कुछ साल पहले की बात है. मेरी एक दिन पुरानी कार मुंबई में बांद्रा के नजदीक मेरे घर के बाहर से चोरी हो गई थी. मैं चोरी की एफआईआर लिखाने थाने पहुंचा, तो मुझे सीनियर इंस्पेक्टर से मिलने को कहा गया. पचास के करीब वह थुलथुल शख्स अपनी डेस्क पर झुका अखबार के क्लासीफाइड विज्ञापनों में घेरा लगा रहा था.
कार चोरी होने की बात बताने के बाद मैंने उससे पूछा कि वह कर क्या रहा है? उसने कहा, ‘’मेरे रिटायरमेंट में काफी कम समय बचा है. मुझे अपना सरकारी क्वार्टर छोड़ना पड़ेगा. मेरी पत्नी घर खरीदने पर जोर लगाए हुए है. इसलिए आजकल विज्ञापनों में देख रहा हूं कि मुंबई में कहां-कहां मकान मिल रहे हैं.’’
भारत में टैक्सी और खाना दुनियाभर से सस्ता
मैंने पूछा कि कहीं कुछ मिला, तो उसने कहा, ‘’यहां घर खरीदना मेरे वश में नहीं है.’’ भारतीय शहरों में रियल एस्टेट का इतना महंगा होना अचरज की बात है. मैं अक्सर साइकिल से दफ्तर पहुंचता हूं. जिस दिन साइकिल से नहीं जाता हूं या फिर बारिश की वजह से ऐसा नहीं कर पाता हूं, उस दिन टैक्सी लेता हूं. घर से दफ्तर की दूरी छह किलोमीटर है और टैक्सी वाला ट्रैफिक के हिसाब से 85 से 100 रुपये चार्ज करता है. इतने कम पैसे में दुनिया के किसी भी प्रमुख शहर में टैक्सी मिलना मुश्किल है.
लंदन में इसी दूरी के मुझे 1200 रुपये देने पड़ते.
न्यूयॉर्क, टोक्यो, हेलसिंकी और पेरिस में भी टैक्सी का किराया महंगा है. दुबई या शंघाई में थोड़ा सस्ता हो सकता है . लेकिन बेंगलुरु, जहां मैं अब रहता हूं, वहां जितना सस्ता तो नहीं हो सकता. खाने के मामले में भी यही हाल है. भारत के किसी भी इलाके में आपको 50 रुपये में अच्छा खाना मिल जाएगा. लेकिन मैंने अभी जिन विदेशी शहरों का जिक्र किया, वहां यह संभव नहीं है. पचास रुपये लंदन में आधा पाउंड या न्यूयॉर्क में 70 सेंट होगा, जो वहां के हिसाब से चिल्लर है.
लेकिन भारत में रियल स्टेट है जबरदस्त महंगा
रियल एस्टेट का मामला आते ही भारत में चीजें एकदम बदल जाती हैं. मेरी बिल्डिंग की अगली नई बिल्डिंग में दो फ्लैट बिकाऊ हैं. दोनों की कीमत सात-सात करोड़ रुपये है. कुछ सौ गज की दूरी पर एक और बिल्डिंग में दो फ्लैट पांच-पांच करोड़ रुपये से ज्यादा की प्राइस टैग लगाए बैठे हैं. एयरपोर्ट जाने के रास्ते में प्रॉपर्टी के एड वाले कम से कम दो दर्जन होर्डिंग मिल जाएंगे. कइयों में फ्लैटों की कीमत लिखी है और इनमें से हरेक चार करोड़ रुपये से अधिक का है.
लोकेशन प्राइमरी नहीं, फिर भी कीमत प्राइमरी
मजेदार बात यह है कि ये प्रॉपर्टी शहर के बाहरी इलाके में है और इनमें कोई भी चार करोड़ रुपये से कम का नहीं है. कभी-कभी मुझे बेसिक, मिडिल क्लास फ्लैट के विज्ञापन दिख जाते हैं. लेकिन ये भी कोई खास सस्ते नहीं हैं.
