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ब्‍लॉग से | भारत-पाक कूटनीतिक मैच में मोदी ने पहला गोल कर दिया!

भारत-विरोध पाकिस्तान में सेना के लिए अस्तित्व का सवाल है. इसलिए शांति में पाकिस्तानी सेना का फैक्टर बेहद अहम है

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जब तक भारत के रूप में पाकिस्तान के सामने एक 'दुश्मन' है, एक 'टारगेट' है और कश्मीर के रूप में जब तक उसके पास एक 'भारत-विरोधी एजेंडा' है, तभी तक वहां की सत्ता पर सेना अपना दबदबा बनाये रख सकती है. भारत-विरोध वहां सेना के लिए अस्तित्व का सवाल है.

इसीलिए कश्मीर को वह अपने 'गले की नस' कहते हैं, जो कट जाये, तो शरीर जीवित नहीं रह सकता. तो जब कश्मीर और भारत-विरोध उनके लिए 'जान का सवाल' है, तो यह आशा कैसे की जा सकती है कि वह इसे छोड़ देंगे?

तो भारत-पाकिस्तान के कूटनीतिक मैच में नरेन्द्र मोदी ने पहला गोल कर दिया! और सिर्फ़ एक रात में खेल के सारे नियम बदल दिये. वह मैच जो बरसों से अनवरत एक ही ऊबाऊ, थकाऊ, पकाऊ तरीक़े से जारी था, सहसा उत्तेजक हो गया. लोगों को अचानक लगने लगा कि अरे, इस मैच में भी जीत-हार का खेल हो सकता है! वरना तो लोग मान बैठे थे कि न मैच कभी ख़त्म होगा और न कोई फ़ैसला कभी निकलेगा.

क्योंकि अब तक इस मैच का बस एक ही नियम था. गेंद यहाँ मारो, वहाँ मारो, इधर उछालो, उधर फेंको, इधर धावे करो, उधर धावे करो, लेकिन नियम यह था कि गेंद गोल तो क्या, 'डी' तक में नहीं पहुँचनी चाहिए.

पाकिस्तान क्या 'शरीफ़' बन जायेगा?

लेकिन अब पहला गोल तो हो गया है. गोल न करनेवाला नियम रद्द हो चुका है. तो अब आगे क्या होगा? मैच बिलकुल नये मोड़ पर है. इसलिए अनुमान लगाना इतना आसान नहीं है. पाकिस्तान क्या करेगा, या क्या कर सकता है, कुछ कर भी सकता है या नहीं, या फिर वह चुपचाप बैठ जायेगा, अब तक की अपनी सारी कुटिलताएँ छोड़ कर 'शरीफ़' बन जायेगा? यही सवाल आज सबसे महत्त्वपूर्ण है.

एक बहुत बड़ा जोखिम भरा जुआ

इसमें कोई दो राय नहीं कि 'सर्जिकल स्ट्राइक' करना और फिर उसे इस तरह आधिकारिक रूप से प्रचारित करना एक बहुत बड़ा जोखिमभरा जुआ है, जो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने खेला है. छोटी-बड़ी 'सर्जिकल स्ट्राइक' तो पहले भी हुई है, 'बदले' पहले भी लिये गये हैं, लेकिन हर बार बिलकुल गुपचुप और परदे में ढक-तोप कर. ऐसे सारे मामले बस सेनाओं और सरकारों के बीच रह गये और दफ़न हो गये.

कूटनीति ऊपर-ऊपर बदस्तूर चलती रही, ले बयान और दे बयान! इस बार बदलाव यही है कि एक तो बड़ी ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की गयी, एक साथ कई जगहों पर की गयी, और फिर बाक़ायदा पाकिस्तान को और पूरी दुनिया को बताया गया कि जो हमने करना था, कर दिया, अब जो जिसे करना हो, कर ले!

वह खिल्ली उड़ाते ही रह गये!

उरी हमले के बाद जब 'सर्जिकल स्ट्राइक' के सुझाव दिये जा रहे थे, तो बहुत-से लोग इससे सहमत नहीं थे. मैं भी सहमत नहीं था. इसलिए कि ऐसी कार्रवाई से युद्ध भड़क सकने की आशंकाएँ थीं. लेकिन तीर तो अब चल गया, तो चल गया. इसलिए अब असहमतियाँ भी अतीत हो चुकी हैं.

नयी स्थितियाँ जो भी हों, उनके लिए देश एकजुट है. तो क्या युद्ध जैसी कोई नौबत आ सकती है? फ़िलहाल तो सतह पर ऐसा नहीं दिख रहा है, लेकिन पाकिस्तान जैसा खल राष्ट्र है, उसे देखते हुए कुछ कहा नहीं जा सकता कि वह कब क्या कर बैठेगा. वैसे अभी तक तो उसने स्वीकार ही नहीं किया है कि कोई 'सर्जिकल स्ट्राइक' नियंत्रण रेखा के उस पार हुई है.

