कठुआ में 8 साल की बच्ची के साथ जो बर्बरता हुई, वह सांप्रदायिकता और महिलाओं के खिलाफ हिंसा से जुड़ी त्रासदी की इंतेहा है. जब भी सांप्रदायिक हिंसा होती है, तब पुरुषों के मुकाबले महिलाओं के उसका शिकार होने की आशंका ज्यादा रहती है. ऐसे समय में महिलाओं के खिलाफ हिंसा ‘शैतानी शक्ल’ अख्तियार कर लेती है. ऐसा क्यों होता है? ऐसा पहली बार नहीं हुआ है और साहित्यकार लैंगिक और धार्मिक हिंसा के इस पहलू को सामने लाते रहे हैं.
कठुआ मामले के बाद महिलाओं के खिलाफ हिंसा को सांप्रदायिक संदर्भ में समझने की जरूरत है. हम साहित्य के माध्यम से इसे समझने की कोशिश करते हैं क्योंकि साहित्य समाज का आईना होता है. मैं उर्दू, हिंदी और अंग्रेजी साहित्य में दर्ज ऐसे किस्से-कहानियों और घटनाओं का जिक्र करना चाहूंगी, जिनसे मैं अच्छी तरह वाकिफ हूं.
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Topics: गुलजार इतिहास कठुआ रेप केस
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