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पटना NEET छात्रा मौत केस: "पुलिस बोली नींद की गोली से मौत,फिर शरीर पर चोट कैसे?"

"पुलिस हमें टॉर्चर कर रही है. हम पर यह दबाव बनाया जा रहा है कि हम मान लें कि हमारी बेटी ने आत्महत्या की"- परिजन

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"कभी कहा गया कि मेरी बेटी ने जहर खा लिया, कभी कहा गया कि नींद की दवा खाई है, तो कभी इसे आत्महत्या बताया गया. अगर मेरी बेटी तनाव से मरी, तो उसके शरीर पर खरोंच के निशान कैसे आए?"

यह कहते हुए पटना के हॉस्टल में हुई संदिग्ध मौत के मामले में पीड़िता की मां रो पड़ती हैं.

दरअसल, पटना के शंभू गर्ल्स हॉस्टल में रह रही 17 वर्षीय नीट अभ्यर्थी की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत ने बिहार में सियासी और सामाजिक हलचल पैदा कर दी है. जहानाबाद की रहने वाली छात्रा 5 जनवरी को हॉस्टल लौटी थी. अगले दिन वह कमरे में बेहोश मिली. उसे पहले प्रभात मेमोरियल अस्पताल और बाद में एक अन्य निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां 10 जनवरी को उसकी मौत हो गई.

परिवार का कहना है कि कुछ न कुछ गलत जरूर हुआ है. इंसाफ की तलाश में परिवार बिहार से दिल्ली आया. दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया और अपनी आवाज सरकार व न्यायालय तक पहुंचाने की कोशिश की. द क्विंट ने पीड़ित परिवार से बात कर यह समझने की कोशिश की कि आखिर पूरा मामला क्या है.

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छात्रा की मां का कहना है कि अस्पताल में भर्ती के दौरान उन्होंने बेटी के शरीर पर खरोंच के निशान देखे. उनका दावा है कि होश में आने पर छात्रा ने इशारों में “कुछ गलत” होने की बात स्वीकार की थी.

परिवार का आरोप है कि शुरू से ही पुलिस आत्महत्या या दवा के ओवरडोज की थ्योरी को आगे बढ़ा रही थी और उन पर इसे मान लेने का दबाव बनाया गया.

सीबीआई को सौंपा गया मामला 

परिवार और लोगों के विरोध के दाबव में अब ये मामला सीबीआई को सौंप दिया गया है. लेकिन सीबीआई के केस टेकओवर से पहले पटना पुलिस की एसआईटी ने पहली बार प्रेस कॉन्फ्रेंस की. पुलिस ने माना कि मृतका के एक कपड़े पर स्पर्म मिला है.

हालांकि, पुलिस का कहना है कि छात्रा के कमरे से नींद की गोलियों का एक पत्ता बरामद हुआ है. जांच के दौरान यह भी सामने आया कि छात्रा ने संबंधित दवा के बारे में इंटरनेट पर सर्च किया था.

पुलिस अस्पताल के रिपोर्ट का हवाला देकर कह रही है कि लड़की के शरीर में खतरनाक मात्रा में दवाएं मिली.

SDPO सचिवालय अनु कुमारी के अनुसार, पीड़िता 6 से 10 जनवरी तक प्रभात मेमोरियल अस्पताल में भर्ती थी. अस्पताल की डिस्चार्ज रिपोर्ट में ओपियोइड और दवाओं के जहर, सिर में गंभीर चोट और सेप्टिक शॉक जैसी बातें दर्ज हैं. यूरिन टेस्ट में ओपिएट और बेंजोडायजेपीन पॉजिटिव पाए गए.

अनु कुमारी ने आगे बताया कि पीड़िता को प्रभात मेमोरियल के बाद मेदांता अस्पताल ले जाया गया, जहां उसकी मौत हो गई. मेदांता की डेथ समरी में भी शॉक और दवा के जहर को मौत का कारण बताया गया है.

मौत के बाद मेडिकल बोर्ड की निगरानी में पोस्टमार्टम हुआ. रिपोर्ट में यौन हिंसा की संभावना से इनकार नहीं किया गया है.

"एफएसएल जांच में पीड़िता के एक अंतःवस्त्र से वीर्य के निशान मिले हैं. डीएनए जांच कराई जा रही है और अदालत की अनुमति से कुछ संदिग्धों के डीएनए सैंपल भी लिए जा रहे हैं."
अनु कुमारी, SDPO सचिवालय

"पुलिस हमें टॉर्चर कर रही"

छात्रा के पिता का आरोप है कि पुलिस बार-बार उन्हें परेशान कर रही है. उनका कहना है कि उन पर लगातार दबाव बनाया जा रहा है कि वे मान लें उनकी बेटी ने आत्महत्या की थी. परिवार के मुताबिक, पुलिस यह कह रही है कि छात्रा ने नींद की गोलियां खाईं और इसी वजह से उसकी मौत हुई.

"सरकार, एसआईटी और सीआईडी के लोग हमें बार-बार परेशान कर रहे हैं. हमारे परिजनों से भी अपराधियों की तरह व्यवहार किया जा रहा है."
छात्रा के पिता

उन्होंने आगे कहा, "जहां तक पुलिस पर दबाव की बात है, हमें लगता है कि इस मामले में बड़े-बड़े लोग शामिल हैं. उन्हें बचाने के लिए ऐसा किया जा रहा है, ताकि मामला दबाया जा सके."

परिवार का सवाल है कि यदि मामला केवल दवा के ओवरडोज का था तो शरीर पर चोट के निशान कैसे आए. वे यह भी पूछ रहे हैं कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने से पहले ही पुलिस अधिकारियों ने जहर या दवा से जुड़ी बातें सार्वजनिक कैसे कर दीं. इसके अलावा, कथित डायरी और सीसीटीवी फुटेज के मीडिया में लीक होने पर भी सवाल उठ रहे हैं.

पीड़िता की मां ने कहा, "कभी कहा गया कि बेटी ने जहर खा लिया, कभी कहा गया कि दवा खा ली, तो कभी इसे आत्महत्या बताया गया." उनका आरोप है कि पुलिस और डॉक्टर दोनों लगातार यही बातें दोहराते रहे. उन्होंने सवाल उठाया, उन्होंने सवाल उठाया, "अगर दवा खाने से मौत हुई है, तो फिर रेप कैसे हुआ और शरीर पर खरोंच के निशान कैसे आए?"

सवाल यही है कि पुलिस जांच के बीच ही मीडिया में गर्ल्स हॉस्टल का सीसीटीवी फुटेज, लड़की की कथित डायरी, केस की डीटेल कौन लीक कर रहा था. कई अनसुलझे सवाल हैं, जिनके जवाब ढूंढने जरूरी हैं, क्योंकि 2026 में भी हम यही पूछ रहे हैं कि घर, हॉस्टल, पब्लिक प्लेस में महिलाएं कितनी सुरक्षित हैं.

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