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AQI संकट: भारत में पब्लिक हेल्थ सुरक्षा के लिए जरूरी डेटा अभी भी क्यों नहीं है?

जस्टिन एम. भरूचा लिखते हैं कि भारत में अभी भी भरोसेमंद नीतियां बनाने के लिए जरूरी मॉनिटरिंग ढांचा नहीं है.

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संसद में एक सवाल के जवाब में भारत सरकार ने कहा कि “…ऐसा कोई पक्का डेटा नहीं है जो ज्यादा AQI लेवल और फेफड़ों की बीमारियों के बीच सीधा संबंध साबित करे…”

यह बात टेक्निकली सही लगती है (हालांकि यह इस बात को नजरअंदाज करती है कि बताए गए रिस्पॉन्स से फेफड़ों की इलास्टिसिटी और कैपेसिटी पर बुरा असर पड़ सकता है, जिसका संकेत सरकार के जवाब में आगे दिया गया है).

जनस्वास्थ्य में किसी बीमारी के कारण तय करना आसान नहीं होता. इसके लिए लंबे समय तक और स्थानीय स्तर पर जुटाए गए भरोसेमंद आंकड़ों की जरूरत होती है. यह भी सच है कि अब तक हमें ऐसी कोई भयावह स्थिति नहीं झेलनी पड़ी है जहां खराब हवा से लोगों की तुरंत मौत हुई हो (जिसके लिए हमें साफ तौर पर शुक्रगुजार होना चाहिए!).

इसके बावजूद, चिंता की बात यह है कि हमने इस हालात को सामान्य मान लिया है. हम हमेशा की तरह चल रहे हैं, जबकि महामारी के बाद यह सबसे बड़ा जनस्वास्थ्य खतरा है. फिर भी, इस मुद्दे को मीडिया में बहुत कम जगह मिलती है और सार्वजनिक चर्चा में तो और भी कम.

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हकीकत यह है कि खराब होती और तेजी से बिगड़ती जा रही वायु गुणवत्ता हम सभी को प्रभावित करती है. यह एक वास्तविक चिंता है जिसके गंभीर और कम से कम सीधे तौर पर आर्थिक असर भी पड़ते हैं.

भले ही हमारे राजनेता आज के दौर में जिसे संवाद कहा जाता है, उसमें उलझे रहें, लेकिन सच्चाई यह है कि जिस हवा में हम सांस लेते हैं उस पर कोई राजनीतिक विभाजन नहीं हो सकता.

राजनीति से परे प्रदूषण, जवाबदेही के बिना आंकड़े

मूल सवाल यह है कि क्या केंद्र और राज्यों में मौजूद हमारा तंत्र वायु गुणवत्ता का आकलन करना जरूरी मानता है?

इसका जवाब ‘हां’ ही होना चाहिए, क्योंकि वायु गुणवत्ता का नियमित रूप से आकलन किया जाता है और यह हम जानते हैं कि हमारी हवा प्रदूषित है और प्रदूषण नुकसानदेह है.

सरकार यह तर्क दे सकती है कि प्रदूषण मानकों को देश की आर्थिक और विकास संबंधी जरूरतों के हिसाब से तय किया जा रहा है, क्योंकि विकासशील देशों को महत्वाकांक्षा और व्यावहारिकता के बीच संतुलन बनाना पड़ता है. लेकिन यह तर्क न तो निष्क्रियता को सही ठहरा सकता है और न ही पारदर्शिता की कमी को.

अगर राष्ट्रीय हित के नाम पर अधिक प्रदूषण सहना जरूरी माना जा रहा है, तो उस हित को साफ और स्पष्ट शब्दों में सामने रखा जाना चाहिए.

हमें यह तय करना होगा कि प्रदूषण के प्रमुख स्रोत राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप हैं या लापरवाही से लागू करने का नतीजा हैं. यह एक बुनियादी सवाल है, लेकिन इससे भी ज्यादा अहम एक और समस्या है- हमें यह पता है कि हमें बहुत कुछ पता ही नहीं है.

इसी संदर्भ में संसद में सरकार का जवाब सही भी हो सकता है कि फिलहाल हमारे पास इतना डेटा नहीं है, जिससे वायु प्रदूषण और फेफड़ों की बीमारियों के बीच कारण परिणाम का सीधा संबंध साबित किया जा सके.

लेकिन हमें यह भी नहीं पता कि इस मूल समस्या पर डेटा को व्यवस्थित तरीके से इकट्ठा करने के लिए कोई ठोस और गंभीर कोशिश हो भी रही है या नहीं.

फिर भी इतना तो सरकार के उसी जवाब से साफ है कि दोनों के बीच कोई न कोई संबंध जरूर है क्योंकि लेख की शुरुआत में उद्धृत सरकारी जवाब के अंत में वायु प्रदूषण से निपटने के लिए चलाई जा रही सरकारी पहलों का जिक्र किया गया है.

