरे दिएछे"

टीएमसी बोलती थी - खेला होबे, खेला होबे, लेकिन खेल तो बीजेपी ने कर दिया. 15 साल बाद बंगाल की सत्ता से ममता बनर्जी सरकार की बिदाई हो गई. बंगाल में पहली बार बीजेपी की सरकार बनने जा रही है, लेकिन ये सब कैसे हुआ? इसके पीछे है- एम फैक्टर. नहीं, नहीं आप जो एम सोच रहे हैं, वो नहीं. आगे बताएंगे कि बंगाल में बीजेपी की जीत के पीछे कौन कौन से फैक्टर हैं.

माछ, महिला, मशीनरी और मुसलमान.. बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों का सार यही है.

बंगाल की राजनीति का 'एम' से पुराना रिश्ता है. चाहे M से ममता हों या उनका 'मां, माटी, मानुष' का नारा, जिसके सहारे उन्होंने बंगाल से 34 साल की लेफ्ट सरकार को हटाया था. और अब M से मोदी, जो एम फॉर मां गंगा में नाव पर बैठकर एम से मैसेज देने में कामयाब रहे.

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इस आर्टिकल में हम बात करेंगे उन 5 वजहों की वजह से बीजेपी ने बंगाल की सत्ता पर कब्जा किया है.

1. मांस-मछली- सांस्कृतिक 'U-टर्न': थाली में मछली और राजनीति में 'कांटा'

कहते हैं बंगाल के लोगों के जिस्म में खून के साथ मछली भी दौड़ती है. पश्चिम बंगाल में मछली सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि एक इमोशन है, अस्मिता का प्रतीक है. बंगाली समाज में मछली को बहुत शुभ माना जाता है. शादी की रस्में हों या गिफ्ट देना हो. बीजेपी ने उसी मछली का सहारा लिया.

जिस बीजेपी के नेता देशभर में कभी मंगलवार तो कभी नवरात्र के नाम पर नॉन-वेज की दुकानों पर पहरेदारी करते दिख जाते हैं, वो बंगाल का भरोसा जीतने के लिए मछली का कांटा तक निगलने को तैयार थे. बीजेपी नेता कभी मछली खाते दिखते तो कभी हाथों में मछली लिए वोट मांगते दिखते.

बीजेपी के नेता हिमंता बिस्वा सरमा ने तो यहां तक कहा कि वो ममता बनर्जी से ज्यादा मांस खा जाएंगे. बीजेपी ने वादा किया है कि सत्ता में आने पर मछली, मांस और अंडे पर कोई रोक नहीं लगेगी, और वे प्रदेश में मछली की खपत को 4 गुना बढ़ाएंगे.

बीजेपी नेताओं ने सार्वजनिक रूप से मछली खाकर यह संदेश दिया कि वे "प्रो-फिश ईटर" हैं. यह जनता को बताने का तरीका था कि "हम बाकी जहां जैसे हों लेकिन बंगाल में आपसे अलग नहीं हैं, हम आपके जैसे ही मांसाहारी हैं." कुल मिलाकर बीजेपी की 'फिशिंग पॉलिटिक्स' यहां काम कर गई.

2. महिला- 'मां' के नाम पर घेराबंदी: आरजी कर और सुरक्षा का मुद्दा

ममता बनर्जी का 'मां' शब्द बंगाल की महिलाओं से उनके जुड़ाव का प्रतीक था, लेकिन बीजेपी ने इसे ही टीएमसी के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार बनाया. आरजी कर मेडिकल कॉलेज कांड के पीड़ित परिवार को टिकट देकर बीजेपी ने महिला सुरक्षा के मुद्दे को चुनाव का केंद्र बना दिया. पिछले दो साल से संदेशखाली से लेकर कोलकाता तक बीजेपी ने यह नैरेटिव सेट किया कि टीएमसी के राज में 'मां' और बेटियां असुरक्षित हैं. इसने ममता के सबसे मजबूत वोट बैंक (महिलाएं) को उनसे दूर किया.

3. 'मुस्लिम बनाम हिंदू खतरे में है' का नैरेटिव

करीब 30 फीसदी मुसलमानों वाले बंगाल में ममता बनर्जी की टीएमसी को सबसे ज्यादा मुसलमान वोट करते रहे हैं, और इसी फैक्टर को बीजेपी ने अपनी ताकत बनाई. बीजेपी ने ममता बनर्जी को 'मुस्लिम परस्त' बताकर हिंदू वोट बैंक को अपने पाले में करने की जबरदस्त कोशिश की.

