आज मैं सबसे विषाद ग्रस्त पंक्तियां लिख सकती हूं
महाकवि पाब्लो नेरूदा ने हर परिस्थिति में मेरे लिए काम किया है. लेकिन आजकल ऐसा नहीं हो रहा और इस पर हैरत नहीं होनी चाहिए. आजकल वैसे भी कुछ काम नहीं कर रहा. सरकारी पोर्टल, अस्पतालों के नंबर, मंत्री साहब की सिफारिश, कालाबाजारियों से खरीदी गईं महंगी दवाएं, खराब ऑक्सीजन कॉन्सेनट्रेटर्स.
शहरों पर सामूहिक दुख का साया मंडरा रहा है, वह मातम का आदी होता जा रहा है, ऐसा लगता है, सभी शोक में हैं, लेकिन कोई शोक नहीं मना रहा. चूंकि शोक मनाने की बजाय कुछ और करने की जरूरत है, कोई दूसरी जिंदगी बचानी है, या किसी दूसरे प्रियजन का अंतिम संस्कार करना है.

