राजस्थान के अलवर जिले में मतदाताओं के नाम हटाने के लिए हजारों 'फॉर्म-7' जमा किए जाने के करीब एक महीने बाद भी प्रशासन ने यह पता लगाने के लिए कोई ठोस जांच शुरू नहीं की है कि ये फॉर्म कहां से आए, किसने जमा किए और क्या इनमें फर्जी साइन किए गए थे.
भारत में वोटर लिस्ट से किसी का नाम कटवाने के लिए 'फॉर्म-7' का इस्तेमाल किया जाता है.
द क्विंट के पास मौजूद इन फॉर्म्स की कॉपियों से पता चलता है कि इनमें से ज्यादातर फॉर्म बीजेपी (BJP) के बूथ लेवल एजेंटों (BLAs) के नाम पर भरे गए थे. इन फॉर्म्स के जरिए मुख्य रूप से अलवर ग्रामीण इलाके के मुस्लिम वोटरों को निशाना बनाया गया था.
इस पूरी साजिश को समझने के लिए रिपोर्टर ने उन एजेंटों (BLAs) से बात की जिनके नाम इन फॉर्म्स पर 'आपत्तिकर्ता' के तौर पर दर्ज थे. साथ ही, इलाके के बूथ लेवल अधिकारियों (BLOs) और प्रशासन के उन लोगों से भी जानकारी जुटाई गई जो इस मामले से वाकिफ हैं, ताकि यह पता चल सके कि यह खेल कैसे रचा गया और प्रशासन इसकी जांच करने से क्यों कतरा रहा है.
मामला क्या है: नाम हटाने के लिए बड़ी संख्या में फॉर्म-7 जमा किए गए
जनवरी 2026 के मध्य में, अलवर में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने बड़ी संख्या में फॉर्म-7 एप्लीकेशन पर चिंता जताई, जो वोटर लिस्ट से नाम हटाने के लिए रिटर्निंग ऑफिसर की टेबल पर जमा किए गए थे.
द क्विंट ने जब इन आरोपों की पड़ताल की, तो ये बातें सामने आईं:
सैकड़ों फॉर्म ऐसे लोगों के नाम पर भरे गए थे जो मुस्लिम समुदाय से ताल्लुक रखते हैं, जैसे कि साहुन, रमजान, नवाब और नासिर.
कई फॉर्मों पर लिखावट (हैंडराइटिंग) एक जैसी दिख रही थी और वे कंप्यूटर से तैयार किए हुए लग रहे थे. इससे शक पैदा होता है कि ये फॉर्म फर्जी तरीके से बनाए गए.
खबरों के मुताबिक, फॉर्मों के कुछ बंडल तो चुनावी पंजीकरण अधिकारी (ERO) की मेज पर ऐसे ही छोड़ दिए गए थे, जिनमें आवेदन करने वाले का कोई अता-पता या कॉन्टैक्ट डिटेल भी नहीं थी.
BLO और BLA का खुलासा
इस रिपोर्टर ने अलवर के 10 बूथ लेवल एजेंटों (BLAs) और बूथ लेवल अधिकारियों (BLOs) से बात की, जिन्होंने इन फॉर्म्स को लेकर चौंकाने वाले दावे किए हैं. उनमें से कई लोगों ने इशारा किया कि उनके फर्जी साइन किए गए और उनके नाम का गलत इस्तेमाल हुआ.
"मेरे अपने परिवार के लोगों के नाम भी हटाने की सूची में शामिल थे," बेरा वास गांव में बीजेपी के बीएलए नवाब ने कहा. "मुझे नहीं पता कि मेरे फर्जी दस्तखत किसने किए," उन्होंने आगे कहा.
कई BLOs ने भी इसी तरह की बातों की पुष्टि की है. एक BLO ने अनौपचारिक बातचीत में बताया,
"हमें ऐसे फॉर्म थमा दिए गए जिनमें उन आवेदकों के नाम थे जिनसे हम कभी मिले ही नहीं. जिन लोगों के इन फॉर्म्स पर साइन थे, उनमें से कई ने हमसे संपर्क किया और कहा कि उन्हें पता ही नहीं कि इन फॉर्म्स पर उनका नाम कैसे आया."
कई बीएलओ ने यह भी चिंता जताई कि इन फॉर्मों में या तो कॉन्टैक्ट की जेनरिक (सामान्य) जानकारी दी गई थी या फिर कोई डिटेल था ही नहीं, जिससे उनकी असलियत की जांच करना नामुमकिन हो गया.
