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क्या मुसलमानों के वोट देने के हक को छीना जा रहा है? समझिए ये 3 तरीके

फॉर्म 7 में धांधली से लेकर परिसीमन में गड़बड़ी तक, देशभर में मुसलमानों के वोटिंग अधिकारों पर हमला किया जा रहा है.

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(हम अपनी संपादकीय स्वतंत्रता के कारण चुनावी संस्थाओं से कठिन सवाल पूछ पाते हैं. क्विंट के मेंबर बनें और जवाबदेही सुनिश्चित करने में हमारा साथ दें.)

दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत आज खतरे में है. धर्म के आधार पर लोगों से उनके मतदान के अधिकार छीनने की कोशिशें की जा रही हैं. यह प्रक्रिया तीन तरीकों से और देश के कई राज्यों में चल रही है.

पहला तरीका: फॉर्म 7 का खेल

इसे समझने के लिए 'द क्विंट' की इन दो रिपोर्ट्स पर नजर डालिए. क्विंट की पत्रकार हिमांशु दहिया की रिपोर्ट के मुताबिक, राजस्थान के अलवर में फॉर्म 7 का इस्तेमाल करके सैकड़ों मुस्लिम वोटरों के नाम वोटर लिस्ट से हटवाने की कोशिश की गई.

फॉर्म 7 क्या है? यह वह फॉर्म है जिसके जरिए आप किसी भी वोटर की पात्रता पर सवाल उठा सकते हैं. अलवर में इसी फॉर्म को हथियार बनाकर मुस्लिम वोटरों को निशाना बनाया गया. खबर है कि इनमें से जयादातर शिकायतें बीजेपी से जुड़े लोगों ने दर्ज कराई थीं.

इसी तरह, क्विंट के पत्रकार ईश्वर की एक रिपोर्ट बताती है कि उत्तर प्रदेश के चंदौली में एक BLO (बूथ लेवल ऑफिसर) को गुमनाम लिफाफा भेजा गया, जिसमें सात मुस्लिम वोटरों के नाम लिस्ट से हटाने को कहा गया. चंदौली में छह BLOs को अलग-अलग फॉर्म दिए गए ताकि मुस्लिम वोटरों के नाम काटे जा सकें. इनमें से कुछ फॉर्म तो पूरी तरह फर्जी निकले. जिन लोगों के नाम पर ये फॉर्म भरे गए थे, उन्होंने 'द क्विंट' को बताया कि उन्होंने ऐसी कोई शिकायत की ही नहीं थी.

ऐसी ही खबरें पश्चिम बंगाल, गुजरात और असम से भी आई हैं. इन सभी रिपोर्ट्स में एक बात कॉमन है. मुस्लिम वोटरों को लिस्ट से बाहर करने की कोशिश हो रही है और इसके लिए धोखाधड़ी से फॉर्म भरे जा रहे हैं.

शुक्र है कुछ ईमानदार BLOs और स्वतंत्र मीडिया रिपोर्ट्स का, जिनकी वजह से इन इलाकों में 'वोट चोरी' रुक गई. लेकिन मुमकिन है कि कई जगहों पर यह खेल अब भी जारी हो.

यहां सबसे बड़ा सवाल यह है (जैसा कि अलवर की कहानी में साफ दिखा) कि 'वोट चोरी' की इतनी खुली कोशिशों के बावजूद चुनाव आयोग ने इसकी जांच में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई.

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दूसरा तरीका: परिसीमन (Delimitation)

असम और जम्मू-कश्मीर, इन दो राज्यों में परिसीमन का काम पूरा हो चुका है. गौर करने वाली बात यह है कि दोनों ही जगहों पर सीटों की सीमाएं बदलने के लिए अलग-अलग पैमाने अपनाए गए.

जम्मू-कश्मीर का उदाहरण लीजिए यहां आबादी का तर्क देकर मुस्लिम बहुल 'कश्मीर' क्षेत्र की सीटों का अनुपात कम कर दिया गया, जबकि हिंदू बहुल 'जम्मू' क्षेत्र की सीटों का हिस्सा बढ़ा दिया गया.

