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NCT एक्ट में बदलाव, दिल्ली को कई कदम पीछे ले जाने जैसा

सदियों से दिल्ली जीतने का मतलब हिंदुस्तान पर राज करना रहा है, और यह आज के दौर की भी सच्चाई है.

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दिल्ली का शासक गयासुद्दीन तुगलक सूफी संत निजामुद्दीन औलिया से बहुत घबराया रहता था और उनकी शोहरत से परेशान भी था. एक दिन एक अभियान से दिल्ली लौटते हुए तुगलक ने निजामुद्दीन औलिया को एक फरमान भेजा जिसमें लिखा था कि उसके शहर पहुंचने से पहले निजामुद्दीन दिल्ली छोड़कर चले जाएं. निजामुद्दीन औलिया ने शांत भाव से फारसी में भविष्यवाणी की- हनूज दिल्ली दूर अस्त (यानी दिल्ली अभी दूर है).

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तुगलक दिल्ली पहुंचता, इससे पहले अपने ही स्वागत समारोह में गिरने से उसकी मौत हो गई. इतिहास हमें सिखाता है कि किसी एक शख्स या विचारधारा का दिल्ली पर ‘राज’ नहीं हो सकता. दिल्ली को लगातार लूटा, तबाह किया गया है, इसके शासक बदलते रहे हैं और इसे फिर-फिर बनाया गया है.दिल्ली की सल्तनत सिर्फ मामलुक, गोरी, लोधी, राजपूत, मुगलों के हाथों से ही नहीं फिसली, अंग्रेजी हुकूमत तक इस पर हमेशा के लिए कब्जा नहीं जमा पाई. वह हुकूमत जिसके लिए कहा जाता था कि उसके साम्राज्य का सूरज कभी नहीं डूबता. हां, जब आजाद भारत ने तय किया कि दिल्ली राजधानी के लिए मुफीद है, तब उसे अपनी सही जगह और स्वामित्व मिला.  

लेकिन भारत को न तो अब किसी सम्मति की जरूरत है, न ही असम्मति की

14 अगस्त, 1947 की आधी रात को नेहरू ने संसद भवन (जिसे जल्द ही नई संसद से बदल दिया जाएगा) से देश की अंतरात्मा को झकझोरा था. इस मौके पर उन्होंने जो भाषण दिया था- ट्रिस्ट ऑफ डेस्टिनी, उसमें ‘समृद्ध, लोकतांत्रिक और प्रगतिशील देश’ की जरूरत की बात कही थी. ये तीन सरल, लेकिन गंभीर शब्द हैं. आजादी के 73 साल बाद भी इन्हें लगातार प्रदर्शित होना चाहिए. बार-बार दोहराया और याद रखा जाना चाहिए.

लेकिन आज समृद्धि, लोकतंत्र और प्रगति, इन मापदंडों का अनुपात बिगड़ा हुआ है. देश की दो तिहाई जनसंख्या 2 डॉलर प्रति दिन से भी कम पर गुजर बसर करती है. विश्वव्यापी सूचकांक बताते हैं कि भारत में लोकतांत्रिक मूल्यों में चिंताजनक गिरावट हो रही है. जहां तक प्रगतिशीलता का सवाल है, ऐसा कोई दिन नहीं बीतता जब ‘गौरवशाली अतीत’ के जरिए लोगों को धमकाया नहीं जाता. जब संशोधनवाद का डर नहीं दिखाया जाता, जिसे सत्ता की स्वीकृति मिली हुई है.

हमें जो आइना दिखाता है, हम उसे अक्खड़ की तरह दुत्कारते हैं और कहते हैं, इन लोगों ने “खुद को दुनिया का संरक्षक बना दिया है जिन्हें यह बात नहीं पचती कि भारत में कोई उनके समर्थन का इंतजार नहीं करता.”