स्वीकार करे भी तो कैसे? उसे दूर-दूर तक गुमान भी नहीं था कि नरेन्द्र मोदी ऐसा कोई क़दम उठा सकते हैं. इसलिए उसकी सेनाएँ चैन से चादर ताने सो रही थीं. ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ कब हो गयी, उसे भनक भी नहीं लगी. तो अब पाकिस्तान की दिक़्कत यही है कि मामला न उससे उगलते बन रहा है, न निगलते. स्वीकार कर लेता, तो उसे तुरन्त जवाबी कार्रवाई करनी पड़ती, जो वह अभी करने की हालत में शायद नहीं है. यह अलग बात है कि म्याँमार में हुई ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ के बाद वहाँ से खिल्ली उड़ाते हुए कहा गया था कि हिम्मत है तो पाकिस्तान में ऐसा करके दिखायें!

'सर्जिकल स्ट्राइक' हुई या नहीं?

लेकिन चूँकि पाकिस्तान ने स्वीकार ही नहीं किया है कि ऐसी कोई घटना हुई है, तो जवाब न देने का उसे बहाना मिल जाता है. इसीलिए वह यह कह रहा है कि भारत ने अचानक सीमा पर गोलीबारी की है. हालाँकि यह अलग बात है कि शुक्रवार को प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने तब 'सर्जिकल स्ट्राइक' की बात क़रीब-क़रीब क़बूल कर ली, जब अपनी विशेष कैबिनेट बैठक के बाद उन्होंने भारत को चेतावनी दी कि पाकिस्तान भी 'सर्जिकल स्ट्राइक' करने की क्षमता रखता है.

ठीक है. पाकिस्तान ऐसी क्षमता रखता होगा, लेकिन वह 'सर्जिकल स्ट्राइक' करेगा कहाँ? भारत ने 'सर्जिकल स्ट्राइक' वहाँ की सेना पर तो की नहीं, बल्कि उन 'लाँच पैडों' पर की, जहाँ से आतंकवादियों को घुसपैठ कराने की तैयारी हो रही थी. न भारत आतंकवादियों की खेप तैयार करता है, न उनके शिविर चलाता है, तो नवाज़ जी आप कहाँ पर 'सर्जिकल स्ट्राइक' करने की बात कर रहे हैं?

क्या पाकिस्तान चुप बैठ जायेगा?

पाकिस्तान की मुश्किल यही है कि भारत पर जवाबी कार्रवाई के लिए उसके पास फ़िलहाल कोई ‘ट्रिगर’ नहीं है. उसके बिना वह अगर कोई जवाबी कार्रवाई करता है, तो दुनिया की नज़रों में वह युद्ध को उकसाने या शुरू करनेवाली कार्रवाई मानी जायेगी. इसलिए कम से कम यह तय है कि इस बार वह इस ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ के बदले में तुरन्त तो कुछ भी कर पाने की स्थिति में नहीं है. लेकिन पाकिस्तान चुप बैठ जायेगा, ऐसा सोचना शायद कुछ ज़्यादा ही आशावादिता होगी.

भारत-पाक दोनों के लिए नयी स्थिति

तो पाकिस्तान क्या करेगा? इसी सवाल से बात शुरू हुई थी. यह सही है कि 'सर्जिकल स्ट्राइक' कर भारत ने पाकिस्तान को अब साफ़ सन्देश दिया है कि आतंकवादियों के ज़रिये वह जो छाया युद्ध चला रहा है, वह अब भारत को क़तई बर्दाश्त नहीं है और अब अगर भारत पर कोई आतंकवादी हमला हुआ, तो अब ऐसे हर हमले का करारा जवाब दिया जायेगा, इसे पाकिस्तान पूरी गम्भीरता से समझ ले. पाकिस्तान के लिए यह नयी स्थिति है और भारत के लिए भी.

पाकिस्तानी रणनीति का पुराना खाँचा

अब तक पाकिस्तान की रणनीति का एक बना-बनाया खाँचा था. भारत में आतंकवादी भेजो और छोटे-बड़े हमले कराते रहो. इन आतंकवादियों को कश्मीर की तथाकथित आज़ादी के लड़ाके बताते रहो और इस प्रकार कश्मीर के मामले का अन्तरराष्ट्रीयकरण करने की कोशिश किसी न किसी तरह करते रहो.

पाकिस्तान जानता था कि भारत सिर्फ़ बोलता रहेगा, कुछ करेगा नहीं, दुनिया के दूसरे देश भी आतंकवादी वारदातों की निन्दा कर चुप बैठ जायेंगे और कश्मीर का मामला इस तरह उलझाये रखा जा सकेगा, जब तक कि उसका ऐसा समाधान सम्भव न हो, जैसा पाकिस्तान चाहता है.

अब क्या होगी पाक की नयी 'टेम्पलेट?'

