प्राचीन शहर वाराणसी में, जहां गंगा को हमेशा पवित्रता और आस्था के प्रतीक के रूप में देखा जाता है, वहां ऐसा लगता है कि न्याय का पलड़ा चिकन बिरयानी के बोझ तले झुक गया है. धार्मिक असहिष्णुता और न्यायिक अतिरेक की एक नई मिसाल बनते इस मामले में 14 लोग हिंसा या चोरी के लिए नहीं, बल्कि नाव पर इफ्तार पार्टी करने के आरोप में जेल में हैं.
एफआईआर के मुताबिक, अपराध चिकन बिरयानी खाने और बचे हुए खाने को कथित तौर पर नदी में फेंकने का है. लेकिन अधिकारियों का दावा है कि यह काम "जानबूझकर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने" के लिए किया गया था.
15 मार्च को हुई यह घटना अब एक वायरल सोशल मीडिया क्लिप से बढ़कर ऐसे कानूनी तमाशे में बदल चुकी है, जिसने भारत के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने की कमजोर पड़ती नसों को उजागर कर दिया है.
जहां पुलिस और न्यायपालिका गंगा की पवित्रता और आरोपियों की कथित बुरी नीयत के इर्द-गिर्द घूम रही है, वहीं जमीनी हकीकत इससे कहीं ज्यादा परेशान करने वाली तस्वीर पेश कर रही है. यह तस्वीर एक ऐसी न्याय व्यवस्था की है, जो धार्मिक संवेदनशीलता के प्रदर्शन में इतनी तत्पर दिखाई दी कि उसने जनाक्रोश के दबाव में विधिसम्मत प्रक्रिया को पीछे छोड़ दिया और एक धार्मिक भोजन से जुड़े मामले को गैर-जमानती अपराध में बदल दिया.

