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"बुलडोजर की धमकी दे पुलिस ने अंगूठा लगवाया", बरेली नमाज विवाद में अदालत सख्त

अदालत ने कहा- "हसीन खान के खिलाफ कोई घटना होती है, तो प्रथम दृष्टया यह माना जाएगा कि यह राज्य के इशारे पर हुई."

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ईद-उल-फितर से पहले पड़ने वाले आखिरी शुक्रवार (जुम्मत-उल-विदा) को उत्तर प्रदेश के बरेली के मोहम्मदगंज गांव की तस्वीर बदली हुई थी. गांव में पुलिस के पहरे के बीच करीब 15-20 लोगों ने जुमे की नमाज अदा की. ये नमाज करीब दो महीने की रोक के बाद पढ़ी गई. गांव के ही रहने वाले हसीन खान, जिनके घर पर नमाज अदा की जा रही थी, उनकी सुरक्षा में दो सशस्त्र गार्ड तैनात थे. यह सुरक्षा उन्हें किसी बाहरी खतरे से नहीं, बल्कि खुद प्रशासन के कथित दबाव से बचाने के लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश पर दी गई है.

हसीन खान कहते हैं, "16 जनवरी को हमें अपने ही घर में नमाज पढ़ने की वजह से पुलिस ने हिरासत में लिया था. हमारा चालान हुआ. तब से लेकर अब तक हम लोग कानूनी उलझन में हैं. तब से लेकर अब तक हम लोगों को अपने ही घर में नमाज पढ़ने नहीं दिया गया है. रमजान का महीना है, फिर भी हम लोग जुमे की नमाज गांव में नहीं पढ़ पाए थे. लेकिन अब इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश के बाद हम लोग जुमे की नमाज पढ़ पाए."

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दरअसल, 16 जनवरी 2026 को मोहम्मदगंज गांव के कुछ मुसलमान जुमे की नमाज के लिए हसीन खान के एक निजी खाली पड़े घर में नमाज के लिए जमा हुए थे. इसी दौरान गांव के कुछ लोगों ने पुलिस को अवैध मस्जिद और मदरसे बनने की शिकायत की. पुलिस ने शिकायत के आधार पर करीब 12 लोगों को हिरासत में लिया और फिर मजिसट्रेट के सामने 151 में चालान हुआ.

जिसके बाद नमाज पर रोक और चालान को लेकर मोहम्मदगंज गांव के रहने वाले तारिक खान ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की थी. तब हाइकोर्ट ने इस मामले पर बरेली के डीएम अविनाश सिंह और एसएसपी अनुराग आर्य के खिलाफ अवमानना का नोटिस जारी किया था. अब इस मामले पर 11 मार्च को सुनवाई हुई, जिसमें कुछ चौंकाने वाली बात भी सामने आई है.

जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की बेंच के सामने हसीन खान ने बताया कि उन्हें पुलिस ने डरा-धमकाकर एक सादे कागज पर अंगूठा लगवाया और एक वीडियो भी शूट किया.

हसीन खान कहते हैं, "मेरे गांव के दो लोग- आरिफ प्रधान और मुख्तियार ने मुझसे कहा कि थाना चलो, एसएचओ साहब बात करेंगे. हमने कहा, फोन पर बात करा दो, तो बोले, नहीं, फोन पर बात नहीं होगी, डायरेक्ट बात होगी. फिर मुझे वो लोग थाने नहीं बल्कि आंवला तहसील लेकर गए, शायद सीओ साहब के ऑफिस में. फिर ये दोनों लोग बाहर निकल गए, हमें अकेला छोड़ दिया. वहां पुलिस आती गई और हमें बाहर निकलने नहीं दिया. 10-12 पुलिस वाले थे, गोल घेरा बनाकर घेर लिया मुझे. फिर सादे कागज पर हमसे अंगूठा लगवा लिया. बोले जैसा हम कहें वैसा ही करो."

हसीन के मुताबिक,

"मुझसे जबरदस्ती यह कहलवाया गया कि मेरी मर्जी के बिना मेरे घर में नमाज हुई है. पुलिस वाले धमकी दे रहे थे कि जैसा हम कह रहे हैं वैसा ही करो, वरना तुम्हारा घर गिरवा देंगे, बुलडोजर चलवा देंगे."

