तारीख 11 अप्रैल, शाम के करीब 6 बजे होंगे. पटना-पुणे एक्सप्रेस अपनी रफ्तार से बढ़ रही थी कि अचानक कटनी स्टेशन पर ट्रेन रुकते ही बोगी के भीतर कुछ पुलिस वाले और सादे कपड़ों में लोग दाखिल होते हैं. अचानक अफरातफरी मच जाती है. आसपास की बोगियों को मिलाकर करीब 100 से ज्यादा बच्चे थे और बच्चों के साथ 8 उस्ताद यानी शिक्षक. वहां मौजूद बच्चों को समझ ही नहीं आ रहा था कि हो क्या रहा है. कुछ ही मिनटों में कुर्ता-पाजामा और टोपी पहने सभी लोगों को ट्रेन से उतार लिया जाता है.
"हममें से कुछ बच्चों ने सुना कि वहां मौजूद लोग कह रहे थे कि कट्टपंथी बनाने ले जा रहे हैं, कोई कह रहा था बच्चों को बहला-फुसलाकर ले जाया जा रहा है, मजदूरी के लिए. लेकिन हम तो पहले की तरह बस पढ़ने के लिए अपने मदरसे जा रहे थे. देखते ही देखते हम ट्रेन से स्टेशन और फिर एक हॉस्टल जैसी जगह पहुंच जाते हैं. बिना कुछ गलत किए, हमें 13 दिनों के लिए हमारे परिवार, हमारी पढ़ाई और हमारे उस्तादों से दूर कर दिया गया."
यह किसी फिल्म की स्क्रिप्ट नहीं, बल्कि अररिया के 13 साल के आकिब (बदला हुआ नाम) की आंखों देखी हकीकत है. उन बच्चों की कहानी है जिनकी तालीम का सफर एक अनाम फोन कॉल और 'मानव तस्करी और बाल मजदूरी' के शक की भेंट चढ़ गया और जिंदगीभर के लिए एक ऐसी याद दे गया जो शायद ही भुलाया जा सके.
क्या है पूरा मामला?
दरअसल, मध्यप्रदेश के राजकीय रेलवे पुलिस (जीआरपी) ने 11 अप्रैल को बाल मजदूरी के संदेह में 163 छात्रों और आठ शिक्षकों को हिरासत में लिया था. इसके एक दिन बाद कटनी GRP थाने में 8 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई. पुलिस ने इस मामले में सद्दाम, अमानुल्लाह और मो. जाकिर समेत 8 शिक्षकों को मुख्य आरोपी बनाया है.
हालांकि करीब दो हफ्ते तक मध्यप्रदेश के जबलपुर और कटनी के आश्रय गृहों में रहने के बाद बच्चों को 25 अप्रैल को उनके परिवार वालों को अरिया में सौंप दिया गया.
सब्जी बेचकर परिवार चलाने वाले आसिफ, जिनका 14 साल का बेटा असगर महाराष्ट्र के लातूर में एक मदरसा में पढ़ने जा रहा था, इस कार्रवाई से आहत हैं.
वे बताते हैं,
"जब पुलिस ने बच्चों को हिरासत में लिया तब पहले कहा कि आधे घंटे में छोड़ देंगे, फिर कहा एक घंटे में छोड़ देंगे. इस बीच ट्रेन चली गई. फिर उन्हें बाल विकास केंद्र ले गए और कहा कि सुबह छोड़ेंगे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. रात 11 बजे हमें हमारे बैरगाछी थाने से फोन आया कि हमारे बच्चे कटनी में तस्करी के शक में पकड़ लिए गए हैं. पुलिस ने रात में गांव आकर पूछताछ की, नाम-पता नोट किया और वीडियो बनाया. उन्होंने कहा कि सुबह तक बच्चे छूट जाएंगे, लेकिन सुबह क्या शाम तक भी बच्चे नहीं छूटे. तब हम लोगों ने न्यूज में देखा कि पेरेंट्स को बुलाया जा रहा है, तो हमलोग करीब 55 लोग अररिया से कटनी के लिए निकल गए.
