कुछ साल पहले कैलाश चंद्र चौहान की एक कहानी आई थी- हाइवे पर संजीव का ढाबा. इसमें पश्चिमी उत्तर प्रदेश का दलित समुदाय का एक युवक गांव की जाति की जकड़न से थक-हार कर हाइवे पर ढाबा खोलता है और सफलतापूर्वक उसे चलाता है. उसने खाना बनाने और परोसने के काम पर गांव के दलितों को रखा है. कहानी बताती है कि ब्राह्मण समेत हर जाति के लोग उसके ढाबे पर खाना खाते हैं, जबकि गांव में वही लोग संजीव का छू जाना भी पसंद नहीं करते.
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इस देश में जाटव भोजनालय,खटिक कैंटीन और पासी रेस्टोरेंट क्यों नहीं?
भारतीय समाज में अभी तक मानव को मानव समझने की समझदारी विकसित नहीं हुई है

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