संसद में एक सवाल के जवाब में भारत सरकार ने कहा कि “…ऐसा कोई पक्का डेटा नहीं है जो ज्यादा AQI लेवल और फेफड़ों की बीमारियों के बीच सीधा संबंध साबित करे…”
यह बात टेक्निकली सही लगती है (हालांकि यह इस बात को नजरअंदाज करती है कि बताए गए रिस्पॉन्स से फेफड़ों की इलास्टिसिटी और कैपेसिटी पर बुरा असर पड़ सकता है, जिसका संकेत सरकार के जवाब में आगे दिया गया है).
जनस्वास्थ्य में किसी बीमारी के कारण तय करना आसान नहीं होता. इसके लिए लंबे समय तक और स्थानीय स्तर पर जुटाए गए भरोसेमंद आंकड़ों की जरूरत होती है. यह भी सच है कि अब तक हमें ऐसी कोई भयावह स्थिति नहीं झेलनी पड़ी है जहां खराब हवा से लोगों की तुरंत मौत हुई हो (जिसके लिए हमें साफ तौर पर शुक्रगुजार होना चाहिए!).
इसके बावजूद, चिंता की बात यह है कि हमने इस हालात को सामान्य मान लिया है. हम हमेशा की तरह चल रहे हैं, जबकि महामारी के बाद यह सबसे बड़ा जनस्वास्थ्य खतरा है. फिर भी, इस मुद्दे को मीडिया में बहुत कम जगह मिलती है और सार्वजनिक चर्चा में तो और भी कम.
