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संडे व्यू: बंगाल में नहीं होगा बिहार नतीजे का असर,कर्नाटक में सियासी संग्राम तेज

Sunday Views: पढ़ें इस रविवार आसिम अमला, अदिति फडनीस, मनीष सभरवाल और अरविंद पनगढ़िया के विचारों का सार.

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नहीं होगा बंगाल में बिहार नतीजे का असर

टेलीग्राफ में आसिम अमला ने लिखा है कि बिहार में एनडीए की भारी जीत के बाद नरेंद्र मोदी ने दावा किया कि गंगा की तरह यह जीत बंगाल तक पहुंचेगी. बिहार का नतीजा बंगाल पर सीधा असर नहीं डालेगा, पर दोनों पक्षों को महत्वपूर्ण सबक देता है. बिहार-2025 एक “प्रतिमान-मजबूत करने वाला” चुनाव था, ठीक 2010 जैसा. नीतीश कुमार ने सिद्ध कर दिखाया कि औसत शासन-रिकॉर्ड और भ्रष्ट पार्टी-तंत्र के बावजूद अल्पकालिक कल्याण योजनाओं और प्रशासनिक मशीनरी (जीविका दीदियां, नकद हस्तांतरण आदि) के दुरुपयोग से लंबे समय तक सत्ता बरकरार रखी जा सकती है. विपरीत रूप से, बंगाल में भाजपा के लिए यही चुनाव “क्या न करें” का सबक है.

आसिम अमला लिखते हैं कि ममता बनर्जी जैसी स्थापित लोकलुभावन नेता को केवल ज्यादा वेल्फेयर वादों या गठबंधन से नहीं हराया जा सकता. जरूरी है जन-संप्रभुता के मैदान में “राजनीतिक भूकंप” लाना—जैसे 1977 व 2011 में हुआ था. लेखक कार्ल श्मिट के नजरिए से कहता है कि सत्ता तभी गिरती है जब विपक्ष सत्ताधारी के “लोक का प्रतिनिधि होने” के मिथकीय दावे को तोड़ दे और तंत्र के भीतर हो रहे बहिष्कार को जन-आंदोलनों से उजागर कर दे.

ममता ने 2011 में यही किया था. आज भाजपा बंगाल में ठीक यही कर रही है—मतुआ, राजवंशी, ओबीसी जातियों के असंतोष को हिंदू-बहिष्कार की एक बड़ी मिथकीय कथा में पिरोकर “बंगाली-हिंदू संप्रभुता” का नया प्रतिमान खड़ा कर रही है. वहीं तृणमूल का “फ्रैंचाइजी मॉडल” कमजोर पड़ रहा है. यह मॉडल ममता के व्यक्तित्व पर निर्भर हो चुकी तृणमूल कांग्रेस से जुड़ा है जिसमें कार्यकर्ता पूरी तरह ममता बनर्जी पर निर्भर हैं. लेखक का निष्कर्ष है कि भाजपा संरचनात्मक रूप से ममता-केन्द्रित व्यवस्था को विस्थापित करने की सबसे मजबूत स्थिति में है.

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राज्यों को धक्का

द हिन्दू ने अपने संपादकीय में लिखा है कि सुप्रीम कोर्ट ने 16वीं राष्ट्रपति रेफरेंस पर दिए फैसले में राज्यपालों व राष्ट्रपति पर कोई निश्चित समय-सीमा थोपने, “डीम्ड असेंट” देने या अनुच्छेद 142 के जरिए स्वतः मंजूरी देने से इनकार कर दिया. साथ ही उसने यह भी कहा कि लंबी टालमटोल भी स्वीकार्य नहीं. सतही रूप से यह संतुलन दिखता है, लेकिन वास्तव में यह संघीय ढांचे को भारी क्षति पहुंचाता है. फैसला अप्रैल 2025 के तमिलनाडु मामले के प्रगतिशील निर्णय को पलट देता है, जिसमें तीन माह की समय-सीमा और डीम्ड असेंट दी गई थी. अब कोर्ट ने शक्ति-पृथक्करण का हवाला देकर समय-सीमा, डीम्ड असेंट और अनुच्छेद 142 के प्रयोग को खारिज कर दिया.