उदाहरण के तौर पर, अनंतनाग लोकसभा सीट की आबादी कम कर दी गई और इसमें जम्मू के मुस्लिम बहुल इलाकों को जोड़ दिया गया. हैरानी की बात यह है कि भौगोलिक रूप से इन दोनों क्षेत्रों के बीच पूरी की पूरी पीर पंजाल पर्वत श्रृंखला आती है, फिर भी इन्हें एक साथ जोड़ दिया गया.

अब बात करते हैं असम की. यहां मुस्लिम बहुल इलाकों में आबादी ज्यादा होने के बावजूद सीटों की संख्या कम कर दी गई. सीटों के बंटवारे के वक्त परिसीमन (Delimitation) के तमाम कायदे-कानूनों को ताक पर रख दिया गया.

चुनाव का बुनियादी नियम कहता है कि हर नागरिक के वोट की कीमत बराबर होनी चाहिए. परिसीमन का मकसद भी यही होता है कि हर सीट पर वोटरों की संख्या लगभग एक जैसी रहे.

अगर आबादी के हिसाब से देखें, तो असम की हर लोकसभा सीट पर करीब 17.5 लाख वोटर होने चाहिए थे. लेकिन मुस्लिम बहुल धुबरी (Dhubri) सीट में लगभग 10 लाख अतिरिक्त वोटर जोड़ दिए गए. इसका सीधा सा मतलब ये है कि असम की दूसरी सीटों के मुकाबले धुबरी के एक वोट की 'वैल्यू' कम कर दी गई.

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती...

धुबरी सीट में जो 10 लाख अतिरिक्त वोटर जोड़े गए, वे पहले बरपेटा सीट का हिस्सा थे. रणनीति साफ थी बरपेटा के मुस्लिम बहुल इलाकों को काटकर धुबरी में डाल दिया गया, जिससे रातों-रात बरपेटा एक हिंदू बहुल सीट बन गई.

जब चुनाव के नतीजे आए, तो कोई हैरानी नहीं हुई पहली बार एनडीए (NDA) इस सीट को जीतने में कामयाब रहा.

अब मैं अपनी बात फिर से दोहराता हूं.

जम्मू-कश्मीर में आबादी का तर्क देकर कश्मीर की सीटों का हिस्सा घटा दिया गया. इसी तर्क के आधार पर भविष्य में होने वाले परिसीमन में दक्षिण भारत और पंजाब जैसे राज्यों की सीटें भी कम हो जाएंगी, क्योंकि उन्होंने फैमिली प्लानिंग को बेहतर तरीके से लागू किया है. लेकिन असम में आबादी वाला यह तर्क गायब हो जाता है और वहां मुस्लिम बहुल इलाकों की सीटें घटा दी जाती हैं.

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तीसरा तरीका: वोटिंग रोकना (Voter Suppression)

2024 के लोकसभा चुनावों के दौरान, उत्तर प्रदेश की संभल सीट के कुछ मुस्लिम मतदाताओं ने 'द क्विंट' को बताया कि उन्हें वोट डालने के लिए पुलिस की बर्बरता का सामना करना पड़ा. यही नहीं, कुछ मुस्लिम बहुल इलाकों में पोलिंग बूथों को कुछ घंटों के लिए बंद कर दिए जाने की शिकायतें भी सामने आईं.

इसके कुछ महीनों बाद, यूपी की कुंदरकी विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में भी यही कहानी दोहराई गई. आरोप लगे कि कई मुस्लिम इलाकों में वोटरों को धमकाया गया या उन्हें वोट डालने से रोका गया. 'स्क्रॉल' (Scroll) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, मुस्लिम बहुल बूथों पर वोटिंग प्रतिशत में भारी गिरावट देखी गई.

हमने तथ्यों के साथ यह दिखाया है कि इन तीन तरीकों के जरिए किस तरह मुस्लिम नागरिकों से उनका वोट देने का अधिकार छीना जा रहा है, या उनके वोट की ताकत को कम किया जा रहा है.

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि चुनाव आयोग आखिर कर क्या रहा है? इसके दो ही नतीजे निकलते हैं: या तो चुनाव आयोग लाचार और बेअसर हो चुका है, या फिर वह खुद इस पूरे खेल में शामिल है.

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