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पटना NEET छात्रा मौत: 'पुलिस पर भरोसा नहीं', शुरुआती जांच पर क्यों उठ रहे सवाल?

जांच को लेकर 16 जनवरी को DIG ने SIT का गठन किया. अब तक इस मामले में एक गिरफ्तारी हो चुकी है.

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"पटना SSP ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने से पहले ही प्रेस कॉन्फ्रेंस कर झूठे बयान दिए और मेरी बहन की मौत को आत्महत्या दिखाने की कोशिश की. 90 नींद की गोलियां बरामद होना बताया गया, जबकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में यौन उत्पीड़न की बात सामने आई है. पटना पुलिस पर मुझे कोई भरोसा नहीं है."

पटना NEET छात्रा रेप एंड मर्डर केस में पुलिस की शुरुआती जांच पर सवाल उठाते हुए पीड़िता के भाई ने द क्विंट से यह बात कही.

पटना में NEET की तैयारी कर रही जहानाबाद की एक छात्रा की मौत अब केवल संदिग्ध मृत्यु का मामला नहीं रह गया, बल्कि यह पुलिस की जांच, निजी अस्पतालों की भूमिका और होस्टल में रहकर पढ़ाई कर रही छात्राओं की सुरक्षा से जुड़े बड़े सवाल खड़े कर रही है.

पटना पुलिस शुरुआत से ही इस मामले को नींद की दवा के ओवरडोज और आत्महत्या से जोड़ने की कोशिश करती रही, जबकि पीएमसीएच की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में यौन हिंसा और जबरन संघर्ष के संकेत मिले हैं.

परिजनों का आरोप है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने से पहले ही पुलिस ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर एकतरफा नैरेटिव गढ़ दिया. अब पटना पुलिस जांच की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं और शुरुआती जांच को लेकर भी कई आरोप सामने आ रहे हैं.

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पुलिस का पक्ष क्या है?

पटना पुलिस के अनुसार, 9 जनवरी को चित्रगुप्त नगर थाना क्षेत्र के मुन्ना चक स्थित शम्भु हॉस्टल में रह रही छात्रा अपने कमरे में बेहोशी की हालत में पाई गई थी. पुलिस का कहना है कि छात्रा को पहले नजदीकी क्लिनिक ले जाया गया, फिर एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया. हालत गंभीर होने पर परिजन उसे मेदांता अस्पताल ले गए, जहां 11 जनवरी को इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई.

पटना पुलिस के वरीय पुलिस अधीक्षक कार्तिकेय शर्मा ने 13 जनवरी को दावा किया कि अब तक की प्रारंभिक जांच, जिसमें घटनास्थल का निरीक्षण, एफएसएल टीम की जांच, हॉस्टल में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज, हॉस्टल संचालक और वार्डन के बयान, निजी अस्पताल के डॉक्टरों और स्त्री रोग विशेषज्ञ के बयान शामिल हैं, में यौन उत्पीड़न की पुष्टि नहीं हुई है.

पुलिस का यह भी कहना था कि युवती के यूरिन टेस्ट में नींद की दवा का ओवरडोज पाया गया है और उसके मोबाइल फोन की गूगल सर्च हिस्ट्री में आत्महत्या और नींद की गोलियों से जुड़े सर्च मिले हैं.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद पुलिस ने अपना रुख बदला और ट्वीट कर जानकारी दी कि 14 जनवरी को मृतका की पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिली है, जिसमें डॉक्टरों ने यौन हिंसा की संभावना से इनकार नहीं किया है. मामले की गंभीरता को देखते हुए शंभु गर्ल्स हॉस्टल के भवन मालिक मनीष कुमार रंजन को गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया गया है.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट क्या कहती है?

इसके उलट, पीएमसीएच में मेडिकल बोर्ड द्वारा वीडियोग्राफी के साथ किए गए पोस्टमार्टम की रिपोर्ट पुलिस के दावों से मेल नहीं खाती. रिपोर्ट में मृतका के शरीर पर कई बाहरी और अंदरूनी चोटों का जिक्र है. खास तौर पर सिर और गर्दन पर नाखून के खरोंच, सिर में चोट और प्राइवेट पार्ट में गंभीर आंतरिक चोटें दर्ज की गई हैं.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मेडिकल ओपिनियन में साफ तौर पर फोर्सफुल सेक्सुअल इंटरकोर्स और यौन हिंसा के संकेत बताए गए हैं.

