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Himachal | चंबा का रुमालः कीमत ₹30,000, एक रुमाल बनने में लगते हैं 20-25 दिन

ललिता वकील के हुनर को क्रोशिए और धागे का ऐसा साथ मिला कि चंबा रुमाल को उन्होंने राष्ट्रपति पुरस्कार दिलवा दिया.

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शिमला (Shimla) के रिज मैदान पर लगे क्राफ्ट मेले के साथ ही चंबा रुमाल (Chamba Rumal) एक बार फिर सुर्खियों में है. जिस चंबा रुमाल की हम बात कर रहे हैं उसकी कीमत 250 रुपए से लेकर 30 हजार है. वहीं विदेशों में यह रुमाल लाखों में बिकता है. इन रुमालों की कीमत इसलिए भी ज्यादा है कि क्योंकि एक रुमाल को बनाने में 25 दिन लग जाते हैं. क्यों है यह रुमाल खास है आइए आपको बताते हैं.

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इस रुमाल को बनाने के लिए विशेष धागे का इस्तेमाल किया जाता है. जो या तो दिल्ली से लाया जाता है या फिर अमृतसर में मिलता है. रुमाल पर भगवान श्रीकृष्ण, राधा और गोपियों की रास लीला बनाने के लिए करीब एक महीना लग जाता है. लिहाजा कला को देखकर इसे देखने वाले का हैरान होना लाजमी है. इसी वजह से इन दिनों शिमला क्राफ्ट मेले में रुमाल को देखने वालों की भीड़ जुटी हुई है. रेशम के रंगीले धागों से कॉटन और खादी के कपड़े पर हुई कारीगरी हर किसी को हैरान कर रही है.

इस रुमाल की विदेशों में ज्यादा कीमत है, ये कला अब विलुप्त होती है जा रही है. लेकिन फिर भी कुछ इस कला के दीवाने हैं जो इसे बचाने की कोशिशों में हैं और इसमें सबसे ऊपर नाम आता है ललिता वकील का जिनके हुनर को क्रोशिए और धागे का ऐसा साथ मिला कि चंबा रुमाल को उन्होंने राष्ट्रपति पुरस्कार दिलवा दिया.

निडल पेंटिंग

निडल पेंटिंग जैसा कि नाम से साफ हो रहा है कि सूई से की गई पेंटिंग. इस रुमाल पर की गई कलाकृतियां हू-ब-हू ऐसी हैं जैसे दीवर पर पेंटिंग की गई हो. और फिर पूरी तैयार होने के बाद वह कपड़ा किसी कलात्मक तस्वीर से कम नहीं लगता. चंबा रुमाल रेशम और सूती कपड़े पर दोनों ओर समान कढ़ाई कर तैयार किया जाता है. यह कला आमतौर पर रुमाल, टोपी, हाथ के पंखे आदि पर भी की जाती है.

चंबा रुमाल का इतिहास

चंबा रुमाल का इतिहास सदियों पुराना है इसका वर्णन 16वीं शताब्दी में आता है. कहा जाता है कि सिखों के गुरू, गुरू नानक देव जी की बहन नानकी ने सबसे पहले इस रुमाल को बनाया था. जो आज भी ऐतिहासिक धरोहर के रूप में होशियारपुर के एक गुरूद्वारे में रखा हुआ है. चंबा रुमाल को यह नाम हिमाचल के जिला चंबा से मिला है और यहां आज भी सदियों से इस पर काम होता है. कहा जाता है कि 17वीं सदी में राजा पृथ्वी सिंह ने चंबा रुमाल की कला को बहुत अधिक संवारा और रुमाल पर ‘दो रुखा टांका’ कला शुरू की उस समय में चंबा रियासत में आम लोगों समेत शाही परिवार भी चंबा रुमाल की कढ़ाई करते थे.

चंबा के राजा ने 1883 में ब्रिटिश सरकार को भेंट किया था रुमाल

18वीं शताब्दी में बहुत से कारीगर इस कला से जुड़े थे. राजा उमेद सिंह ने इस कला को विदेश तक पहुंचाया, कहा जाता है कि चंबा का रुमाल लंदन के विक्टोरिया अल्बर्ट म्यूजियम में भी मौजूद है. जिसे चंबा के तत्कालीन राजा गोपाल सिंह ने 1883 में ब्रिटिश सरकार के नुमाइंदों को भेंट किया था. कहा जाता है कि उस रुमाल पर कुरुक्षेत्र युद्ध की आकृतियों उकेरी हुई हैं.

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