इस लेख के शुरू में एक स्पष्टीकरण. यह लेख 2 जून 2017 से 1 सितंबर 2017 के बीच नहीं लिखा जा सकता था, क्योंकि उत्तराखंड हाइकोर्ट ने जून, 2017 के आदेश में यह कहा कि कोई भी मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय दल, मान्यता प्राप्त राज्य स्तरीय दल, संस्था, एनजीओ या व्यक्ति इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन की सोशल मीडिया, अखबार, टीवी समेट कहीं भी आलोचना नहीं कर सकता.
लेकिन सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की बेंच ने 1 सितंबर, 2017 को उत्तराखंड हाईकोर्ट के इस फैसले पर रोक लगा दी. इस वजह से अब इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन की आलोचना संभव है.

