"11 हजार रुपये में कुछ नहीं हो पाता. आदमी सैलरी बढ़ाने की मांग कर रहे थे. 4 हजार का सिलेंडर मिलता है. 5 हजार रूम के चले जाते हैं. हमें कुछ नहीं बचता. इसी की वजह से हंगामा हुआ था."
ये कहना है, उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले की रहने वाली परवेश का, जो पिछले डेढ़ सालों से नोएडा की एक फैक्ट्री में सफाईकर्मी के रूप में काम कर रही हैं. परवेश अपने पति और 7 बच्चों के साथ एक छोटे से कमरे में रहती हैं.
नोएडा में बीते दिनों मजदूरों का विरोध-प्रदर्शन देखने को मिला. मजदूर सैलरी बढ़ाने की मांग कर रहे थे. 13 अप्रैल को मजदूरों के विरोध-प्रदर्शन ने हिंसक रूप ले लिया.
'जनाब ऐसे कैसे?' के इस एपिसोड में हम नोएडा के फैक्ट्री मजदूरों की जमीनी हकीकत समझने की कोशिश करेंगे. कम वेतन, बढ़ती महंगाई और बदहाल स्थिति में मजदूर गुजारा करने को मजबूर हैं. तंग कमरों में कई लोगों के साथ रहना और सीमित आय में जीवन चलाने की मजबूरी ने उनकी रोजमर्रा की मुश्किलों को और बढ़ा दिया है. रोजाना कड़ी मेहनत करने के बावजूद एक सम्मानजनक जीवन अब भी इन मजदूरों की पहुंच से दूर है.
"पेट पालने के लिए परदेश आए लेकिन..."
द क्विंट से बातचीत में परवेश कहती हैं, "गांव में छोटे-मोटे काम करके हम गुजारा करते थे. सोचा था कि शहर आकर कुछ फायदा होगा. कुछ पैसे जमा कर लेंगे. गांव में पेट नहीं पला तो परदेश आए लेकिन लेकिन यहां और महंगाई हो रही है."
क्या थोड़ा-बहुत बचत हो पाता है? इस सवाल पर वे कहती हैं, "कुछ नहीं बचता. महंगाई इतनी हो रही है कि क्या बचाएंगे. सैलरी भी इतनी नहीं है कि कुछ बचा पाएं."
परवेश की सैलरी 11 हजार रुपये है. वे बताती हैं कि एक साल में उनकी सैलरी 200 रुपये बढ़ी है. कटने के बाद उन्हें सिर्फ साढ़े 9 हजार रुपये ही मिलते हैं. वे आगे कहती हैं कि बीमारी की वजह से छुट्टी लेने पर भी सैलरी कटती है.
"हमें पीरियड में भी काम करना पड़ता है. बच्चों के खातिर हमें करना पड़ता है. जैसे ज्यादा हालत खराब हो जाती है तब रुकते हैं. तो उसका हमें कोई पैसा नहीं मिलता. सिर्फ होली-दिवाली की छुट्टी मिलती है. नहीं तो कोई और छुट्टी नहीं मिलती. अगर हम अपनी मर्जी से छुट्टी करते हैं तो सैलरी कटती है."
"सिर्फ 2 हजार रुपये घर भेज पाता हूं"
सचिन, 12वीं पास हैं और नोएडा की एक फैक्ट्री में क्वालिटी चेकर के रूप में काम करते हैं. वे बताते हैं कि महीने भर काम करने के बाद सिर्फ 2 हजार रुपये ही बचा पाते हैं, जो वे घर भेजते हैं.
"11 हजार रुपये मेरी सैलरी है. 5500 रुपये रूम रेंट में निकल जाता है. 3-4 हजार रुपये खाने-पीने में लग जाते हैं. ऊपरी खर्च में हजार रुपया चला जाता है. ले देकर 2 हजार रुपया बचता है, जो घर भेजता हूं," इस तरह से वे अपना महीना चलाते हैं.
हालांकि, सचिन बताते हैं कि ओवरटाइम करने से कुछ और पैसा बच जाता है. ओवरटाइम करके वे 17 हजार रुपये महीने तक कमा लेते हैं. वे कहते हैं, "मजबूरी है इसलिए ओवरटाइम करते हैं. अगर ओवरटाइम नहीं करेंगे तो हम कुछ भी नहीं कर पाएंगे. न यहां रह पाएंगे, न खा पाएंगे और न ही अपने घर का खर्चा चला पाएंगे."
"बच्चों की फीस तक नहीं दे पाते हैं"
विनोद एक अर्धकुशल मजदूर हैं. वे नोएडा के सेक्टर-83 स्थित एक जर्जर बिल्डिंग के एक कमरे में अपनी पत्नी और तीन बच्चों के साथ रहते हैं. उनका कहना है कि अगर वे अकेले कमाएंगे, तो घर का खर्च भी नहीं चल पाएगा. परिवार के पालन-पोषण में उनकी पत्नी भी हाथ बंटाती हैं.
विनोद के बच्चे प्राइवेट स्कूल में पढ़ते हैं. स्कूल फीस, किताब-कॉपी का बिल 12 हजार रुपये आया है. लेकिन एक बार में पूरी फीस भरना उनके लिए किसी मुसीबत से कम नहीं है. वे कहते हैं, "सिर्फ 4 हजार रुपये ही दे पाया हूं, क्योंकि मेरे पास पैसे नहीं थे. मैंने प्रिंसिपल सर को बता दिया था. हर साल हम ऐसे ही करते हैं- थोड़ा-थोड़ा करके फीस जमा करते हैं."
पैसों की किल्लत के कारण परवेश अपने सभी बच्चों को स्कूल नहीं भेज पा रही हैं. उनके सिर्फ दो बच्चे ही पढ़ाई कर रहे हैं. वे कहती हैं, "दो बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ते हैं. इतना बजट नहीं है कि सभी बच्चों को स्कूल भेज सकें. शहर आने की वजह से कुछ बच्चों का दाखिला नहीं हो पाया, वहीं पैसों की कमी के कारण भी कुछ बच्चों का एडमिशन नहीं हो सका."