हरियाणा सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया कि अशोका विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अली खान महमूदाबाद के खिलाफ अभियोजन की अनुमति नहीं दी जाएगी. यह मामला उनके सोशल मीडिया पोस्ट्स से जुड़ा था, जिसमें 'ऑपरेशन सिंदूर' के संदर्भ में टिप्पणियां की गई थीं. सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार के इस फैसले के बाद प्रोफेसर के खिलाफ सभी आपराधिक कार्यवाहियों को समाप्त कर दिया. प्रोफेसर को मई 2025 में गिरफ्तार किया गया था और तीन दिन बाद अंतरिम जमानत मिल गई थी.
Live Law के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू की दलीलें सुनने के बाद कार्यवाही को समाप्त किया. कोर्ट ने प्रोफेसर को भविष्य में सतर्क रहने की सलाह भी दी.
Scroll की रिपोर्ट के मुताबिक, हरियाणा सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि यह निर्णय 'वन-टाइम मैग्नैनिमिटी' के तहत लिया गया है. कोर्ट ने प्रोफेसर को 'प्रूडेंट' रहने की सलाह दी और कहा,
“कभी-कभी लाइन के बीच में लिखना ज्यादा समस्याएं पैदा कर सकता है. कभी-कभी स्थिति इतनी संवेदनशील होती है कि हमें सतर्क रहना चाहिए. याचिकाकर्ता एक अत्यंत शिक्षित व्यक्ति हैं, उन्हें भविष्य में विवेकपूर्ण व्यवहार करना चाहिए.”
The Hindu ने बताया, सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी में ही राज्य सरकार को अभियोजन की अनुमति न देने का सुझाव दिया था, क्योंकि अगस्त 2025 से मंजूरी लंबित थी. कोर्ट ने प्रोफेसर के सोशल मीडिया पोस्ट्स की जांच के लिए तीन वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों की एक विशेष जांच टीम भी गठित की थी.
Hindustan Times ने एक लेख में कहा, प्रोफेसर के खिलाफ दो एफआईआर दर्ज की गई थीं—एक हरियाणा महिला आयोग की अध्यक्ष रेनू भाटिया की शिकायत पर और दूसरी एक गांव के सरपंच की शिकायत पर. दोनों में भारत की संप्रभुता और एकता को खतरे में डालने, सार्वजनिक शरारत और महिलाओं की गरिमा का अपमान करने जैसी धाराएं लगाई गई थीं.
Bar and Bench के एक लेख में उल्लेख है, प्रोफेसर महमूदाबाद के फेसबुक पोस्ट में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद की आलोचना, युद्ध का विरोध और भारतीय सेना की कर्नल सोफिया कुरैशी की सराहना की गई थी. साथ ही, उन्होंने भारत में भीड़ हिंसा के खिलाफ भी आवाज उठाने की बात कही थी.
इस रिपोर्ट में उल्लेख है, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चूंकि राज्य ने अभियोजन की अनुमति नहीं दी, इसलिए सोनीपत की अदालत में लंबित कार्यवाही भी बंद कर दी गई. अदालत ने यह भी कहा कि महमूदाबाद एक डोमेन एक्सपर्ट हैं और उनसे भविष्य में जिम्मेदार व्यवहार की अपेक्षा है.
मामले की शुरुआत मई 2025 में प्रोफेसर के सोशल मीडिया पोस्ट्स के बाद हुई थी, जिसमें 'ऑपरेशन सिंदूर' के प्रेस ब्रीफिंग्स पर टिप्पणी की गई थी. जैसा कि इस रिपोर्ट में उल्लेख है, प्रोफेसर ने कहा था कि "ऑप्टिक्स को जमीनी हकीकत में बदलना चाहिए, वरना यह सिर्फ पाखंड है."
इस रिपोर्ट ने हाइलाइट किया, प्रोफेसर को तीन दिन की हिरासत के बाद सुप्रीम कोर्ट से अंतरिम जमानत मिली थी. कोर्ट ने उनके पोस्ट्स की संवेदनशीलता को देखते हुए विशेष जांच टीम गठित की थी.
इस लेख में उल्लेख है, अगस्त 2025 में राज्य सरकार को अभियोजन की अनुमति के लिए अनुरोध भेजा गया था, लेकिन मंजूरी नहीं दी गई. सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2026 में राज्य को तीन महीने में निर्णय लेने का निर्देश दिया था.
Note: This article is produced using AI-assisted tools and is based on publicly available information. It has been reviewed by The Quint's editorial team before publishing.