संपादकीय में आगे लिखा गया है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले का नतीजा यह होगा कि राज्यपालों को विधेयकों को अनिश्चित काल तक रोकने या राष्ट्रपति के पास भेजने की लगभग असीमित शक्ति मिल जाएगी. और, वह भी बिना किसी जवाबदेही के. अनुच्छेद 200 में लिखे “जितनी जल्दी संभव हो” को कोर्ट ने “अत्यधिक लचीला” बताकर अप्रवर्तनीय बना दिया. राज्यपालों को मंत्रिपरिषद की सलाह से मुक्त मान लिया जाना भी ख़तरनाक है. संविधान सभा ने जानबूझकर “अपने विवेक से” वाक्यांश हटाया था.

सरकारिया आयोग की छह माह की सिफारिश भी नजरअंदाज कर दी गई. सबसे खतरनाक प्रावधान: यह है कि विधेयक पहली या दूसरी बार पारित होने के बाद भी राज्यपाल उसे राष्ट्रपति को भेज सकता है, और वहाँ वह अनिश्चित काल तक लटक सकता है. विधानसभा का दोबारा पारित करना अब बाध्यकारी नहीं रहा. “उचित समय” की कोई परिभाषा नहीं, जिससे हर देरी के लिए राज्यों को अलग-अलग मुकदमेबाजी करनी पड़ेगी. समय-सीमा, स्वतः मंजूरी, न्यायिक समीक्षा—सभी सुरक्षा-कवच हटा लिए गए. विपक्ष-शासित राज्यों में पहले से हो रहे मनमाने विलंब को यह फैसला वैधता देता है. नतीजतन, संविधान की अक्षरशः व्याख्या करके उसकी संघीय भावना को गहरी चोट पहुंचाई गई है.

कर्नाटक में सियासी संग्राम तेज

अदिति फडनीस ने बिजनेस स्टैंडर्ड में लिखा है कि इस सप्ताह कर्नाटक कांग्रेस में ढाई साल पुराना “सत्ता-साझेदारी” का समझौता पूरी तरह ध्वस्त हो गया. मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने 17वाँ बजट पेश करने की घोषणा कर स्पष्ट कर दिया कि वे पूरा कार्यकाल (2028 तक) मुख्यमंत्री बने रहेंगे. दूसरी ओर उप-मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने रहस्यमयी अंदाज में कहा कि उनका प्रदेश अध्यक्ष पद “स्थायी नहीं” है और मार्च में 6 साल पूरे हो जाएँगे – यह सत्ता-परिवर्तन की मांग का अप्रत्यक्ष संकेत था. 2023 चुनाव के बाद तय हुआ था कि सिद्धरमैया ढाई साल और उसके बाद शिवकुमार मुख्यमंत्री बनेंगे.

अदिति स्मरण कराती हैं कि केसी वेणुगोपाल ने भी 2024 लोकसभा चुनाव तक शिवकुमार को अध्यक्ष पद पर रखने की बात कही थी, जिसे सत्ता-हस्तांतरण का संकेत माना गया. लेकिन सिद्धरमैया ने न तो दिल्ली आलाकमान को मौका दिया और न ही शिवकुमार के पास पर्याप्त विधायक हैं जो बगावत कर सकें. कर्नाटक में पहले भी बारी-बारी की व्यवस्था (2006 में कुमारस्वामी-येदियुरप्पा) असफल हो चुकी है. राजस्थान में सचिन पायलट का हश्र भी सामने है – बगावत की, पर कभी मुख्यमंत्री नहीं बने.