मुंबई ‘न जानने’ के मामले में एक केस स्टडी है

दिल्ली के अलावा, मुंबई भी यह दिखाता है कि हमारे पास सार्थक और भरोसेमंद डेटा की कितनी कमी है. शहर में वायु गुणवत्ता मॉनिटरों का वितरण असमान है.

कई इलाकों में निगरानी बेहद सीमित है, और कई जगहों पर तो कोई मॉनिटर मौजूद ही नहीं है. ये खाली जगहें ऐसे ब्लाइंड स्पॉट बनाती हैं, जो शहर की हवा को लेकर हमारी समझ को विकृत कर देती हैं.

नेवी नगर (कोलाबा) इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण है. यहां लगाया गया सेंसर लगातार खराब वायु गुणवत्ता दर्ज करता है, जबकि इस इलाके में न तो उद्योग हैं और न ही मुंबई के मानकों के हिसाब से कोई खास निर्माण गतिविधि.

तो फिर यह प्रदूषण आखिर आ कहां से रहा है. क्या नेवी नगर के हर इलाके में सेंसर लगाए जाएं, तो क्या सभी जगह इसी तरह के नतीजे मिलेंगे, जो यह संकेत दे कि स्थानीय स्तर पर प्रदूषण लगातार ज्यादा है.

क्या इस इलाके में कंस्ट्रक्शन का काम, कम या ज्यादा, इस प्रदूषण की वजह बन रहा है? या फिर प्रधान हवाएं, और रोजाना जमीन और समुद्र की हवा इस प्रदूषण को नेवी नगर के सेंसर तक पहुंचा रही है.

और इस प्रदूषण का वहां रहने और आने-जाने वालों पर, खासकर बच्चों, बुजुर्गों, और शहरी जीव-जंतुओं, वनस्पतियों पर क्या असर डाल रहे हैं.

हम बस इतना जानते हैं कि हमें कुछ नहीं पता

यहीं पर हाइपरलोकल सेंसर अनिवार्य हो जाते हैं. छोटे और अपेक्षाकृत कम लागत वाले उपकरण, हाई ग्रेड मॉनिटरों के साथ मिलकर, अलग अलग इलाकों में सूक्ष्म पर्यावरणीय बदलावों को दर्ज कर सकते हैं.

ये सेंसर यह दिखाते हैं कि प्रदूषण गली दर गली कैसे बदलता है, पैदल चलने वालों की ऊंचाई पर इसका स्तर क्या है, और मुंबई जैसे वर्टिकल शहर में अलग अलग ऊंचाइयों पर हवा की गुणवत्ता कैसी है. इससे AQI के आंकड़े अमूर्त औसत से निकलकर लोगों के रोजमर्रा के अनुभव से जुड़ते हैं.

AQI संकट के इस दौर में ऐसे डेटा को और मजबूत किया जा सकता है, और किया जाना भी चाहिए। इसके लिए नागरिक और समुदाय संगठित और स्वैच्छिक रूप से स्वीकृत कम लागत वाले सेंसर लगाएं, ताकि अभी कमजोर और विरल निगरानी नेटवर्क को ज्यादा सघन बनाया जा सके.

इस मामले में, महाराष्ट्र पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड, CSIR-नेशनल एनवायर्नमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (NEERI), और IIT बॉम्बे की मुंबई के लिए एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग, एमिशन इन्वेंटरी, और सोर्स अपॉर्शनमेंट स्टडी अपने मेथड के लिए सबसे अलग है.

लेकिन यही सख्ती उन ढांचागत डेटा कमियों को भी उजागर करती है, जो अब भी शहर में प्रभावी वायु गुणवत्ता प्रबंधन में बाधा बनी हुई हैं.

रिपोर्ट दो बड़ी कमियों की ओर इशारा करती है. पहली, वार्ड स्तर पर निगरानी की कमी. दूसरी, मुंबई को पूरे मुंबई महानगर क्षेत्र यानी एमएमआर के एयरशेड के हिस्से के रूप में न देख पाना, जिससे पूरे क्षेत्र में फैले प्रदूषण के संदर्भ में शहर की हवा को बेहतर समझा जा सके.

इन दोनों मुद्दों पर अब तक काम नहीं हो पाया है, और इसी वजह से हमारे पास जरूरी और पर्याप्त डेटा की कमी बनी हुई है.

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आंखों पर पट्टी बांधकर चलने की कीमत

इस डेटा की कमी के ठोस और वास्तविक नतीजे सामने आते हैं.

  • जनस्वास्थ्य से जुड़ी पहलें अक्सर प्रतिक्रिया के तौर पर दिखती हैं.

