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16 करोड़ आरोग्य सेतु यूजर का डेटा खतरे में

सरकार ने खुद कबूल किया है उसने ऐप पर पर्सनल जानकारियों की सुरक्षा के लिए बनाए गए अपने नियमों का ही पालन नहीं किया.

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वीडियो एडिटर: आशुतोष भारद्वाज

वीडियो प्रोड्यूसर: मौसमी सिंह

16 करोड़ से ज्यादा हिंदुस्तानियों ने सरकार के आरोग्य सेतु ऐप को डाउनलोड किया. कोविड-19 के मामलों को ट्रेस और ट्रैक करने के लिए इस एप पर थोक के भाव में भारतीयों का पर्सनल डेटा मौजूद है. और अब सरकार ने खुद कबूल किया है उसने ऐप पर आपकी पर्सनल जानकारियों की सुरक्षा के लिए बनाए गए अपने नियमों का ही पालन नहीं किया.

2 अप्रैल 2020 को NIC न ऐलान किया कि उसने कोरोना से जंग के लिए पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप में आरोग्य सेतु कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग ऐप बनाया है.

चूंकि ये आरोग्य सेतु ऐप सेहत से लेकर लाइव लोकेशन तक रिकॉर्ड करता था इसलिए शुरू से चिंता जताई जा रही थी कि अगर ये सेंसिटिव डेटा गलत हाथों में पड़ गया तो क्या होगा?

इस चिंता को दूर करने के लिए 11 मई 2020 को सूचना प्रौद्योगिकी और इलेक्ट्रॉनिक्स मंत्रालय (Ministry of Electronics and Information Technology ) और NIC ने आरोग्य सेतु का डेटा का एक्सेस किसको होगा और किसको नहीं, किसे शेयर किया जा सकता है और किसे नहीं, इसको लेकर प्रोटोकॉल तय किया.

इसे अमल में लाने का मतलब था कि ऐप पर मौजूद डेटा का इस्तेमाल कोई प्राइवेट कंपनी नहीं कर पाती, जैसे आपको विज्ञापन भेज कर तंग करने वाली कोई कंपनी या फिर कोई गैर सरकारी कंपनी इसके जरिए आप पर निगरानी नहीं रख पाती.

लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि स्वतंत्र पत्रकार और RTI एक्टिविस्ट सौरव दास ने के एक आरटीआई आवेदन पर NIC ने खुलासा किया है कि प्रोटोकॉल रिलीज किए जाने के 6 महीने बाद भी , बहुत से सुरक्षा के उपाय लागू ही नहीं किए गए.

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सुरक्षा उपाय 1 - पेपर ट्रेल

NIC को इस बात का लेखा जोखा रखना था कि डेटा किन एजेंसियों या लोगों से शेयर किया जा रहा है.जिसने ये प्रोटोकॉल बनाने में मदद की थी, उस विधि सेंटर के मुताबिक इसका मतलब ये था कि पेपर ट्रेल रखा जाए ताकि डेटा के गलत इस्तेमाल करने वालों को ट्रैक किया जा सके और उन्हें जवाबदेही तय हो.

तो क्या ये पेपर ट्रेल हो रहा है? नहीं. जब NIC से पूछा गया कि उसने किसके साथ ऐप का डेटा शेयर किया है तो उसने जवाब में सिर्फ जेनरिक लिस्ट शेयर कर दी कि डेटा किसके साथ शेयर किया जा सकता है. उसने ये नहीं बताया कि दरअसल डेटा किसको दिया गया.

एक दूसरे RTI आवेदन में जब NIC से ये पूछा गया कि क्या खुफिया एजेंसियों से भी डेटा शेयर किया जा रहा है, जो कि बहुत ही रेयर मालमों में किया जा सकता है... तो उसने इस सवाल को भी टाल दिया.

सुरक्षा उपाय 2 - सुरक्षा की प्रक्रिया

कोई भी संस्था - सरकारी या निजी - जिनके साथ NIC ने आरोग्य सेतु का डेटा शेयर किया है, उन्हें 'उचित' सुरक्षा उपायों को लागू करना था

क्योंकि भारत में अभी भी डेटा प्रोटेक्शन लॉ नहीं है, इसलिए ये उम्मीद की गई थी कि NIC और इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्रालय ये सुनिश्चित करेगा कि मॉडल सुरक्षा की प्रक्रिया हैं, खासकर तब जब ऐप डेटा को न केवल सभी राज्य के स्वास्थ्य सचिवों बल्कि देश भर के सभी 700+ जिला मजिस्ट्रेट के साथ भी शेयर किया जा सकता है. लेकिन क्या उन्होंने इस तरह का कुछ किया है? नहीं

NIC केवल उन संस्थाओं की जिम्मेदारी बताकर पल्ला झाड़ ले रहा है जिन्हें डेटा मिला है, और बता रहा है कि उसने सुरक्षा के उपाय नहीं किए हैं इसकी जगह कोई मॉडल सुरक्षा उपाय नहीं हैं. मतलब .. ये सुरक्षा उपाय भी एक ढोंग ही है

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सुरक्षा उपाय 3- ऑडिट और रिव्यू

कोई भी पार्टी जिसके साथ प्रोटोकॉल के तहत डेटा शेयर किया जाता है, वो किसी अन्य उद्देश्य के लिए डेटा का फिर से उपयोग नहीं कर सकती है या किसी और को डेटा नहीं दे सकती. ये पक्का करने के लिए प्रोटोकॉल में कहा गया कि जिन्हें डेटा दिया जाएगा उनका केंद्र सरकार ऑडिट और रिव्यू कर सकती है.