"हिंदू खतरे में है" और "डेमोग्राफी बदल रही है" जैसे नारों ने बहुसंख्यक आबादी को एकजुट किया. यह ध्रुवीकरण इतना प्रभावी रहा कि टीएमसी का संगठित वोट बैंक भी इसके सामने छोटा पड़ गया.

घुसपैठिए, बांग्लादेशी मुसलमान, सीएए, यूसीसी जैसे मुद्दे को बीजेपी ने अपने प्रचार का अहम हिस्सा बनाया. भारतीय जनता पार्टी ने 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए अपने 'भरोसा पत्र' (घोषणापत्र) में सरकार बनने के 6 महीने के भीतर समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने का वादा किया है.

बीजेपी का ये नैरेटिव काम कर गया कि टीएमसी मुसलमानों के साथ सहानुभूति रखती है और एकमात्र बीजेपी ही इसपर रोक लगा सकती है. बीजेपी की ओर से पीएम मोदी, अमित शाह, योगी आदित्यनाथ, रवि किशन और कई प्रमुख नेता इस चुनाव को सनातन धर्म को बचाने की आखिरी लड़ाई की तरह पेश करते रहे.

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4. मशीनरी- SIR से लेकर चुनावी ड्यूटी में अधिकारियों पर सवाल

कई जानकार कहते हैं कि चुनाव आयोग द्वारा किया गया 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' (SIR) इस चुनाव का 'साइलेंट किलर' है.

SIR के जरिए लगभग 91 लाख वोटरों के नाम हटाए गए, जिसमें 27 लाख ऐसे थे जिनके मामले ट्रिब्यूनल में अटके हैं. लेकिन फिर भी वोटिंग हुई. बीजेपी ने इसे 'अवैध घुसपैठियों की सफाई' कहा, जबकि ममता ने इसे अपने खिलाफ साजिश. लेकिन हकीकत यह है कि इन नामों के हटने से कई सीटों पर टीएमसी का पुराना चुनावी गणित कमजोर पड़ गया. 2021 में चुनाव में जिन 5 जिलों से TMC ने 110 सीटें जीतीं, वहीं से 50% अयोग्य वोटर डिलीट किए गए.

यह आंकड़ा बताता है कि टीएमसी की एकतरफा जीत वाले जिलों में सबसे ज्यादा अयोग्य मतदाता डिलीट किए गए.

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दूसरी तरफ ममता बनर्जी और टीएमसी अदालत से लेकर मीडिया में लगातार केंद्रीय एजेंसी और दूसरे राज्यों से गए चुनाव ऑबजर्वर पर पक्षपात का आरोप लगाती रही है.

5. एंटी इंकम्बेंसी

ममता बनर्जी 2011 से बंगाल की सत्ता में हैं. ऐसे में एंटी इंकम्बेंसी, लोगों में बेरोजगारी, माइग्रेशन, जैसे मुद्दे भी बीजेपी के लिए फायदेमंद साबित हुए.

'शिक्षक भर्ती घोटाले' (SSC Scam), राशन घोटाले, पार्था चटर्जी और ज्योतिप्रिय मल्लिक जैसे नेताओं की गिरफ्तारी, जनता के बीच "भ्रष्टाचार बनाम ईमानदारी" की बहस को जन्म दिया. बीजेपी ने रोजमर्रा के कामकाज के लिए 'सिंडिकेट' पर निर्भरता का आरोप लगाया. राजनीतिक हिंसा को प्रचार के केंद्र में रखा.

2021 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी को 38 फीसदी वोट मिले थे. 2024 लोकसभा चुनाव में बंगाल में 39 फीसदी और अब ये आंकड़ा 45 फीसदी के करीब है. वहीं 2021 में TMC ने 48% वोट शेयर के साथ 213 सीटें जीती थी, 2024 लोकसभा चुनाव में 2 फीसदी कम यानी 46 और अब 2026 में 42 फीसदी के करीब है. मतलब चुनाव दर चुनाव बीजेपी बढ़ती गई और ममता बनर्जी कमजोर.

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