“मैं पिछले आठ-नौ महीनों से हर एक दिन अपने लापता बेटे के शव की तलाश कर रहा हूं,” कश्मीर के शोपियां में एक किसान, मंज़ूर अहमद वागे, उस दिन को याद करते हुए भावुक हो जाते हैं जिस दिन से उसका बेटा लापता है.
वागे ने आखिरी बार अपने बेटे, शाकिर मंज़ूर को ईद 2020 के मौके पर देखा था, उनका बेटा प्रादेशिक सेना में काम करता था.
“वो ईद के लिए 2 अगस्त 2020 को सुबह 11 बजे के आसपास घर आया था, लेकिन शाम 6 बजे उसे वापस ड्यूटी पर जाना पड़ा. आखिरी बार मैंने उसे तभी देखा था. रात 9 बजे उनकी जली हुई कार कुलगाम जिले में मिली. हमने सोचा कि हम उसका शव कहीं आसपास मिल जाएगा,लेकिन वहां कुछ भी नहीं था. तीसरे दिन, एक किसान ने मुझे बताया कि मेरे बेटे को उसके बाग में पीटा जा रहा है. जब मैं वहां गया, तो मुझे उसका खून से सना और फटा कपड़ा मिला. ”मंज़ूर अहमद वागे
तब से, वागे और उनके कुछ पड़ोसी अक्सर फावड़े के साथ तलाश पर निकलते हैं, इस उम्मीद में की कहीं खुदाई में उनके बेटे का शव ही उन्हें मिल जाए.
वागे के छोटे बेटे, शान ने इस घटना के बाद कॉलेज छोड़ दिया था, उन्होंने कहा, "20 मार्च को, डीसीपी ने कहा कि उन्हें एक नहर में फेंक दिया गया था. हमने पूरी नहर की तलाशी ली लेकिन उसका शव नहीं मिला. हम हर दिन इस उम्मीद में वहां जाते हैं कि शायद हमें उनका शव कहीं मिल जाए. लेकिन हम उनके शव का पता नहीं लगा पा रहे हैं. ”
शाकिर की मां अक्सर भावुक हो जाती हैं. वो रोज दुआ करती हैं कि उनका बेटा वापस आ जाए. अगर नहीं, तो कम से कम उसका शव ही मिल जाए”
वागे कहते हैं, “जब तक मैं सांस ले रहा हूं, जब तक मेरे शरीर में ताकत है, मैं अपने बेटे की तलाश करता रहूंगा. वो अपने परिवार की स्थितियों के कारण सेना में शामिल हुआ था. अब, अगर उसे आतंकवादियों मार दिया, तो उसे शहीद का दर्जा दिया जाना चाहिए, लेकिन सरकार हमारी बात नहीं सुन रही है.”