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UP चुनाव: पार्टियों के फोकस पर ब्राह्मण वोटर, हर चुनाव में किंग मेकर की भूमिका

उत्तर प्रदेश में 32 साल से कोई ब्राह्मण चेहरा सीएम क्यों नहीं बना?

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उत्तर प्रदेश में हर पार्टी ब्राह्मण वोटर को साधने में लगी है. उन्हें पता है कि सत्ता हासिल करने में उनकी क्या भूमिका रही है. 2007 में मायावती के साथ गए तो बीएसपी की सरकार बनी. 2012 में अखिलेश का साथ दिया और एसपी सत्ता में आ गई. तीन बार से बीजेपी का साथ दे रहे हैं. लेकिन अबकी बार समीकरण कुछ बिगड़ता दिख रहा है. योगी से ब्राह्मण वोटर की नाराजगी की बात कही जा रही है. ऐसे में समझते हैं कि उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण वोटर की क्या भूमिका रही है? इस बार वो किसके साथ जा सकते हैं?

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यूपी में ब्राह्मण चेहरे बने सबसे ज्यादा बार सीएम

ब्राह्मण वोटर की भूमिका को समझने के लिए उत्तर प्रदेश के इतिहास में जाना होगा. सीएम की लिस्ट में पहला नाम गोविंद बल्लभ पंत का मिलता है. वे ब्राह्मण थे. फिर सुचेता कृपलानी, कमलापति त्रिपाठी, हेमवती नंदन बहुगुणा, श्रीपति मिश्रा और नारायण दत्त तिवारी. कुल 6 ब्राह्मण चेहरे सीएम बने. लेकिन 1989 के बाद से प्रदेश में कोई भी ब्राह्मण सीएम नहीं बना. इसकी पीछे एक बड़ी वजह पिछड़ों की राजनीति को माना जाता है.

1989 के बाद कोई ब्राह्मण सीएम क्यों नहीं बना?

1990 में मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू कर दी गईं. देश में अगड़ों और पिछड़ों की वैचारिक लड़ाई छिड़ी थी. असर यूपी में भी हुआ. मुलायम सिंह यादव पहली बार सीएम बने. अगर राजनाथ सिंह और योगी आदित्यनाथ को छोड़ दें तो 90 के बाद से यूपी में पिछड़े और दलितों का नेता ही सीएम रहा है. ब्राह्मण-ठाकुर और बनियों की पार्टी कही जाने वाली बीजेपी ने भी एक वक्त तक कल्याण सिंह को ही आगे रखा. ऐसे में किसी ब्राह्मण की सीएम बनना मुश्किल था. लेकिन एक सच्चाई ये भी है कि ब्राह्मण वोटर ने हमेशा सत्ता बनवाने में किंगमेकर की भूमिका निभाई है.

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2007 के बाद से ब्राह्मणों ने फिर से दिखाई ताकत

1989 के बाद से कोई ब्राह्मण चेहरा सीएम नहीं बना. लेकिन हमेशा सत्ता के केंद्र में रहा. 1990 से लेकर 2007 तक अप डाउन चलता रहा, लेकिन इसके बाद उनमें एकजुटता दिखी. मायावती ने दलित, ब्राह्मण, मुस्लिम गठजोड़ बनाया. 85 सीटों पर ब्राह्मण उम्मीदवार उतारे और 41 सीटों पर जीत मिली. यानी हर दूसरा ब्राह्मण उम्मीदवार जीत गया. इसे ही मायावती की सोशल इंजीनियरिंग कहा गया. तब मायावती को कुल 206 (30%) सीटें मिलीं. एसपी का यादव-मुस्लिम फॉर्मूला फेल हो गया. उन्हें 25% वोट तो मिले, लेकिन सिर्फ 97 सीट ही जीत सकी.

ब्राह्मण वोटर का पैटर्न रहा है कि वे हमेशा सत्ता के करीब रहे हैं. यही वजह है कि साल 2012 में जब मायावती के खिलाफ एंटी इनकम्बेंसी का असर दिखा तो एसपी के साथ चले गए. अखिलेश को सीएम बनवाने में मदद की. फिर मोदी लहर का असर हुआ और साल 2014, 2017 और 2019 में बीजेपी का साथ दिया. साल 2019 में तो बीजेपी को 83% ब्राह्मण वोट मिले.
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यूपी में 10% ब्राह्मण वोटर का 115 सीटों पर प्रभाव

यूपी में ब्राह्मणों की आबादी करीब 10% हैं. 115 सीटों पर प्रभाव है. कई जिले ऐसे हैं जहां ब्राह्मणों का वोट प्रतिशत ज्यादा है. जैसे मध्य बुंदेलखंड, गोरखपुर, इलाहाबाद, वाराणसी, बलरामपुर, देवरिया, जौनपुर, अमेठी, कानपुर, नोएडा, बस्ती. ये ऐसे इलाके हैं जहां पर ये 15% से भी ज्यादा हैं.

