यह बात इतनी बार कही गई है कि सच लगने लगती है. मिसाल के तौर पर, यह कहा जाता है कि परिवार की औरतें ही नहीं चाहतीं कि घर में बेटियां जन्म लें. ऐसे वाकयों की अक्सर चर्चा होती है कि बेटे की चाहत में सास और ननद ही बहू को अल्ट्रासाउंड के लिए ले जाती हैं और गर्भ में बेटी होने का पता चलने पर एबॉर्शन करवाती हैं. या अक्सर यह कहा जाता है कि सास ही बहू की सबसे बड़ी दुश्मन होती है.
ननदों को भी अक्सर परिवार में टकराव का रिश्ता मान लिया जाता है. बाल विवाह करवाने में भी मां और मौसी जैसी रिश्तेदारों की भूमिका मान ली जाती है. यहां तक कि बेटों के नाम सारी पैतृक जायदाद लिखवाने और बेटियों को संपत्ति में हिसा न देने की जिद करती माताओं के किस्से भी आम हैं.

