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क्या नेपाल का लोकतंत्र अपने राजनीतिक उतार-चढ़ाव को सह पाएगा?

नेपाल के लोकतांत्रिक विरोध ने कमजोर शासन और स्थिरता के लिए सुधार व भारत के समर्थन की जरूरत दिखा दी है.

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यह नेपाल की घरेलू शांति (Nepal Crisis) और सुरक्षा के मानकों का ही परिणाम है कि सोशल मीडिया ऐप्स पर सरकार की पाबंदी से भड़के छात्र आंदोलन में उन्नीस लोगों की जान गई और सत्ता में बैठी सरकार गिर गई.

इस घटना को एक बार की बात समझकर नजरअंदाज करना सही नहीं होगा. इसे सिर्फ किसी विदेशी साजिश बताना जैसे बांग्लादेश (2024) में या उससे पहले श्रीलंका (2022) में कहा गया था भी पूरी तरह से स्पष्ट नहीं लगता. सबसे जरूरी है कि नेपाल की राजनीतिक उथल पुथल झेलने की क्षमता को मजबूत किया जाए.

एक जीवंत लोकतंत्र की बुनियाद एक मजबूत बहुदलीय व्यवस्था होती है, जिसमें संस्थागत नियंत्रण और संतुलन शामिल हों ताकि कानून का शासन कायम रहे, चाहे वह सत्ताधारी दल के खिलाफ ही क्यों न हो. यही वह बिंदु है जहां कई विकासशील देशों की सरकारें कसौटी पर खरी नहीं उतरतीं. जटिल शासकीय ढांचे और प्रक्रियाएं शासकों को जनता से दूर कर देती हैं और प्रशासन में एक धुंध पैदा कर देती हैं, जिससे नागरिकों के हित में काम करने की बजाय स्वार्थी होना आसान हो जाता है.
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