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MP की लचर स्वास्थ्य व्यवस्था: शव को कंधे पर ले जाने को क्यों मजबूर है आम आदमी?

मध्य प्रदेश में स्ट्रेचर पर स्वास्थ्य व्यवस्था का जिम्मेदार कौन?

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मध्यप्रदेश में बड़े बड़े वादों के इतर प्रदेश की स्वास्थ व्यवस्था के जो दृश्य लगातार निकल कर आ रहे हैं वो बहुत भयावह हैं. हर महीने कोई न कोई वीडियो वायरल होता है, जिसमें आम आदमी अपने परिजनों, बच्चों के शव को कंधे पर ढोकर ले जाता हुआ दिखता है. ये सब उस राज्य में हो रहा है, जहां के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान खुद को राज्य की बेटियों का मामा कहते हैं. हर महीने वायरल हो रहे इन वीडियोज पर सरकार की न तो कोई प्रतिक्रिया आती है और ना ही इस समस्या के समाधान के लिए कोई ठोस कदम उठाए जाते हैं.

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बेटी का शव कंधे पर लेकर एंबुलेंस के लिए 2 घंटे तक भटकता रहा पिता

ताजा मामला मध्यप्रदेश के छतरपुर जिला अस्पताल में शव वाहन न मिलने से एक पिता अपनी बेटी को दो घंटे तक कंधे पर ले कर इधर उधर भटकता रहा और अंत में बस से अपनी बेटी का शव अपने गांव ले गया.

दरअसल जिले के बिजाबर थाना क्षेत्र अंतर्गत बाजना के पाटन गांव में रहने वाले रामेश्वर की चार साल की बेटी खेलते खेलते नदी की मिट्टी में दबने से गंभीर रूप से घायल हो गई, जिसके बाद उसे बिजाबर स्वास्थ्य केंद्र लाया गया, जहां से उसे जिला अस्पताल भेज दिया गया. जिला अस्पताल की OT में उसका इलाज चल ही रहा था की तभी 4 साल की मासूम प्रीति ने इलाज के दौरान दम तोड़ दिया. जिसके बाद रामेश्वर र उसके साथ आया उसका साला प्रीति के शव को घर ले जाने के लिए 2 घंटे तक एंबुलेंस के लिए भटकता रहा और आखिरकार बस में अपनी बेटी का शव गांव ले गए.

मोटरसाइकिल की डिक्की में बेटे का शव ले जाने को मजबूर पिता

बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था की एक और शर्मनाक तस्वीर  प्रदेश के सिंगरौली जिले के ट्रामा सेंटर से सामने आई हैं. यहां मृतक नवजात बच्चे के शव को ले जाने के लिए एंबुलेंस तक नसीब नहीं हुआ. लचर स्वास्थ्य व्यवस्था से मजबूर होकर पिता मोटरसाइकिल की डिक्की में शव लेकर मदद के लिए कलेक्टर के पास पहुंच गया. कलेक्टर ने उचित कार्रवाई का भरोसा दिया है.

17 अक्टूबर को दिनेश भारती अपनी पत्नी मीना भारती को लेकर सिंगरौली के जिला अस्पताल पहुंचा था. पत्नी की डिलीवरी कराने के लिए. लेकिन पहले यहां पदस्थ स्टाफ ने अस्पताल की डाक्टर सरिता शाह ने प्रसव कराने की वजह महिला को शासकीय चिकित्सक से निजी क्लीनिक भेज दिया और 5 हजार रुपए भी लिए गए. लेकिन, जब उन्हें यह पता चला की बच्चे की कोख में ही मौत हो चुकी है, तो उसे वापस जिला अस्पताल भेज दिया और वहां उसकी डिलीवरी करवाई गई.

मृत बच्चे का जब जन्म हुआ तो परिजनों ने एंबुलेंस की मांग किया, ताकि बच्चे को अपने गांव ले जाकर उसका अंतिम संस्कार कर सके. लेकिन, परिवार जनों को  एंबुलेंस मुहैया नहीं हो पाई. इसके बाद पिता दिनेश भारती मृत बच्चे को अपनी मोटरसाइकिल की डिक्की में डालकर कलेक्ट्रेट पहुंच गए और कलेक्टर को अपनी फरियाद सुनाई. जिसके बाद सिंगरौली कलेक्टर आरआर मीना ने पूरे मामले के जांच के एसडीएम को तुरंत आदेश दिए. जांच कर रहे सिंगरौली एसडीएम ऋषि पवार ने बताया कि  जांच की जा रही है जांच में किसी तरह का दवाब नहीं है. सही जांच होगी और जो भी दोषी पाया जाता है उस पर उचित कार्रवाई की जाएगा.

अटल बिहारी वाजपेयी इंस्टीट्यूट ऑफ गुड गवर्नेंस एंड पॉलिसी एनालिसिस (एक सरकारी संस्थान) की एक रिपोर्ट के अनुसार, मध्य प्रदेश के प्रत्येक जिले में 108 एम्बुलेंस सेवाओं द्वारा औसतन हर दिन 53 आपातकालीन कॉलों पर ध्यान नहीं दिया जाता है. नतीजतन, हर साल 'निजी एम्बुलेंस' पर निर्भर मजबूर मरीजों की संख्या लगभग 10 लाख है.

नीति आयोग की 2021 की रिपोर्ट के अनुसार मध्य प्रदेश के कम से कम 40 फीसदी इलाकों में लोग स्वास्थ्य सेवाओं के लिए पूरी तरह से जिला अस्पतालों पर निर्भर हैं. लेकिन, 51 सरकारी सुविधाओं में से केवल 8 में ही डॉक्टरों की आवश्यक संख्या है. रिपोर्ट यह भी बताती है कि केवल 13 जिला अस्पताल नर्सों के लिए भारतीय सार्वजनिक स्वास्थ्य मानक (IPHS) की आवश्यकता को पूरा करते हैं और 35 में आवश्यक संख्या में पैरामेडिक्स तैनात है.

मीडिया रिपोर्टों की मानें तो मध्य प्रदेश मेडिकल काउंसिल के आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में लगभग 3400 लोगों पर एक डॉक्टर है. मध्य प्रदेश में लगभग 77000 डॉक्टरों की आवश्यकता है, लेकिन काउंसिल के आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में 22000 डॉक्टर ही फिलहाल कार्यरत हैं.

इनपुट-जय प्रकाश

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