डेटा के गलत शेयरिंग को रोकने के लिए ये एक बड़ा उपाय था. ऐसा उपाय जिससे परिवहन मंत्रालय के डेटा लीक जैसी घटना न हो पाए.. तो क्या इस ऑडिट और रिव्यू मैकेनिज्म के जरिए आरोग्य सेतु डेटा को सुरक्षित किया जा रहा है?

नहीं. इसके बजाए NIC ने कहा कि यह RTI सवाल अनुपयुक्त है, क्योंकि यह डेटा को सरकारी संस्थानों के साथ शेयर करता है. लेकिन तथ्य यह है कि ऑडिट की प्रक्रिया सरकारी संस्थानों पर भी लागू होती है. जिनमें खुद NIC भी शामिल है!

सुरक्षा उपाय 4- डेटा किसका है, ये गुप्त रखना

प्रोटोकॉल में जिसके बार में सबसे ज्यादा बात हुई थी, वो ये सुरक्षा उपाय था- कोविड से लड़ने के लिए शोध कर रहे किसी संस्थान को डेटा दिया जाएगा तो ये नहीं पता लगने दिया जाएगा कि डेटा किसका है? आरोग्य सेतु ऐप को बनाने के पीछे एक बड़ा मकसद यही शोध था.

मतलब- कोई तीसरा पक्ष कभी यह नहीं जान पाएगा कि यह डेटा किसका था. इससे तय होगा कि संबंधित शख्स की प्राइवेसी का उल्लंघन ना हो. भले ही ऐप के पूरे डेटा का उपयोग कर लिया गया हो. लेकिन क्या सरकार ने ऐसा किया? एक बार फिर.. इसका जवाब ना में है. RTI पर प्रतिक्रिया से पता चला है कि डेटा किसका है, इसे छिपाने के तरीकों का पता लगाने के लिए सरकार जो विशेषज्ञ समिति बनाने वाली थी वो अब तक बनी ही नहीं.

NIC इस सवाल से भी बच गया कि इस तरह के डेटा को बेनाम करने के लिए अब तक क्या किया गया. इसका मतलब यह हुआ कि लाखों भारतीय नागरिक जिन्होंने आरोग्य सेतु ऐप डॉउनलो़ड किया था, उनका डेटा असुरक्षित है. उनके डेटा का बिना जवाबदेही के गलत उपयोग किया जा सकता है. द क्विंट ने श्रीनिवास कोडाली और अनिवर अराविंद जैसे साइबर एक्सपर्ट, रमन चीमा और वृंदा भंडारी जैसी डिजिटल राइटस लॉयर्स से भी बात की. ताकि हम इस मामले से जुड़ी चिंताओं को समझ सकें. इन लोगों ने जो चिंताएं बताईं, आप उन्हें हमारी वेबसाइट पर पढ़ सकते हैं.

जिनकी RTI एप्लीकेशन के जरिए क्विंट ये बड़े खुलासे कर रहा है, सौरव दास से समझिए कि सरकार ने सुरक्षा उपायों को लागू नहीं किया, इसके क्या नतीजे हो सकते हैं.

सरकार को नहीं पता कि दूसरी और तीसरी पार्टी के साथ जो डेटा शेयर किए जा रहे हैं. उसके लिए किस तरह के सुरक्षा उपाय करने चाहिए. ये दिखाता है कि हमारे डेटा की सुरक्षा के लिए वो कितनी गंभीर है. 2018 में दुनिया ने सबसे बड़ी सुरक्षा चूक देखी, जब हमारा आधार का डेटा लीक हुआ. वो भी तब जब सुरक्षा उपाय किए गए थे. अभी कोई उपाय नहीं किए गए हैं. क्या गारंटी है कि हमारी डेटा सुरक्षित रहेगी. उसी तरह ऑडिट और रिव्यू मैकेनिज्म नहीं होने से सरकार हमारे डेटा के गलत उपयोग को मॉनिटर नहीं कर रही है. यहां तक की गुप्त रखने का प्रोटोकॉल भी नहीं फॉलो किया जा रहा. तीसरी पार्टी के साथ जो डेटा शेयर किया जा रहा है, जिसकी पहचान हो सकती है, डेटा ब्रोकर्स से बेची जा सकती है और प्राइवेट कमर्शियल हित के लिए इस्तेमाल की जा सकती  है लोगों के हित के लिए नहीं तो ऐसे में कभी भी आधार जैसी घटना हो सकती है.  
सौरव दास, पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट
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