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'खान सर' विवाद: बिहार के कोचिंग सेंटरों की दुश्मनी, बनी मुस्लिम VS यादव की लड़ाई

अब कुछ लोग खान सर को मुसलमान और रोशन आनंद को हिंदू बताकर सांप्रदायिकता का रंग दे रहे हैं, लेकिन पहले ऐसा नहीं था۔

उमेश कुमार राय
न्यूज
Published:
<div class="paragraphs"><p><strong>अब कुछ लोग खान सर को मुसलमान और रोशन आनंद को हिंदू बता रहे हैं. पहले ऐसा नहीं था.</strong></p></div>
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अब कुछ लोग खान सर को मुसलमान और रोशन आनंद को हिंदू बता रहे हैं. पहले ऐसा नहीं था.

(फोटो: अरूप मिश्रा/द क्विंट)

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पटना के मुसल्लहपुर के दो बड़े कोचिंग सेंटर 'खान ग्लोबल स्टडीज' और 'ज्ञान बिंदु जीएस एकेडमी' के बीच जो विवाद बिहार सिपाही भर्ती परीक्षा के नतीजों (रिजल्ट के दावों) को लेकर शुरू हुआ था, उसने अब सांप्रदायिक रंग ले लिया है.

'खान ग्लोबल स्टडीज' के मालिक फैसल खान हैं, जिन्हें लोग 'खान सर' कहते हैं. वहीं, 'ज्ञान बिंदु जीएस एकेडमी' को रोशन आनंद चलाते हैं, जो यादव समुदाय से आते हैं. अब लोगों का एक गुट खान सर को मुस्लिम और रोशन आनंद को हिंदू के तौर पर देख रहा है, जबकि पहले ऐसा बिल्कुल नहीं था.

मुसल्लहपुर में काम करने वाले साथियों और शिक्षकों ने 'द क्विंट' को बताया कि कोचिंग की आपसी होड़ को पहले कभी धार्मिक चश्मे से नहीं देखा गया था.

खान सर बनाम रोशन आनंद

कहा जा रहा है कि इस विवाद की शुरुआत तब हुई जब ज्ञान बिंदु के एक साइनबोर्ड के ऊपर खान ग्लोबल स्टडीज का एक पोस्टर टांग दिया गया. ये दोनों कोचिंग संस्थान मुसल्लहपुर के किसान कोल्ड स्टोरेज कैंपस के अंदर एक-दूसरे से बिल्कुल थोड़ी ही दूरी पर मौजूद हैं.

खान ग्लोबल स्टडीज और ज्ञान बिंदु जीएस अकादमी के पोस्टर.

फोटो: उमेश कुमार राय/द क्विंट

इस पोस्टर में दावा किया गया था कि बिहार पुलिस में सिपाही के 19,838 पदों के लिए हुई हालिया भर्ती परीक्षा में इस संस्थान के 12,000 उम्मीदवार पास हुए हैं. दूसरी तरफ, ज्ञान बिंदु ने दावा किया था कि उनके संस्थान से 10,000 उम्मीदवार इस परीक्षा में पास हुए हैं.

इसी पोस्टर को लेकर 2 जून की रात करीब 10 बजे खान ग्लोबल स्टडीज के सेंटर पर कथित तौर पर हमला हुआ. खान ग्लोबल स्टडीज का आरोप है कि रोशन आनंद के इशारे पर ज्ञान बिंदु से जुड़े लोगों ने उनके सुरक्षा गार्ड की पिटाई की, कोचिंग सेंटर पर पथराव किया और जमकर हंगामा मचाया. जिस वक्त यह घटना हुई, खान सर खुद कोचिंग सेंटर में मौजूद थे.

इस मामले में कदमकुआं पुलिस ने रोशन आनंद समेत तीन लोगों को गिरफ्तार किया. इस हंगामे के दौरान गोलियां भी चली थीं. हालांकि, शुरुआत में पुलिस ने कहा था कि फायरिंग का कोई सबूत नहीं मिला है, लेकिन जब फायरिंग का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, तब पुलिस ने इसकी जांच शुरू की.

इस जांच के बाद खान सर के दो पर्सनल सुरक्षा गार्डों (बाउंसरों) की पहचान हुई, जिन्हें पुलिस ने गिरफ्तार कर पूछताछ की.