इसके बावजूद, प्रशासन ने इन फॉर्म्स या इन्हें जमा करने वालों के खिलाफ किसी भी तरह की जांच या ऑडिट की जानकारी साझा नहीं की है. BLAs ने द क्विंट को बताया कि उन्हें अभी तक पूछताछ के लिए भी नहीं बुलाया गया है.
मामले की जांच नहीं
'फॉर्म-7' का इस्तेमाल बेहद सख्त नियमों के तहत ही किया जा सकता है. इसका इस्तेमाल किसी वोटर के नाम पर आपत्ति जताने, या फिर किसी की मौत होने, दूसरी जगह चले जाने (माइग्रेशन) या दो जगह नाम होने की स्थिति में उसे हटाने के लिए होता है. यह अपनी मर्जी से किसी का नाम काटने का जरिया नहीं है. 'निर्वाचन पंजीकरण नियम' और 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम' (RP Act) के तहत, किसी भी नाम को हटाने से पहले चुनाव अधिकारियों के लिए उसकी जांच और वेरिफिकेशन करना अनिवार्य है.
वोट देने के अधिकार से वंचित करने की नीयत से फर्जी फॉर्म भरना या उन पर फर्जी साइन करना एक दंडनीय अपराध है. जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा-31 के तहत ऐसा करने पर जेल या जुर्माना (या दोनों) हो सकता है.
हैरानी की बात यह है कि अलवर में इतना सब कुछ होने के बावजूद अब तक न तो कोई FIR दर्ज की गई है, न ही कोई प्रशासनिक जांच बैठाई गई है. यहां तक कि उन फॉर्म्स पर मौजूद हैंडराइटिंग या वे डिजिटल तौर पर कहां से आए, इसकी भी कोई फॉरेंसिक जांच नहीं हुई है.
इस पूरे मामले से वाकिफ सूत्रों ने द क्विंट को बताया कि प्रशासन की कोशिश बस इतनी है कि यह कहकर मामले को रफा-दफा कर दिया जाए कि "किसी का नाम लिस्ट से कटा तो नहीं है."
अलवर के एक चुनाव अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया,
"नाम इसलिए नहीं कट पाए क्योंकि इस मामले में साजिश पहले ही पकड़ी गई. लेकिन क्या होगा अगर ऐसे और भी मामले हों जो सामने ही न आए हों? पूरा जोर इस बात पर होना चाहिए था कि ये फॉर्म आखिर जमा किसने किए, लेकिन अब तक इस दिशा में कोई कोशिश नहीं हुई है."
एक अन्य चुनाव अधिकारी ने इलेक्शन रिटर्निंग ऑफिसर (ERO) के स्तर पर हुई कई बड़ी लापरवाहियों की ओर इशारा किया. उन्होंने कहा, "नियमों के मुताबिक, अगर ERO के पास फिजिकल (कागजी) फॉर्म आते हैं, तो उन्हें BLO के पास भेजने से पहले ऑनलाइन अपलोड करना जरूरी है. यह कैसे मुमकिन है कि ERO के पास इतने सारे फॉर्म आए और उन्हें इस प्रक्रिया पर कोई शक नहीं हुआ? इन फॉर्म्स को ऑनलाइन अपलोड करने के बजाय सीधे BLOs को क्यों भेज दिया गया?"
(इस मामले में चल रही जांच की स्थिति जानने के लिए संबंधित जिला मजिस्ट्रेट (DM) और एसडीएम (SDM) को कई बार फोन किया गया, लेकिन उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं मिला. जैसे ही उनका पक्ष सामने आएगा, इस खबर को अपडेट किया जाएगा.)
कई राज्यों में दिखा ऐसा पैटर्न
वोटर लिस्ट के 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' (SIR) यानी खास सुधार प्रक्रिया के दौरान इस तरह की घटनाएं दूसरे राज्यों में भी सामने आई हैं:
उत्तर प्रदेश के विभिन्न इलाकों में बीएलओ ने बताया कि उन्हें फॉर्म-7 से भरे लिफाफे मिले, जिनमें मुस्लिम मतदाताओं के नाम हटाने की मांग की गई थी. हालांकि कई आवेदनों में आवेदक की जानकारी गलत थी या बिल्कुल नहीं थी. कई लोगों ने यह भी कहा कि उन्होंने ऐसे किसी आवेदन पर हस्ताक्षर नहीं किए.
