बिहार चुनावों में नरेंद्र मोदी और उनके विरोधियों के बीच हो रहे नकारात्मक प्रचार अभियान की कड़वाहट से राज्य के अधिकांश वोटरों का इन दोनों ही धड़ों से मोहभंग हुआ है. धीरे-धीरे इन दोनों ही विरोधी खेमों में एक-दूसरे के लिए काफी कड़वाहट आ गई है, जो जाहिर तौर पर लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है.
बदलाव के लिए ही सही, जब सोनिया गांधी और उनके पुत्र राहुल अगले महीने बिहार दौरे पर हों, तो उन्हें चुनाव प्रचार का एक नया तरीका अपनाना चाहिए. उन्हें मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए की सरकार में राज्य में आए सकारात्मक बदलावों के बारे में लोगों को बताना चाहिए.