मैं बांद्रा में था तो किराये के मकान में रहता था. आज बांद्रा और उस जैसे दूसरे इलाकों में मकानों का किराया डेढ़ लाख रुपये महीने से शुरू होता है और प्रॉपर्टी की कीमतें सात करोड़ रुपये तक पहुंच गई है.
ये प्रॉपर्टी भी बेसिक दो-बेडरूम वाले फ्लैट हैं, जो अपार्टमेंट बिल्डिंग के तौर पर बने हैं. वे कोई स्पेशल या फैंसी फ्लैट नहीं है. वे साधारण प्लैट हैं. इतनी कीमत में आपको न्यूयॉर्क या लंदन के अंदरुनी इलाके में मकान मिल जाएंगे. सात करोड़ रुपये का मतलब होता है एक मिलियन (दस लाख) डॉलर . इतनी कीमत में दुनिया के किसी भी शहर में आपको रहने की बेहद खूबसूरत जगह मिल सकती है.
असल में अचरज की बात तो यह है कि रुपये की वास्तविक कीमत को कन्वर्ट (परिवर्तित) करते ही भारत में रियल एस्टेट और महंगा हो जाता है. डॉलर की तुलना में रुपये की परचेजिंग पावर पैरिटी (पीपीपी) तीन से अधिक है. इसका मतलब यह है कि अमेरिका में रुपये के मूल्य के बराबर रकम में आप जितनी चीजें खरीदेंगे, उसमें आप भारत में तिगुनी चीजें खरीद सकते हैं. यही वजह है कि भारत में टैक्सी का 100 रुपये का मेरा किराया न्यूयॉर्क में लगभग 300 रुपये के बराबर हो जाता है.
वहां मुझे यह महंगा लगता है. इसी तरह 50 रुपये का मेरा खाना 150 रुपये का हो जाता है. इस हिसाब से 7 करोड़ रुपये के फ्लैट की कीमत 21 करोड़ रुपये हो जाती है. लेकिन भारत के शहरों में जहां ट्रांसपोर्ट और भोजन काफी सस्ता है, वहां रियल एस्टेट की कीमतें बेहिसाब महंगी क्यों है?
इसका एक आसान जवाब तो यह है कि अंग्रजों ने यहां कई शानदार इलाके बनाए. ये अपने आप में अनोखे हैं. शायद इसीलिए लुटियन्स दिल्ली या साउथ मुंबई दिल्ली या मुंबई के दूसरे इलाकों से ज्यादा महंगे हैं. लेकिन इस लॉजिक से इस बात का जवाब नहीं मिलता कि बेंगलुरु में फ्लैट्स इतने महंगे क्यों है. दूसरी बात यह कि आखिर ऐसी जगहों पर फ्लैट खरीदने वाले लोग कौन हैं और ये लोग कहां और कैसे पैसे बना रहे हैं?
आखिर कौन खरीदता है इतने महंगे फ्लैट
भारत में सिर्फ 5, 430 लोग एक करोड़ रुपये से ज्यादा का इनकम टैक्स चुकाते हैं. मुझे यह भी पता है कि इनकम टैक्स न चुकाने वाले लोगों की तादाद भी काफी ज्यादा है. फिर भी इस बात का जवाब नहीं मिलता कि भारत के हर शहर में करोड़ों के फ्लैट खरीदने वाले ये लोग कौन हैं?
कॉरपोरेट सेक्टर में कुछ ही सौ लोग ऐसे हैं, जिनकी सैलरी बेहद मोटी है. ये लोग बड़ी कंपनियों के सीईओ या टॉप के दूसरी, तीसरी पोजीशन वाले लोग हैं. फिर भी मेरे इर्द-गिर्द बिकने के लिए खड़े हजारों सैकड़ों-हजारों फ्लैट मौजूद हैं. भारत में रियल एस्टेट का इतना महंगा होना मेरे लिए बेहद अचरज की बात है. कोई मुझे दुनिया के इस इलाके में मकानों की वास्तिवक और बाजार कीमतों में अंतर का रहस्य समझा दे.