पूछताछ के दौरान, इन गार्डों ने पुलिस के सामने कबूल किया कि उन्होंने खान सर के कहने पर हवा में गोलियां चलाई थीं. इस बयान के आधार पर पुलिस ने खान सर के खिलाफ भी शिकायत दर्ज कर ली. हालांकि, अभी तक उनकी गिरफ्तारी नहीं हुई है. दरअसल, कोर्ट ने उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है.

इस बीच, रोशन आनंद की जमानत याचिका खारिज हो गई. ज्ञान बिंदु के एक शिक्षक का आरोप है कि जहां एफआईआर (FIR) दर्ज होने के तुरंत बाद रोशन आनंद को गिरफ्तार कर लिया गया, वहीं खान सर को अब तक गिरफ्तार नहीं किया गया है.

कदमकुआं थाने के एसएचओ (SHO) ने 'द क्विंट' को बताया:

इस विवाद में अब तक जो कुछ भी हुआ है, मैं उस पर बात करने के लिए तैयार हूं. लेकिन गिरफ्तारी क्यों नहीं हुई और आगे क्या होगा, इस पर केवल सीनियर अधिकारी ही कुछ कह सकते हैं.

खान सर ने अपने खिलाफ दर्ज FIR रद्द कराने के लिए पटना हाई कोर्ट में याचिका दायर की है. अदालत ने इस पर बिहार सरकार से 13 जून तक जवाब मांगा है.

सांप्रदायिक रंग क्यों पकड़ा

शुरुआत में इस पूरे विवाद को दो कोचिंग सेंटरों के बीच वर्चस्व (दबदबा बनाने) की लड़ाई के रूप में देखा जा रहा था. लेकिन इसके बाद से इस विवाद ने पहचान और जाति-धर्म का रूप ले लिया है, जहां खान सर की मुस्लिम पहचान को उछाला जा रहा है और रोशन आनंद की पहचान उनकी यादव जाति से जोड़कर दिखाई जा रही है.

कोचिंग सेंटरों की इस व्यावसायिक दुश्मनी की आड़ में, लोगों का एक गुट, खासकर सोशल मीडिया पर, इसे 'यादव बनाम मुस्लिम' की लड़ाई के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है. गौरतलब है कि यादव और मुस्लिम समुदाय का यह गठजोड़ लंबे समय से राष्ट्रीय जनता दल (RJD) का एक बेहद मजबूत और ताकतवर वोट बैंक रहा है.

पटना के एक कट्टरपंथी हिंदू संगठन 'हिंदू शिव भवानी सेना' ने एक वीडियो जारी कर खान सर को 'जिहादी' कहा है. वीडियो में दावा किया गया, "खान सर ने अपनी ही एक छात्रा से शादी की है, जिसे उन्होंने पढ़ाया था. उनकी कक्षाओं में संस्कृति, राष्ट्रीय शिक्षा या देशभक्ति की कोई भावना नहीं है. वह एक 'लव जिहादी' हैं, और उनका शैक्षणिक संस्थान 'लव जिहाद' को बढ़ावा देता है. ऐसे लोगों की संपत्ति की जांच होनी चाहिए."

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (ट्विटर) पर एक दूसरे दक्षिणपंथी प्रोपेगैंडा हैंडल ने भी एक कोलाज शेयर किया. इस कोलाज में एक तरफ हाथ में कलावा (पवित्र धागा) पहने आतंकवादी अजमल कसाब की तस्वीर थी, तो दूसरी तरफ माथे पर तिलक लगाए खान सर की फोटो थी. इस कोलाज के कैप्शन में लिखा गया था: “मूर्ख बनाने की कला.”

हालांकि कुछ सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स ने इस पूरे मामले को सीधे तौर पर हिंदू-मुस्लिम की लड़ाई के रूप में पेश नहीं किया, लेकिन उन्होंने रोशन आनंद का पक्ष जरूर लिया.

अपने अल्पसंख्यक-विरोधी बयानों के लिए जाने जाने वाले मशहूर यूट्यूबर मनीष कश्यप ने भी कई वीडियो में खान सर की तीखी आलोचना की. कश्यप पहले भारतीय जनता पार्टी (BJP) से जुड़े रहे थे और उन्होंने जन सुराज पार्टी के टिकट पर पिछला विधानसभा चुनाव भी लड़ा था, जिसमें उन्हें हार का सामना करना पड़ा था. खान सर पर उनका यह रुख तीन साल पहले के मुकाबले बिल्कुल उलट है, जब उन्होंने खान सर का इंटरव्यू लिया था और उनकी जमकर तारीफें की थीं. तब कश्यप ने कहा था कि देश को उनके जैसे कई और शिक्षकों की जरूरत है.