मेरठ में उस समय ग्रामीणों ने विरोध प्रदर्शन किया, जब 200 लोगों के नाम गलत तरीके से मृत या पलायन कर चुके बताकर सूची से हटाने के लिए चिह्नित किए गए. ये फॉर्म पहले से भरे हुए थे. अधिकारियों ने कहा कि वे यह पता नहीं लगा सके कि ये फॉर्म कहां से आए.
कैसे हो सकती है इस मामले की जांच?
इस पूरे मामले की जांच के कई तरीके हो सकते हैं. यहां यह गौर करना जरूरी है कि कर्नाटक के आलंद में भी 'फॉर्म-7' के गलत इस्तेमाल का ऐसा ही एक मामला सामने आया था, जिसकी जांच वहां एक स्पेशल इन्वेस्टिगेटिंग टीम (SIT) कर रही है.
कई लॉ एनफोर्समेंट अधिकारियों से बात करने के बाद, रिपोर्टर ने उन तरीकों की एक सूची बनाई है, जिसके जरिए इस मामले की जांच की जा सकती है:
1. फॉर्म की फॉरेंसिक जांच: फॉर्म की हैंडराइटिंग और डिजिटल फॉरेंसिक जांच होना बहुत जरूरी है. एक्सपर्ट्स को इन बातों का पता लगाना चाहिए:
क्या अलग-अलग फॉर्मों में लिखावट एक जैसी है
प्रिंट किए हुए फॉर्म का स्रोत (अगर कंप्यूटर से भरे गए हैं)
स्कैन या प्रिंट किए गए डॉक्यूमेंट का मेटाडेटा
जांच में यह भी देखा जाना चाहिए कि क्या इसके लिए कोई पेन ड्राइव, पहले से तैयार टेम्पलेट या पहले से भरे हुए फॉर्म्स के बंडल बांटे गए थे.
2. चेन ऑफ कस्टडी: अधिकारियों को इन बातों का ब्योरा देना चाहिए:
फॉर्म किसने प्राप्त किए
वे कब और किस तरीके से ERO (निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी) को सौंपे गए
कार्यालय में CCTV फुटेज या एंट्री से जुड़े कोई रिकॉर्ड उपलब्ध हैं या नहीं
आवेदनों की प्राप्ति से संबंधित कोई लॉगबुक या रजिस्टर दर्ज है या नहीं
क्या फॉर्म जमा करने का कोई लॉगबुक या रजिस्टर में एंट्री है? इससे पता चल सकेगा कि गड़बड़ी की शुरुआत कहां से हुई.
3. फॉर्म पर जिनके कथित साइन हैं उनसे पूछताछ: आवेदक के रूप में दर्ज हर व्यक्ति से अलग-अलग संपर्क कर शपथपूर्वक यह दर्ज किया जाना चाहिए कि उन्होंने:
क्या उन्होंने खुद फॉर्म जमा किया था?
क्या वे फॉर्म पर मौजूद साइन को पहचानते हैं?
क्या उन्होंने किसी और को अपनी ओर से फॉर्म जमा करने की अनुमति दी थी?
गलत बयान जालसाजी के सबूत हो सकते हैं.
4. प्रशासनिक चुप्पी की जांच: डीएम (DM) और एसडीएम (SDM) जैसे बड़े अधिकारियों ने इस मामले पर चुप्पी क्यों साधी हुई है, इसकी भी जांच होनी चाहिए:
क्या राजनीतिक दबाव की वजह से वे इस मामले से बच रहे हैं?
एक्शन की बात को दर्ज तो किया गया लेकिन कार्रवाई नहीं हुई?
क्या इन फॉर्मों को लेकर आंतरिक पत्राचार या संवाद का कोई रिकॉर्ड मौजूद है?
सूचना के अधिकार (RTI) के जरिए प्रशासन को ये जानकारियां देने के लिए मजबूर किया जा सकता है.
5. FIR और कोर्ट की निगरानी: फर्जी साइन करना और बड़े पैमाने पर लोगों को वोट के अधिकार से वंचित करने की कोशिश करना एक अपराध है. जहां भी गड़बड़ी के सबूत मिलें, वहां तुरंत FIR दर्ज होनी चाहिए. अगर प्रशासन ऐसा नहीं करता है, तो हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाकर न्यायिक जांच (Judicial Probe) की मांग की जा सकती है.
(हिंदी अनुवाद: नौशाद मलूक)