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क्या बीजेपी से ब्राह्मण वोटर छिटक सकता है?

इसे विपक्ष के कुछ बयानों से समझते हैं. आप सांसद संजय सिंह ने योगी सरकार को ब्राह्मण विरोधी बताते हुए कहा था कि उनके कार्यकाल में 500 से ज्यादा ब्राह्मणों की हत्या की गई. 20 ब्राह्मणों का तो फर्जी एनकाउंटर किया गया. बीएसपी के राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा कहते हैं कि ब्राह्मण होने की वजह से ही खुशी दुबे को परेशान किया जा रहा है. ये कोई एक बयान नहीं है, बल्कि सरकार बनने के बाद से ही योगी आदित्यनाथ पर ब्राह्मणों के खिलाफ कार्रवाई के आरोप लगे हैं. इसे लेकर बीजेपी दबाव में भी दिखी.

कहा जाता है कि इसी दबाव की वजह से किसान आंदोलन के बाद भी अजय मिश्र टेनी के खिलाफ एक्शन नहीं लिया गया. बीजेपी को डर था कि इससे प्रदेश का ब्राह्मण वोटर नाराज हो सकता है. इसलिए एक्शन लेने की बजाय चुनाव के लिए ब्राह्मणों की बनाई गई कमेटी में अजय मिश्र को जगह देकर उनके कद को बढ़ाने की कोशिश की गई.
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हालांकि चुनाव में ऐसे मुद्दों को पार्टियां कहां छोड़ने वाली. ब्राह्मणों के मामले में बीजेपी को लेकर जो नैरेटिव बना है, उसका पूरा फायदा उठाने में लगी हैं. ब्राह्मण वोटर्स को अपनी तरफ खींचने के जतन कर रही हैं.

  • अखिलेश यादव की एक तस्वीर खूब चर्चा में रही. हाथ में परशुराम का फरसा उठाए हुए. उन्होंने लखनऊ के गोसाईगंज में भगवान परशुराम की मूर्ति का अनावरण किया था. तब उन्होंने कहा कि यादव ब्राह्मण समाज हमारे साथ है.

  • बीएसपी ने ब्राह्मणों को पार्टी से जोड़ने की जिम्मेदारी सतीश मिश्रा को दे रखी है. कई जगहों पर ब्राह्मण सम्मेलन किए गए. सतीश मिश्रा ने विकास दुबे एनकाउंटर के जरिए योगी आदित्यनाथ की सरकार पर ब्राह्मणों को प्रताड़ित करने का आरोप लगाया. खुशी दुबे को बिना वजह जेल में बंद रखने का मुद्दा उठाया.

  • बीजेपी ने ब्राह्मणों को मनाने के लिए 16 सदस्यों की कमेटी बनाई, जिसमें अजय मिश्र टेनी को भी शामिल किया गया. कमेटी का काम था कि सरकार ने ब्राह्मणों के लिए जो काम किए हैं, उन्हें उन तक पहुंचाना.

  • कांग्रेस ने विकास दुबे कांड में मारे गए अमर दुबे की पत्नी खुशी दुबे की बहन को कानपुर की कल्याणपुर सीट से टिकट दिया. टिकट देने के बाद कांग्रेस ने कहा, बीजेपी सरकार कानपुर की बेटी खुशी दुबे को महीनों से जेल में डालकर प्रताड़ित कर रही है. कांग्रेस ने पीड़िता की मां गायत्री तिवारी को टिकट देकर उनका हाथ मजबूत करने का फैसला किया है. वर्ग, जाति, धर्म चाहे जो हो, जहां भी कोई पीड़ित है, कांग्रेस उसके साथ खड़ी है.

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यूपी की राजनीति में एक कहावत है. ब्राह्मण अपने वोट के साथ 10 वोट और लेकर आता है. यानी सीटों के अलावा ब्राह्मण एक इन्फ्लूएंसर की भूमिका में भी रहा है. पिछले 32 साल में भले ही कोई ब्राह्मण चेहरा सीएम न बना हो, लेकिन दूसरी पार्टियों की सरकार बनवाई है. अच्छी बार्गेनिंग पावर होने की वजह से सत्ता के करीब ही रहें हैं. एकमुश्त वोट उसी पार्टी को करते हैं जिनके जीतने की उम्मीद ज्यादा होती है. अबकी बार ये वोटर देख रहा है कि कहां पर ज्यादा संभावना है. ऐसे में परसेप्शन महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. गैर यादव ओबीसी की तरह ही ब्राह्मण वोटर का जुड़ाव पहले की तुलना में बीजेपी से कम हुआ है. ऐसे में टिकट बंटवारे और जोड़तोड़ के जरिए बीजेपी इस डेंट को जितना ठीक कर पाएगी उतना कम नुकसान होगा.

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