रिपोर्ट के अनुसार छात्रा बेहोश नहीं थी और उसने खुद को बचाने की हर संभव कोशिश की. मेडिकल रिपोर्ट में दर्ज नाखून के खरोंच और अन्य एंटे-मॉर्टम चोटें संघर्ष की ओर इशारा करती हैं, जो आत्महत्या या केवल ओवरडोज की थ्योरी पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं.

घटनाक्रम की टाइमलाइन पर सवाल

चित्रगुप्त नगर थाना में 9 जनवरी को दर्ज की गई प्राथमिकी (FIR) के अनुसार, छात्रा 5 जनवरी को जहानाबाद से पटना लौटी थी. उस दिन हॉस्टल में केवल तीन से चार छात्राएं मौजूद थीं.

परिवार के मुताबिक, छात्रा पटना के गर्ल्स हॉस्टल में रहकर दो सालों से नीट की तैयारी कर रही थीं. 5 जनवरी की रात तक छात्रा की अपने माता-पिता से बातचीत हुई थी और वह सामान्य लग रही थी. इसके बाद 6 जनवरी को अचानक किसी अन्य व्यक्ति ने परिजनों को फोन कर बताया कि छात्रा बेहोश है.

छात्रा के भाई ने बताया कि इसी बीच छात्रा को एक स्थानीय अस्पताल ले जाया गया, लेकिन वहां उसे भर्ती नहीं किया गया. इसके बाद हॉस्टल वालों ने उसे डॉ. प्रभात मेमोरियल हिरामती अस्पताल में भर्ती कराया. परिजनों का आरोप है कि वहां दो दिनों तक उनसे कहा जाता रहा कि छात्रा की हालत में सुधार हो रहा है, लेकिन मां के अलावा किसी को भी अंदर जाने की अनुमति नहीं दी गई.

परिवार का कहना है कि जब उन्होंने इसका विरोध किया, तो अस्पताल के गार्डों के साथ धक्का-मुक्की हुई. इसके बाद अस्पताल के हेड डॉक्टर सतीश ने कहा कि यहां इलाज संभव नहीं है और छात्रा को कहीं और ले जाने को कहा गया. परिवार का यह भी आरोप है कि इसी दौरान छात्रा को बेहोशी की भारी डोज दी गई, ताकि उसे होश न आ सके.

छात्रा की मां ने बताया कि अस्पताल में एक बार छात्रा थोड़ी देर के लिए होश में आई. मां के अनुसार, होश में आने पर जब उन्होंने उससे पूछा कि क्या उसके साथ कुछ हुआ है, तो उसने सिर हिलाकर “हां” में जवाब दिया. परिजनों का आरोप है कि इसके तुरंत बाद मां और बेटी को अलग कर दिया गया और छात्रा कोमा में चली गई, जिसके बाद उसकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ. परिवार का ये भी कहना है कि प्रभात मेमोरियल के एक डॉक्टर ने बताया था कि आपकी बच्ची के साथ गलत हुआ है. जिसके बाद परिवार ने एफआईआर दर्ज कराई और छात्रा को 10 जनवरी को मेदांता अस्पताल में भर्ती कराया लेकिन 11 जनवरी की दोपहर छात्रा की मौत हो गई.

पुलिस ने इस मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की कई धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है.

  • धारा 109 – हत्या के प्रयास में मदद करना

  • धारा 76 – महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाना / उस पर हमला करना

  • धारा 126(2) – किसी व्यक्ति को गलत तरीके से रोकना

  • धारा 115(2) – स्वेच्छा से चोट पहुंचाना

  • धारा 3(5) – सामूहिक संलिप्तता / समान आपराधिक मंशा

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हॉस्टल और अस्पताल पर गंभीर आरोप

परिजनों ने प्रेस कांफ्रेंस कर शंभू हॉस्टल के संचालक, वार्डन और भवन मालिक पर गंभीर आरोप लगाए हैं. परिवार का दावा है कि ये लोग पहले से एक संगठित रैकेट चला रहे हैं और घटना के बाद हॉस्टल के कमरे की सफाई कर सबूत मिटाने की कोशिश की गई.