नहीं, भारत को किसी राय की जरूरत नहीं, न बाहरियों की, न अपने बीच बैठे ‘दूसरों’ की. अपने लोगों की भी नहीं, जो ‘वोट’ के जरिए अपना विरोध जताते हैं.

तो, यह घृणा किसी धुंधली सच्चाई की ओर जाती है- जैसा कि तथ्य बताते हैं- बहुसंख्यकवादी राजनीति की तरफ. ऐसी विभाजनकारी राजनीति की ओर, जो ध्रुवीकरण करती है, लोगों को सम्मोहित करती है और अंधा भी बनाती है. नेहरू जी ने ट्रिस्ट विद डेस्टिनी यानी नियति से भेंट के दौरान सबको साथ लेकर चलने की बात कही थी. लेकिन यह विघटनकारी राजनीति उस भावना को छिन्न भिन्न करती है. उसे खारिज करती है और सुविधाजनक तरीके से उसकी व्याख्या करती है

दिल्ली के नागरिकों की मर्जी चलेगी या एलजी की

कानूनी बारीकियों को भूल जाइए. इस समय दिल्ली में राजनीतिक स्तर पर एक दूसरे पर हावी होने की कोशिश की जा रही है (जिसे राजनीतिक वन अपमैनशिप कहा जा सकता है) और संवैधानिक कामकाज में ‘स्पष्टता’ की कमी दिख रही है. ऐसे में लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति और संघवाद की रूह का छटपटाना लाजमी है. विकेंद्रीकरण और सशक्तीकरण के प्राकृतिक और विकासवादी जनादेश, जोकि सभी प्रगतिशील लोकतांत्रिक देशों को मजबूत बनाते हैं, के विपरीत दिल्ली की राजनीति को अधिक केंद्रीकृत और नियंत्रित किया जा रहा है. दिल्लीवासियों को उनकी मर्जी के खिलाफ कमजोर बनाया जा रहा है. राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली (संशोधन) विधेयक 2021 ने एक ‘अप्रतिनिधिक प्रशासन’ के लिए मंच तैयार किया है. भले ही यह उतना स्पष्ट नहीं लेकिन इसका अमली रूप यही होने वाला है.

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दिल्लीवालों की इच्छा उनके निर्वाचित प्रतिनिधियों के जरिए प्रदर्शित होती है. लेकिन अब वह लेफ्टिनेंट गवर्नर की इच्छा की मोहताज होगी. वह लेफ्टिनेंट गवर्नर, जिसकी नियुक्ति केंद्र सरकार करती है. यह कई कदम पीछे जाने जैसा है. याद किया जा सकता है कि कैसे 1952 में दिल्ली की पहली विधानसभा बनी, फिर खत्म हुई, फिर 1993 में दोबारा उसकी स्थापना हुई. कांग्रेस, भाजपा और आप, सभी ने उसके ‘हाफ स्टेट’ यानी ‘अपूर्ण राज्य’ के दर्जे से इतर अधिकार मांगे लेकिन एक कसक बनी रही.

जबकि दिल्ली की आबादी दो करोड़ से भी अधिक की है, जोकि कई ‘पूर्ण राज्यों’ से अधिक है, उसकी यह अभिलाषा विधि और न्याय संगत है. .

दिल्ली राज्य का संकट पुद्दूचेरी जैसा ही

2021 में दो ‘अपूर्ण राज्यों’ दिल्ली और पुद्दूचेरी में ऐसे बदलाव हुए जिन्हें पक्षपात के बिना समझा जाना चाहिए. दोनों ही राज्यों में ऐसी पार्टियों की सरकारे थीं, जो केंद्र में सरकार नहीं चलातीं.

पुद्दूचेरी में निर्वाचित सरकार को अपने पांच साल के कार्यकाल में ज्यादातर समय एलजी से भिड़ंत में बिताना पड़ा. आखिर में सरकार इस मुकाबले में परास्त हुई. मौजूदा मुख्यमंत्री ने कहा, “नामित एलजी पुद्दूचेरी के लोगों के अधिकारों को छीने, इसे रोकने के लिए हम पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग करते हैं.” आज दिल्ली के मुख्य़मंत्री ने दुख जताते हुए कहा, यह लोकतंत्र के लिए दुख का दिन है. वह भी अधिकारों की जंग को हार चुके हैं.