दिलचस्प बात यह है कि कोविड-19 महामारी के दौरान जब खान सर की धार्मिक पहचान खुलकर सामने नहीं आई थी उन्होंने एक वीडियो में मुसलमानों को 'पंक्चर बनाने वाला' कहकर उनका मजाक उड़ाया था.

उस समय उनकी इस मुस्लिम-विरोधी टिप्पणी के लिए उनकी कड़ी आलोचना की गई थी, लेकिन तब हिंदुओं का एक वर्ग उनके समर्थन में खुलकर सामने आ गया था. यहां तक कि एक न्यूज चैनल ने उनके साथ एक भावनाओं से भरा लाइव इंटरव्यू भी किया था. इस इंटरव्यू के दौरान दर्शकों से सवाल भी लिए गए थे, जिनमें से ज्यादातर हिंदू थे और उन्होंने खान सर के प्रति अपना पूरा समर्थन जताया था.

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'खान सर' से फैसल खान बनने तक का सफर

खान सर लंबे समय तक राष्ट्रीय समाचार चैनलों के चहेते बने हुए थे. ये चैनल अक्सर उनके लंबे-लंबे इंटरव्यू लेते थे और स्थानीय से लेकर अंतरराष्ट्रीय मुद्दों तक पर उनकी राय मांगते थे. लेकिन अब उन्हीं चैनलों और मीडिया आउटलेट्स ने अचानक उनके लोकप्रिय नाम 'खान सर' का इस्तेमाल करना बंद कर दिया है और इसके बजाय उन्हें 'फैसल खान' कहना शुरू कर दिया है.

बिहार के BJP विधायक और पूर्व मंत्री नीरज कुमार सिंह ने भी खान सर की तीखी आलोचना की है. उन्होंने कहा:

यह 'खान' नाम का आदमी जिसे फैसल खान के नाम से जाना जाता है पूरी तरह से धोखेबाज है. उत्तर प्रदेश में रहने वाला उसका अपना परिवार भी कहता है कि वह कोई शिक्षक नहीं है... वह एक फर्जी इंसान है. वह पढ़ाई-लिखाई पर बहुत कम ध्यान देता है और अपना ज्यादातर समय राजनीतिक बयानबाजी और नाटकीय भाषण देने में बिताता है.

मुसल्लाहपुर बिहार में एक लोकप्रिय कोचिंग केंद्र है.

फोटो: उमेश कुमार राय/द क्विंट

मुंबई के टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS) के पूर्व डीन, प्रोफेसर पुष्पेंद्र कहते हैं:

इस पूरे मामले को पूरी तरह से राजनीतिक रंग दे दिया गया है. हर कोई जानता था कि खान सर एक मुस्लिम हैं, लेकिन पहले कभी भी उनकी मुख्य पहचान इस रूप में नहीं बनाई गई थी. इस पूरे विवाद की सबसे खास बात यह है कि इसमें एक तरफ यादव है और दूसरी तरफ मुस्लिम. नतीजा यह है कि पूरी दक्षिणपंथी मशीनरी (राइट विंग) इस मुद्दे का इस्तेमाल यादवों और मुसलमानों के बीच दरार पैदा करने के लिए करने में जुट गई है.

उन्होंने 'द क्विंट' को बताया, "अगर यही विवाद खान सर और किसी दूसरी जाति के व्यक्ति के बीच हुआ होता, तो यह इस हद तक नहीं भड़कता."

छात्रों और शिक्षकों ने सांप्रदायिक रंग को नकारा

खान सर को लेकर हुए इस सांप्रदायिक विवाद में सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि मुसल्लहपुर और उसके आसपास के इलाकों में शायद यह अपनी तरह का पहला मामला है. यह इलाका लंबे समय से एक बड़ा कोचिंग हब रहा है, और हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण (बंटवारे) की बातें यहां कभी भी कोई बड़ा मुद्दा नहीं रही हैं.