परिवार का आरोप है कि 5 जनवरी की देर रात छात्रा को जबरन कहीं ले जाया गया और वहां उसके साथ यौन उत्पीड़न किया गया. परिजनों का यह भी दावा है कि हॉस्टल संचालक श्रवण अग्रवाल, नीलम अग्रवाल और इमारत के मालिक मनीष रंजन के बीच पहले से एक गठजोड़ है. परिवार का आरोप है कि ये लोग एक रैकेट चलाते हैं और देह व्यापार से जुड़े मामलों में पहले से शामिल रहे हैं.

परिवार का कहना है कि उन्हें हॉस्टल मालिक नीलम अग्रवाल के तरफ से 10 से 15 लाख रुपये का ऑफर दिया गया ताकि वे चुप रहें.

निजी अस्पताल की भूमिका पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं. परिजनों का आरोप है कि डॉ. प्रभात मेमोरियल हिरामती हॉस्पिटल के डॉक्टरों ने यौन हिंसा के संकेतों को नजरअंदाज किया और मामले को दबाने की कोशिश की.

अपने ऊपर लगे आरोपों पर प्रभात मेमोरियल हिरामती हॉस्पिटल के डॉ. सतीश कुमार सिंह ने जांच का हवाला देते हुए फिलहाल मीडिया से दूरी बना ली है. प्रेस नोट जारी कर उन्होंने कहा कि मामले से जुड़ी जो भी जानकारी है, वह जांच टीम द्वारा दी जाएगी.

SHO की भूमिका पर उठते सवाल

छात्रा के मामा ने चित्रगुप्त नगर थाना की SHO रोशनी कुमारी पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं. उनका कहना है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी काफी दबाव के बाद ही परिवार को सौंपी गई.

परिवार का आरोप है कि पुलिस ने शुरू से ही मामले को कमजोर करने की कोशिश की. मामा ने यह भी आरोप लगाया कि SHO ने उन्हें धमकाते हुए कहा कि "10 साल बाद पता चलेगा."

इन आरोपों पर SHO रोशनी कुमारी का पक्ष जानने के लिए जब द क्विंट ने उनसे फोन पर संपर्क करने की कोशिश की, तो उन्होंने केस का नाम सुनते ही कॉल काट दिया. इसके बाद उनसे दोबारा संपर्क नहीं हो सका.

परिवार का कहना है कि पुलिस ने गायनेकोलॉजिस्ट के बयान के आधार पर अपना बयान दिया था, लेकिन सवाल यह है कि वह गायनेकोलॉजिस्ट कौन थीं और किस अस्पताल से जुड़ी थीं. परिजनों का आरोप है कि वह डॉक्टर एक निजी अस्पताल से थीं और उन्हीं के बयान के आधार पर पुलिस ने जल्दबाजी में निष्कर्ष निकाल लिया. परिवार का यह भी दावा है कि प्रभात मेमोरियल हिरामती हॉस्पिटल के डॉक्टर सतीश ने उस गायनेकोलॉजिस्ट को दिशा-निर्देश दिए, जिसके बाद यह बयान सामने आया.

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल पुलिस की भूमिका को लेकर है. परिजनों का कहना है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने से पहले ही पुलिस ने मीडिया के सामने आत्महत्या और ओवरडोज की थ्योरी रख दी, जिससे जांच की दिशा प्रभावित हुई.

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विरोध प्रदर्शन करने वालों पर ٖFIR

छात्रा की मौत के बाद 11 जनवरी को मामले को लेकर गुस्साए परिजनों और स्थानीय लोगों ने गांधी मैदान थाना क्षेत्र के कारगिल चौक पर छात्रा का शव रखकर प्रदर्शन किया. पुलिस ने इसे कानून-व्यवस्था का मुद्दा बनाते हुए प्रदर्शनकरियों पर लाठीचार्ज किया और 6 नामजद समेत 150 अज्ञात लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया है.

स्थानीय पुलिस पर भरोसा न होने की बात कहते हुए परिवार ने मामले की CBI जांच की मांग की है.

इस बीच बिहार के उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने 18 जनवरी को कहा कि छात्रा की मौत में शामिल किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा. उन्होंने पत्रकारों से कहा कि घटना की जांच के लिए पुलिस पहले ही एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम का गठन कर चुकी है और DGP खुद इस जांच की निगरानी कर रहे हैं.

वहीं RJD नेता तेजस्वी यादव ने राज्य सरकार की आलोचना करते हुए नीतीश कुमार सरकार पर "असंवेदनशील" होने और "अपराधियों को संरक्षण देने" का आरोप लगाया.

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