  • आर्थिक विश्लेषण में प्रदूषण से जुड़ी उत्पादकता में कमी को शामिल ही नहीं किया जाता.

  • नियामक निगरानी और नियमों का अमल ऐसे हालात में होता है, जहां भरोसेमंद डेटा मौजूद नहीं होता.

  • लोग न्याय के लिए अदालतों का रुख करते हैं, लेकिन अदालतें भी डेटा की कमी वाले माहौल में काम कर रही हैं.

इसकी ताजा मिसाल 22 दिसंबर वाले हफ्ते में बॉम्बे हाई कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान देखने को मिली. अदालत ने निर्माण स्थलों पर बीएमसी की निगरानी की सीमा पर सवाल उठाए, और यह भी दर्ज किया कि लगाए गए कई सेंसर काम ही नहीं कर रहे थे.

इन सबके बीच हमें यह समझना होगा कि हमारी हवा हमारे स्वास्थ्य, पैसों और समाज पर कितना भारी असर डाल रही है. साथ ही, हमें खुद को ऐसी जानकारी और भरोसेमंद आंकड़ों से लैस करना होगा, जो नुकसान को कम करने, परिस्थितियों के अनुसार ढलने और सोच-समझकर फैसले लेने में मदद करें.

लेकिन, विश्वसनीय डेटा के बिना यह सब संभव नहीं है.

अपनी वास्तविकताओं के अनुरूप मानक तय करना तभी सार्थक हो सकता है, जब उन मानकों का ईमानदारी से आकलन किया जाए, और उन लागतों को भी स्वीकार किया जाए, जिन्हें उठाने का फैसला हमने अब तक किया है.

राष्ट्रीय प्रदूषण की कहानी में दिल्ली हावी रहती है, क्योंकि वहां की सर्दियों की स्मॉग बेहद नाटकीय और साफ दिखाई देती है. लेकिन बाकी शहरों को इस पर किसी तरह की तसल्ली नहीं लेनी चाहिए.

मुंबई को फिर से उदाहरण के तौर पर लें, तो मुंबई महानगर क्षेत्र में लंबे समय तक ऐसे दौर आते हैं, जब पीएम 2.5 का स्तर भारत के पहले से ही ढीले मानकों से भी ऊपर चला जाता है.

तटीय भौगोलिक स्थिति, तेज रफ्तार निर्माण गतिविधियां, औद्योगिक बाहरी इलाके और वाहनों की भीड़, ये सभी मिलकर एक ऐसे दीर्घकालिक प्रदूषण को जन्म देते हैं, जिस पर शायद ही कभी लगातार ध्यान दिया जाता है.

हमारा संकट देखने में कम नाटकीय है, लेकिन इससे यह कम नुकसानदेह नहीं हो जाता. यह बात हमारे देश के लगभग हर शहरी समूह पर समान रूप से लागू होती है.

इससे मिलने वाली सीख सीधी है. हाई ग्रेड मॉनिटरों का एक मजबूत नेटवर्क जरूरी है, और घनी आबादी वाले शहरी माहौल में इसे कैलिब्रेटेड सेंसरों के एक सघन नेटवर्क से पूरक करना ही होगा.

सीख साफ है. हमें उच्च गुणवत्ता वाले मॉनिटरों का एक मजबूत नेटवर्क चाहिए और घनी आबादी वाले शहरी इलाकों में इसे कैलिब्रेटेड सेंसरों के घने नेटवर्क से जोड़ना होगा.

इससे मिलने वाला डेटा नियामकों के बीच साझा किया जाए और आम लोगों के लिए रियल-टाइम में उपलब्ध हो, ताकि सीमित आंकड़ों के आधार पर बड़े अनुमान लगाने की मजबूरी न रहे.

हमें एक मजबूत डेटा स्पाइन बनानी होगी. मुंबई इस दिशा में कुछ प्रगति कर रहा है—निर्माण स्थलों पर मॉनिटर लगाने और उन्हें मौजूदा सेंसरों से जोड़ने का प्रस्ताव है—लेकिन फिलहाल यह योजना स्तर पर ही है.

चूंकि आने वाले समय में हमारे प्रदूषण मानक अमीर देशों से अधिक रहने वाले हैं, इसलिए सटीक मापन की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है.

प्रदूषण के स्रोतों और उसके प्रभावों को समझे बिना उसे सहन करना, खुद के प्रति और देश के सबसे कमजोर लोगों के प्रति हमारी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ना है.

(जस्टिन एम. भरूचा, भरूचा एंड पार्टनर्स के मैनेजिंग पार्टनर हैं. यह एक ओपिनियन लेख है और इसमें व्यक्त किए गए विचार लेखक के अपने हैं. द क्विंट न तो इन्हें समर्थन करता है और न ही इसकी जिम्मेदारी लेता है.)

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