हसीन खान ने यही बात अदालत में भी कही है. जिसके बाद हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए हसीन खान को 24 घंटे सुरक्षा देने का आदेश दिया, बल्कि एक ऐसी टिप्पणी की जिसने राज्य सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है. अदालत ने कहा,

"हसीन खान या उनकी संपत्ति के खिलाफ हिंसा की कोई भी घटना होती है, तो प्रथम दृष्टया यह माना जाएगा कि यह राज्य (State) के इशारे पर हुई है."

इसके साथ ही कोर्ट ने बरेली के जिलाधिकारी (DM) अविनाश सिंह और एसएसपी (SSP) अनुराग आर्य को 23 मार्च को कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से पेश होने का निर्देश दिया है. अदालत ने चेतावनी दी है कि यदि वे उपस्थित होने में विफल रहते हैं, तो उनकी उपस्थिति गैर-जमानती वारंट (non-bailable warrant) के माध्यम से सुनिश्चित की जाएगी.

इस मामले में याचिकाकर्ता तारिक खान का कहना है कि जब अदालत ने प्रशासन को घेरा, तो पुलिस ने हसीन खान पर दबाव बनाकर यह केस बनाने की कोशिश की कि नमाज "जबरन" पढ़ी जा रही थी. तारिक खान कहते हैं,

प्रशासन चाहता था कि हसीन खान के नाम से ये बयान दिलवाया जाए कि हम लोगों ने जबरदस्ती उनके घर में नमाज पढ़ी है, लेकिन ऐसा नहीं था. अगर हसीन खान के घर में बिना इजाजत हम लोग नमाज पढ़ रहे थे तो फिर पुलिस ने जिन लोगों को नमाज पढ़ने की वजह से चालान किया था उसमें हसीन खान क्यों होते?

इस मामले पर क्विंट ने बरेली के एसएसपी अनुराग आर्या से संपर्क करने की कोशिश की. हालांकि उनसे बात नहीं हो सकी है, वहीं द क्विंट ने आंवला, बरेली में क्षेत्राधिकारी (सीओ) नितिन कुमार से भी संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन उनका मोबाइल नंबर बंद आ रहा है. अधिकारियों का पक्ष जानने के बाद खबर को अपडेट किया जाएगा.

कानूनी पेंच: क्या घर में नमाज पढ़ना अपराध है?

इस पूरे विवाद में वह कानून अहम है जिस पर इसी साल जनवरी में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने स्पष्ट फैसला सुनाया था. अदालत ने 'मारनथा फुल गॉस्पेल मिनिस्ट्रीज' के मामले में व्यवस्था दी थी कि संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत, किसी भी व्यक्ति को अपनी निजी संपत्ति के भीतर प्रार्थना करने के लिए सरकार से किसी अनुमति की आवश्यकता नहीं है.

याचिकाकर्ता तारिक खान की याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की डिवीजन बेंच ने कहा था कि यही नियम इस मामले में भी लागू होता है. इसलिए डीएम और एसएसपी की कार्रवाई पहली नजर में कोर्ट के पहले के आदेश की अवमानना लगती है.

तारिक खान कहते हैं, "अदालत ने 12 फरवरी 2026 को मेरी याचिका पर सुनवाई के दौरान आदेश में कहा था कि मेरे खिलाफ किसी भी तरह की जबरदस्ती या प्रताड़ना नहीं होनी चाहिए."

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विवाद के पीछे वजह

क्विंट से बात करते हुए तारिक खान कहते हैं कि यहां 30 साल से बिना किसी दिक्कत के अपने निजी जगहों पर नमाज पढ़ते रहे हैं, लेकिन अब अचानक गांव के कुछ लोगों को इससे दिक्कत होने लगी. कुछ लोगों को लगता है कि मेरी जमीन पर मदरसा बन रहा है. लेकिन ऐसा नहीं है. तारिक कहते हैं कि 1995 में भी इसी तरह का मामला आया था, तब ग्राम सभा की जमीन पर नमाज को लेकर कोई विवाद हुआ था, जिसकी जानकारी भी ठीक से हमें नहीं है. तब से हम लोग सरकारी या किसी और की जमीन नहीं बल्कि निजी जगहों पर नमाज पढ़ते रहे हैं और कभी किसी को कोई दिक्कत नहीं हुई थी.

इस मामले में अंतिम आदेश के लिए अगली सुनवाई 23 मार्च 2026 को दोपहर 2:00 बजे तय की गई है.

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