क्विंट से बात करते हुए एक और आसिफ कहते हैं, "जबलपुर के स्थानीय लोगों, वकीलों और मीडिया वालों से संपर्क हुआ, जिन्होंने हमारी मदद की. हमने थाने जाकर बच्चों के आधार कार्ड और मुखिया द्वारा प्रमाणित कागजात दिए, लेकिन उन्होंने कहा कि बच्चे अब अररिया सीडब्ल्यूसी में ही मिलेंगे. हमें खाली हाथ वापस लौटना पड़ा. मेरा बेटा महाराष्ट्र के लातर में दो साल से पढ़ रहा था. हमने आधार कार्ड और मुखिया के कागजात भी अधिकारियों को दिए, फिर भी हमें बच्चे नहीं सौंपे और कहा कि जांच पूरी होने के बाद बच्चे आपको अररिया में ही मिलेंगे. फिर 10 दिन के बाद बच्चे वापस घर पहुंचे."
आसिफ बताते हैं कि कुछ बच्चों को जबलपुर में रखा गया था और कुछ को कटनी में.
आसिफ का दर्द गहरा है, वह कहते हैं कि अगर वे अमीर होते तो शायद प्रशासन का रवैया अलग होता. गरीबी की वजह से उन्हें अपने बच्चों को मुफ्त तालीम के लिए हजारों किलोमीटर दूर भेजना पड़ता है, जिसे प्रशासन ने 'तस्करी' का नाम दे दिया.
एक कथित 'गुप्त सूचना' और फिर FIR
इस मामले में बाल कल्याण समिति (CWC) कटनी के सदस्य दुर्गेश मरैया की शिकायत पर शासकीय रेलवे पुलिस (GRP) थाना कटनी में एफआईआर दर्ज की गई है.
भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 143(4) के तहत दर्ज इस FIR में लिखा है,
"बाल कल्याण समिति जिला कटनी मध्य प्रदेश के सदस्य दुर्गेश मरेया को जानकारी प्राप्त हुई कि 11.04.2026 को ट्रेन नबर 17609 पटना-पुणे एक्सप्रेस के अलग-अलग कोचों मे घेरकर बैठाकर 163 नाबालिक बच्चों को ट्रेन में परिवहन कर अवैध रूप से काम कराने के उद्देश्य से लातूर, महाराष्ट्र की ओर ले जा रहे थे, उक्त बच्चो को आरपीएफ कटनी, के सहयोग से रेस्क्यू किया गया."
हमने CWC कटनी के सदस्य दुर्गेश से बात करने की कोशिश की ताकि पता चल सके कि उन्हें ये जानकारी कहां से मिली थी. हालांकि उनसे संपर्क नहीं हो सका है. संपर्क होने और उनका पक्ष जानने के बाद कॉपी को अपडेट किया जाएगा.
वहीं GRP थाना, कटनी के थाना अध्यक्ष ललता प्रसाद कश्यप कहते हैं कि बाल कल्याण समिति की तरफ से शिकायत मिली थी, हम लोगों ने एफआईआर दर्ज किया ताकि जांच कर सकें. हम लोगों ने लातूर में मदरसा और बच्चों के परिवार से संपर्क किया है और जांच की है. अबतक की जांच में किसी तरह की कोई आपराधिक चीज सामने नहीं आई है.
वहीं क्विंट ने थाना अध्यक्ष से ये भी जानना चाहा कि शिकायकर्ता को किसने बाल तस्करी की सूचना दी थी, इसपर थाना अध्यक्ष कहते हैं कि अबतक ये साफ नहीं हुआ है, शिकायकर्ता सिर्फ सूचना मिलने की बात कह रहे हैं.
बाल मजदूरी और ह्यूमन ट्रैफिकिंग के आरोप पर क्या बोले शिक्षक?