लेकिन अब इस 'सर्जिकल स्ट्राइक' के बाद पाकिस्तान को मालूम हो गया है कि उसका यह पुराना खांचा अब नहीं चलेगा, क्योंकि अगले किसी आतंकवादी हमले के बाद भारत जाने कहाँ तक और कैसी कार्रवाई करने का जोखिम ले सकता है! और पाकिस्तान यह भी जानता है कि भारत के साथ सीधे युद्ध करना उसके लिए हमेशा महँगा सौदा साबित हुआ है, इसीलिए उसने 'छाया युद्ध' का सहारा लिया. तो अब वह इस 'छाया युद्ध' का कोई नया खाँचा, कोई नयी 'टेम्पलेट' तो ढूँढेगा ही. वह खाँचा क्या होगा, अभी तो अन्दाज़ा लगाना कठिन है.

अलग-थलग पड़ा पाकिस्तान

हालाँकि अन्तरराष्ट्रीय मंच पर और मुसलिम देशों के बीच भी पाकिस्तान को अलग-थलग कर पाने में भारत को काफ़ी सफलता मिली है. पाकिस्तान को सार्क सम्मेलन स्थगित करने पर मजबूर होना पड़ा, क्योंकि भारत समेत पाँच देशों ने इसमें हिस्सा लेने से मना कर दिया. बाक़ी चार देश हैं, बांग्लादेश, अफ़ग़ानिस्तान, भूटान और श्रीलंका.

यह भारत की बड़ी सफलता है. ख़बरें हैं कि पाकिस्तान के साथ होनेवाले कारोबार को भी भारत बन्द करने की सोच रहा है. हालाँकि भारत-पाकिस्तान कारोबार में अस्सी फ़ीसदी हिस्सा भारत का ही है, और सिर्फ़ बीस फ़ीसदी कारोबार पाकिस्तान के पास है.

लेकिन इस पाकिस्तानी कारोबार का बड़ा हिस्सा कई पाकिस्तानी जनरलों की कम्पनियों के पास है. इसलिए यह कारोबार बन्द करने से पाकिस्तानी सेना की गटई कुछ तो दबेगी. कुल मिला कर नरेन्द्र मोदी अलग-अलग मोर्चों पर पाकिस्तान को घेरने और उसके विकल्प सीमित करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं. लेकिन क्या पाकिस्तान पर इसका तुरन्त कोई असर दिखायी देगा? शायद नहीं. क्यों?

पाक सेना के अस्तित्व का सवाल

इसका एक बड़ा कारण है और वह यह कि जब तक भारत के रूप में पाकिस्तान के सामने एक 'दुश्मन' है, एक 'टारगेट' है और कश्मीर के रूप में जब तक उसके पास एक 'भारत-विरोधी एजेंडा' है, तभी तक वहाँ की सत्ता पर सेना अपना दबदबा बनाये रख सकती है. भारत-विरोध वहाँ सेना के लिए अस्तित्व का सवाल है, इसीलिए कश्मीर को वह अपने 'गले की नस' कहते हैं, जो कट जाये तो शरीर जीवित नहीं रह सकता.

तो जब कश्मीर और भारत-विरोध उनके लिए 'जान का सवाल' है तो यह आशा कैसे की जा सकती है कि वह इसे छोड़ देंगे? यह तो हुई एक बात. दूसरी बात है जनता का दबाव, जो जैसा यहाँ है और रहता है, वैसा ही वहाँ भी है.

भारत में अभी दो दिन पहले तक नरेन्द्र मोदी को उनके ही कट्टर भक्त पानी पी-पी कर कोस रहे थे, तो ज़ाहिर है कि पाकिस्तानी सेना पर भी जनता का वैसा ही दबाव होगा कि वह इस 'अपमान' का बदला ले. यह कड़वी सच्चाई है कि भारत और पाकिस्तान दोनों ही देशों में इस कूटनीतिक मसले के तार हमेशा से जनभावनाओं से बनाये और बुने जाते रहे हैं!

सनक पर अंकुश मुमकिन है क्या?

इसलिए इस पर कड़ी निगाह रखनी होगी कि 29/9 के बाद पाकिस्तान अब क्या करता है? उसकी नयी रणनीति क्या होती है? क्या वह ऐसा कुछ करने का जोखिम उठायेगा कि युद्ध जैसी स्थितियाँ बन जायें?

हालाँकि इससे वह बड़े घाटे में रहेगा, लेकिन पाकिस्तान, वहाँ की सेना, आइएसआइ और वहाँ के जिहादी तत्वों की सनक पर विवेक का अँकुश लगा रहेगा, यह भरोसे से कौन कह सकता है?

-यह आलेख कमर वहीद नकवी के ब्लॉग ‘राग देश ‘से लिया गया है. इसमें उनके निजी विचार हैं.

(स्वतंत्र स्तम्भकार कमर वहीद नकवी पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चैनलों के न्यूज डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे. अपने ब्लॉग ‘राग देश’ में देश-दुनिया के ज्वलंत मुद्दों परअपनी राय देते रहे हैं.)

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