हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले
लड़ाई दिल्ली के तख्त की चल रही थी और एक पुराना सुल्तान अतीत में जी रहा था. ख़्वाहिशें हजारों थीं, एक से बढ़कर एक अरमान दिल में लिए बैठा था. लेकिन हाथ क्या लगा? एक बार फिर निराशा. बात कांग्रेस की हो रही है. जिस पार्टी ने 1998 से लेकर 2013 तक, लगातार 15 साल दिल्ली पर शासन किया हो, वो पार्टी बैक-टू-बैक तीसरे विधानसभा चुनाव में वजूद की लड़ाई लड़ रही थी. फिर वही सवाल हाथ के हाथ क्या लगा. 70 में से एक भी सीट नहीं. पिछले दो विधानसभा चुनाव में 0 पर क्लीन बोल्ड होने वाली ग्रैंड ओल्ड पार्टी इस बार भी खाता नहीं खोल पाई है. आपको इसमें भी पॉजिटिव न्यूज खोजना है? हम देते हैं. दिल्ली की सत्ता से आम आदमी पार्टी बाहर हो गई है और कांग्रेस का वोट शेयर 2% ही सही लेकिन बढ़ा है.
कांग्रेस की इस हालात पर दोष किसे दिया जाए? सवाल किससे किया जाए? गोता मारने से पहले सतह पर मौजूद तथ्यों से रूबरू होते हैं.

