वर्ष 1958 में थियोडर कैप्लोव और रीज जे. मैग्गी की एक किताब आई थी ‘द अकेडमिक मार्केटप्लेस’. किताब बहुत पुरानी है, लेकिन इसने जिन मुद्दों को अपने कुछ अध्यायों में उठाया वह कल भी और आज भी प्रासंगिक है. वैसे तो भारत का अकादमिक संसार अनगिनत समस्याओं से जूझ रहा है, लेकिन उसमें से एक अहम् है विश्विद्यालयों में शिक्षकों के चयन में होने वाली भयंकर धांधली. यह व्यापक स्तर पर हो रहा है. जो भारत के तमाम केन्द्रीय संस्थानों से लेकर राज्य स्तर के संस्थाओं तक जारी है.
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विश्वविद्यालयों में शिक्षक चयन की प्रक्रिया और ‘नेपोटिज्म’
भारत के विश्वविद्यालोयों में आमतौर पर दो तरह की चयन प्रक्रियाएं होती हैं, 'ओपन' या 'क्लोज्ड'.

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