हर साल घाटी में वापसी के लिए 19 जनवरी को विरोध सभाएं करती, रैलियां निकालती कश्मीरी पंडितों की भीड़ एक मजाक से ज्यादा कुछ नहीं रह गई है. इससे भी ज्यादा हास्यास्पद है मीडिया का इस घटना को कवर करना, राज्य और सरकारों से प्रतिक्रियाएं लेना.
समस्या यह है कि 26 साल बाद भी ये कश्मीरी पंडित यह कड़वी हकीकत नहीं समझ पाए कि इनकी संख्या इतनी ज्यादा नहीं है कि इनकी समस्या का चुनावों पर कोई असर हो सके.
और लोकतंत्र में तो संख्या का ही सिक्का चलता है. उनकी त्रासदी पर किसी को भी शक नहीं है, पर अमेरिका के यहूदियों और भारतीय पारसियों की तरह इनके पास इतना पैसा भी नहीं है कि सरकार इनकी नीतिगत मांगों पर ध्यान दे.