मुसल्लहपुर में सरकारी नौकरी की तैयारी में करीब पांच साल बिताने वाले और मौजूदा समय में एक सरकारी कंपनी (पब्लिक सेक्टर) में काम कर रहे नीरज कुमार ने 'द क्विंट' को बताया,

यहां के कोचिंग संस्थानों में जाति और धर्म की कभी कोई जगह नहीं रही है, और न ही इस विवाद में ऐसा कोई एंगल (कोण) है.

हालांकि मुसल्लहपुर के ज्यादातर प्राइवेट कोचिंग शिक्षक हिंदू हैं और केवल कुछ ही मुस्लिम हैं, फिर भी वे अपने कोचिंग संस्थानों में एक धर्मनिरपेक्ष माहौल बनाए रखते हैं और अपने सार्वजनिक जीवन में भी धर्मनिरपेक्षता का पालन करते हैं.

जब पिछले साल इस रिपोर्टर ने इंटरव्यू के लिए खान सर के दफ्तर का दौरा किया था, तो उनकी मेज के पास बुद्ध की एक मूर्ति रखी हुई थी. हर साल रक्षाबंधन के मौके पर छात्राएं उन्हें राखी बांधती हैं. हर साल उनकी कलाइयों पर बंधी ढेर सारी राखियों की एक तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल होती है.

पिछले दो दशकों से पढ़ा रहे गुरु रहमान अपने कोचिंग सेंटर के दफ्तर में देवी सरस्वती और भगवान हनुमान की तस्वीरें लगाते हैं. उनके दफ्तर की एक दीवार पर गाय संरक्षण अभियान 'गौ सम्मान आह्वान अभियान' से जुड़ा एक पोस्टर भी चिपका हुआ है. उन्होंने कहा,

धर्म के आधार पर किसी को भी निशाना बनाना गलत है. भारत सबका है. मैं इसकी कड़ी निंदा करता हूं. परीक्षा के नतीजों के दावों के विवाद में कोई धर्म को कैसे ला सकता है? मैंने मुसल्लहपुर में पहले कभी ऐसा नहीं देखा.

गुरु रहमान अपने कोचिंग सेंटर का दफ्तर

फोटो: उमेश कुमार राय/द क्विंट

खान ग्लोबल स्टडीज में पांच साल तक पढ़ाने वाले और इस समय अपना खुद का कोचिंग सेंटर चलाने वाले शैलेंद्र कुमार ने भी रहमान की बातों का समर्थन किया. कुमार ने कहा,

शिक्षकों के बीच कभी भी हिंदू-मुस्लिम जैसी कोई बात नहीं रही, और न ही हमने खान जी के संस्थान में पढ़ाते समय कभी ऐसा कुछ महसूस किया. यह पूरा विवाद असल में नतीजों को लेकर अपना दबदबा साबित करने का है. ऐसा नहीं होना चाहिए.

यहां तक कि तैयारी करने वाले छात्रों के बीच भी इस तरह की सांप्रदायिक बातों का कोई खास असर नहीं रहा है, क्योंकि वे बेहतर नतीजों के लिए एक ही समय में अलग-अलग शिक्षकों से क्लास लेते हैं और आपस में अपने नोट्स भी साझा करते हैं.

सरकारी नौकरी की तैयारी कर रही और खान ग्लोबल स्टडीज की छात्रा निर्जला सिंह के मुताबिक, "इसे सांप्रदायिक चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए. दोनों ही शिक्षक पढ़ाने में बहुत अच्छे हैं."

इस बढ़ते ध्रुवीकरण ने कई लोगों को इस चिंता में डाल दिया है कि इसका छात्रों की पसंद और उनके प्रदर्शन पर क्या असर पड़ेगा. इसके बावजूद, प्रोफेसर पुष्पेंद्र इस बात पर सवाल उठाते हैं कि क्या छात्रों के बीच इतनी आसानी से सांप्रदायिक दरार पैदा हो सकती है.

उन्होंने 'द क्विंट' को बताया, "ऐसा इसलिए है क्योंकि छात्र कई शिक्षकों से पढ़ते हैं, और उनके दिमाग पर सरकारी नौकरी पाने की चाहत इस कदर हावी रहती है कि वे किसी शिक्षक को इस नजरिए से नहीं देखते कि वह हिंदू है या मुस्लिम."

(इस लेख के लेखक उमेश कुमार राय एक स्वतंत्र पत्रकार हैं, जो बिहार में समाचार और राजनीति कवर करते हैं. इस स्टोरी का हिंदी अनुवाद नौशाद मलूक ने किया है. )

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