छह साल पहले, फ्रांस (France) के उत्तर में जर्मन सीमा के पास स्थित एक शांत शहर फॉरबैक में, मुझे भारतीय पहलवानों की टीम का इंटरव्यू करने का मौका मिला. इसमें विनेश फोगाट, साक्षी मलिक और बजरंग पुनिया शामिल थे. वे पेरिस में विश्व कुश्ती चैंपियनशिप के लिए तैयारी में लगे थे. बृजभूषण शरण सिंह (Brij Bhushansharan Singh) उस समय भी रेसलिंग फाउंडेशन ऑफ इंडिया (WFI) के अध्यक्ष थे. मैंने देखा कि कैसे भारतीय टीम अपने यूरोपीय प्रतिद्वदियों के मुकाबले एक असाधारण और कड़ी ट्रेनिंग का सामना कर रही थी. यह एक तानाशाही प्रवृति वाला टॉक्सिक वर्क कल्चर का संकेत देने वाला था.
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पहलवानों का समर्थन मेडल दिलाने के लिए नहीं यौन-उत्पीड़न के खिलाफ लड़ाई के लिए करें
Wrestlers Protest: सर्वाइवर्स ने हमें अपनी कहानियां बताई हैं, और हम कैसे प्रतिक्रिया देते हैं, यह मायने रखता है.

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