ट्रेन में मौजूद शिक्षक सद्दाम जिनके खिलाफ भी एफआईआर दर्ज हुई है उन्होंने इस आरोप से साफ इनकार किया. मदरसा शिक्षक सद्दाम बताते हैं, "हम बच्चों को महाराष्ट्र के लातूर स्थित 'मदरसा जामिया अशरफिया' ले जा रहे थे, तब पहले हमें रास्ते में मुगलसराय में पुलिस ने रोका, जब हमने सब कागजात दिखा दिए तो हमें आगे जाने दिया गया, लेकिन कटनी में पुलिस ने हमारी एक न सुनी. हमारे पास कागजात थे. लेकिन फिर भी हमें ट्रेन से उतारा गया. पुलिस ने हमारे फोन और घड़ियां ले लीं. हम कहते रहे कि ये बच्चे पढ़ने के लिए जा रहे हैं. लेकिन हमारी एक नहीं सुनी गई. बच्चे बहुत डरे और परेशान थे. बच्चों को बाल विकास विभाग वालों को सौंप दिया गया और हम उस्तादों को पहले थाने में रखा गया था. बाद में जब टीवी पर खबर आई तो स्थानीय लोग मदद के लिए आगे आएं, फिर हम लोगों को उनकी गारंटी पर जमानत पर छोड़ दिया गया."
मदरसा शिक्षक सद्दाम बताते हैं,
"मदरसा चंदे से चलता है और वहां रहना-पढ़ना पूरी तरह मुफ्त है. सीमांचल पिछड़ा इलाका है, यहां लोगों के पास पैसे कम हैं, इसलिए अच्छी पढ़ाई और सुविधा के लिए बच्चे बाहर जाते हैं."
सद्दाम के मुताबिक, वे पिछले 10 सालों से इसी तरह बच्चों को उनके परिवरा की मर्जी से लेकर जाते और आते रहे हैं, लेकिन इस बार उन पर शक किया गया.
सद्दाम कहते हैं, यह कोई पहली बार नहीं था. उनके साथ कई और शिक्षक भी थे, रेल यात्रा का वैध टिकट था, जरूरी कागजात और माता पिता के सहमती पत्र थे. फिर भी प्रशासन ने इसे बाल तस्करी का मामला बनाया और उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई.
सद्दाम अपने ऊपर एफआईआर, अपनी सुरक्षा और कमाई को लेकर चिंतित हैं. सद्दाम कहते हैं, "हम पढ़ाकर अपना गुजारा करते हैं, हम इतना नहीं कमाते की बार-बार टिकट कटाएं और सफर करें. अब हम कैसे घर चलाएंगे, ये भी सोचना है. पुलिस ने तो किसी की शिकायत पर बिना हमारी सुने एफआईआर दर्ज कर दी, लेकिन उसके बाद हमारा क्या?"
SIR का पेंच, बच्चों की काउंसलिंग पर सवाल
मदरसा में पढ़ने वाले एक छात्र के भाई यासीन ने क्विंट से बात करते हुए कहते हैं कि सोशल इन्वेस्टीगेशन रिपोर्ट की प्रक्रिया दो बार की गयी जिसमें काफी वक्त लगा. और फिर जांच पड़ताल के बाद 'सोशल इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट' (SIR) तैयार हुई, फिर 25 अप्रैल को बच्चे अररिया वापस पहुंचे. लेकिन इनसबके बाद अभी भी परेशानी कम नहीं हुई. अब अररिया सीडब्ल्यूसी (CWC) ने बच्चों को अलग-अलग तारीखों पर 'काउंसलिंग' के लिए बुलाना शुरू किया है.
यासीन कहते हैं,
"जब मामला बाल मजदूरी या तस्करी का नहीं है, तो बच्चों को बार-बार सीडब्ल्यूसी के पास क्यों जाना, बच्चों पर जो मानसिक दबाव बना है उससे वो डरे हुए हैं.