इन दोनों मामलों में भावनाएं और अंतिम नतीजा एक जैसा ही है. बहुसंख्यकवाद के दौर में सिर्फ संख्या मायने रखती है, संवैधानिक भावना नहीं.

2013 में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में कहा गया था कि “पूर्ण राज्य के अभाव में दिल्ली का विकास सीमित है और कांग्रेस ने इस मुद्दे पर पिछले 14 वर्षों के दौरान कुछ नहीं किया.” सात साल बाद इतिहास के कुछ पन्नों को अपनी आसानी के लिए पलट दिया गया है. साथ ही उन पन्नों पर लिखी टिप्पणियों को भी भुला दिया गया है.
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सोचिए, कि इस विधेयक के जरिए विपक्ष (चाहे वह किसी भी पार्टी का हो) को अधिक ‘स्वर’ मिलेगा या वह और मौन हो जाएगा? क्या दिल्ली सरकार के लोक निर्माण, अवसंरचना और सार्वजनिक सेवाएं पड़ोसी राज्यों उत्तर प्रदेश, हरियाणा से बदतर होंगी, या बेहतर? सरकार जो कर रही है, क्या उस पर दिल्ली वाले भरोसा करेंगे, क्योंकि 2015 में उसी सरकार को 70 में से 67 सीटें मिली थीं, और पिछले साल 70 में से 62.

दिल्ली को जीतने का मतलब है, हिंदुस्तान पर राज

दिल्ली भारतीय राजनीति की धुरी है, ‘भारतीय मॉडल’ का विश्वव्यापी आकर्षण और हमारी श्रेष्ठता के बोध की ‘राजधानी’. लेकिन दिल्ली क्या एक ऐसे राजनीतिक विकल्प का दंश बन रही थी, जिसे नोंच फेंकना जरूरी था. लेकिन क्या सभी सवालों के जवाब इतने सीधे होते हैं. ये अटकलें हो सकती हैं, परिस्थितिजन्य उत्तरों का इंतजार करती हुई. इससे आश्वासन भी नहीं मिलते. समय ही इसका जवाब देता है, और इस बीच कई बेढंगे सवाल और खड़े कर देता है जिसके जवाबों और स्पष्टीकरणों की जरूरत फिर से पड़ती है.

सदियों से दिल्ली जीतने का मतलब हिंदुस्तान पर राज करना रहा है, और यह आज के दौर की भी सच्चाई है.

आधुनिक दिल्ली ने सात प्राचीन शहरों से बनते-बिगड़ते अपना वजूद हासिल किया है. इसका जिक्र महाभारत में भी है. इसके अलावा भारतीय राजनीति के लिए यह युद्ध के मैदान से कम नहीं है.

मिर्जा गालिब ने ‘दिल्ली’ के लिए तो कभी कहा था- “इक रोज अपनी रूह से पूछा, कि दिल्ली क्या है. तो यूं जवाब में कह गई, ये दुनिया मानो जिस्म है, और दिल्ली उसकी जान.”

शायद, दिल्ली का आधुनिक काल का संघर्ष नैतिक (याद करें, राजधर्म?), संवैधानिक, प्रशासनिक या ‘स्पष्टवादी’ न हो, जैसा इसे पेश किया गया है, लेकिन यह भारतीय राजनीति की बची-खुची जान को अपनी मुट्ठी में करने की लड़ाई जरूर है.

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(रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल भूपिंदर सिंह अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह और पुडुचेरी के पूर्व लेफ्टिनेंट गवर्नर रह चुके हैं. यह एक ओपनियन पीस है. यहां व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं. क्विंट का उनसे सहमत होना जरूरी नहीं है.)

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