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हाल ही में मैंने फ्योदोर दोस्तोयेव्स्की की किताब "द हाउस ऑफ द डेड" पढ़ी. यह एक काल्पनिक कहानी है, लेकिन यह 19वीं सदी के मध्य में जारिस्ट रूस (रूसी साम्राज्य जिसमें जार का शासन था) में कैद के दौरान उनके वास्तविक अनुभवों पर आधारित है.
किताब पढ़ते हुए मेरे मन में सबसे अजीब ख्याल यह आया कि जेल के अनुभवों के मामले में कितना कम बदलाव आया है, जबकि दुनिया कई मायनों में बदल गई है. किताब में लिखित घटनाओं को 150 साल से ज्यादा समय बीत चुके हैं, और यह दुनिया के एक अलग हिस्से से जुड़ी है, लेकिन कई जगहों पर मुझे ऐसा लगा जैसे वह वही चीजें और घटनाएं बता रहे हैं, जिन्हें मैं यहां तिहाड़ में अपने आसपास देखता हूं.