हालांकि इस मामले पर अररिया सीडब्ल्यूसी के चेयरमैन दीपक कुमार वर्मा का कहना है कि वे राज्य सरकार के निर्देशों और जेजे एक्ट (JJ Act) के तहत काम कर रहे हैं.
दीपक कहते हैं,
"हमें बच्चों की काउंसलिंग करनी है. जिस दिन बच्चों को रेस्क्यू (बरामद) किया गया था, उस दिन इतने सारे बच्चों की एक साथ काउंसलिंग करना संभव नहीं था और काउंसलर भी उपलब्ध नहीं थे. काउंसलिंग के बाद, अगर बच्चों का कहीं नामांकन (एडमिशन) नहीं है, तो जेजे एक्ट (JJ Act) के प्रावधानों के तहत जिला शिक्षा पदाधिकारी (DEO) को उनका नामांकन कराने का निर्देश दिया जाएगा."
दीपक आगे कहते हैं, "बच्चों को हमारे (CWC) सामने प्रस्तुत किया गया है, इसलिए यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम उनकी रेगुलर मॉनिटरिंग करें और यह जानें कि उनके साथ कुछ गलत तो नहीं हुआ."
दीपक कहते हैं कि जेजे एक्ट में यह प्रावधान है कि अगर बच्चों की पढ़ाई का नुकसान हुआ है, तो सीडब्ल्यूसी जिला शिक्षा पदाधिकारी (DEO) को आदेश दे सकती है कि उनके लिए स्पेशल क्लास लगवाई जाए. ये बच्चे हमारे लिए 'केयर एंड प्रोटेक्शन' (देखभाल और संरक्षण) की श्रेणी में आते हैं."
वहीं काउंसलिंग को लेकर आकिब के पिता तंज कसते हुए पूछते हैं, "ठीक है, सुविधा दिलाइए, लेकिन यही सुविधा की याद पुलिस और प्रशासन को पहले क्यों नहीं आई? हम गरीब हैं, तभी तो बच्चों को मुफ्त शिक्षा और दीन की तालीम के लिए इतनी दूर भेजते हैं. अगर हम भेज भी रहे हैं पढ़ने के लिए कहीं तो आप क्या हमारे बच्चे को बंद कर देंगे."
इस मामले पर अररिया के वकील रमीज रजा कहते हैं,
"यह बच्चों के अवैध परिवहन का मामला नहीं था और ना ही उन्हें जबरन मजदूरी कराने के लिए ले जाया जा रहा था. फिर भी बच्चों को पुलिस वैन में लाया ले जाया गया. जो कि कानूनी तौर सही नहीं है."
वकील रमीज कहते हैं कि जब सब कुछ सामने है और ये मामला बाल मजदूरी या ट्रैफिकिंग का नहीं है तो हम लोग क्लोजर रिपोर्ट (Closure Report) लगवाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं.
बिहार में मजदूरों और सामाजिक मुद्दों पर काम करने वाली जन जागरण शक्ति संगठन के सचिव आशीष रंजन ने इस मामले पर पीड़ित परिवारों के साथ एक प्रेस कॉन्फ्रेंस भी की थी. आशीष कहते हैं, इस मामले पर जवाबदेही तय होनी चाहिए, बच्चों को कष्ट झेलना पड़ा है. बिना ठोस आधार के एफआईआर की गई, इसपर जो भी अधिकारी जिम्मेदार हैं उनपर कार्रवाई होनी चाहिए. साथ में बच्चों को मुआवजा मिलना चाहिए, क्योंकि ये बहुत गरीब घर के बच्चे हैं, टिकट का पैसा उन्होंने दिया था. अब देखना होगा इन बच्चों की शिक्षा छूठेगी या वो वापस जाते हैं, लेकिन सरकार को उन्हें मुआवजा दे ताकि उन्हें भरोसा हो."