63 वर्षीय वोक्कालिंगा नेता शिवकुमार के लिए दांव जीवन-मरण का है. अगर 2028 में कांग्रेस हारी तो अगला मौका 2033 में आएगा, जब वे 71 साल के होंगे. वोक्कालिंगा मठ भी अब पछता रहे हैं. बिहार में कांग्रेस की हार के बाद शिवकुमार अपने वफादार विधायकों को दिल्ली में सक्रिय कर चुके हैं और संसाधन-जुटाने की अपनी ताकत का बार-बार जिक्र कर रहे हैं. सिद्धरमैया की बजट-घोषणा ने “नवंबर क्रांति” को फुसफुसाहट में बदल दिया, लेकिन सप्ताहांत तक कर्नाटक कांग्रेस में नया राजनीतिक तूफान शुरू हो सकता है.

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चार लेबर कोड से बदलेगी स्थिति

मनीष सभरवाल ने इंडियन एक्सप्रेस में फणीश्वर नाथ रेणु की 1954 के क्लासिक हिंदी उपन्यास मैला आंचल के हवाले से कहा है कि बिहार की आदर्शवादी राजनीति—समता, न्याय और जन-शक्ति—को लेन-देन की राजनीति व कुलीन हेरफेर से हारते दिखाया था. हालिया बिहार चुनाव बदलाव का संकेत देते हैं. “हर परिवार को सरकारी नौकरी” का वादा जनता ने अव्यावहारिक बताकर खारिज कर दिया . इस पर राज्य बजट का पाँच गुना खर्च होता. लेकिन यह हमें याद दिलाता है कि पिछड़े राज्यों में रोजगार सृजन के लिए नए विचार जरूरी हैं. हाल की श्रम संहिताओं की अधिसूचना मुख्यमंत्रियों को औपचारिक, उच्च-वेतन व उच्च-उत्पादकता वाले निजी नियोक्ताओं के लिए अनुकूल माहौल बनाने की शक्ति देती है. असली समस्या “रोजगारयुक्त गरीबी” (कम वेतन वाली नौकरियां) और अव्यावहारिक स्वरोजगार (स्व-शोषण) है. बिहार में उच्च उत्पादकता वाले नियोक्ताओं की कमी और सेक्टर्स का अभाव है.

मनीष सभरवाल लिखते हैं कि 1991 से नौकरियों का प्रवाह 1961 के स्टॉक को नहीं बदल पाया. इसके विपरीत कर्नाटक का सॉफ्टवेयर जीडीपी हिस्सा 5% से 63% हो गया. तमिलनाडु का विनिर्माण 7% से 34% है. भारत अमेरिका की आधी दवाएँ बनाता है और सऊदी से ज्यादा सॉफ्टवेयर निर्यात करता है. इन परिवर्तनों में सरकारी खर्च कम, नीतियां ज्यादा भूमिका निभाती हैं—29 कानूनों को चार संहिताओं में समेटकर सरलीकरण, अपराध-मुक्तिकरण व डिजिटलीकरण अहम कदम हैं. नई संहिताएं 1,228 धाराओं को 480, 1,436 नियमों को 351, 84 रजिस्टरों को 8, 31 रिटर्न को 1 और 4 लाइसेंस को 1 कर देती हैं. 65 धाराओं को अपराध-मुक्त करती हैं, गिग व असंगठित मजदूरों को सामाजिक सुरक्षा देती हैं, महिलाओं के प्रतिबंध हटाती हैं, प्रवासियों के लाभ पोर्टेबल बनाती हैं.

चार संहिताएं अपूर्ण हैं; एक ही काफी. लेकिन ये अच्छी नौकरियां पैदा करने के लिए भारत को बेहतर बनाती हैं. ये नियामकीय कोलेस्ट्रॉल को विश्वास-आधारित व्यवस्था से बदलती हैं—जेल को निरोधक मानना छोड़, स्व-पंजीकरण लाना, निरीक्षकों के दुरुपयोग से भ्रष्टाचार रोकना, सब अनुमत मानना. पुरानी व्यवस्था छोटे नियोक्ताओं को चोट पहुँचाती, 50% श्रमशक्ति को स्व-शोषण में धकेलती, कानून पर हास्य पैदा करती. ट्रेड यूनियनों का स्वार्थ बुजुर्ग सदस्यों पर था, लेकिन 65% आबादी 35 से कम उम्र की है. राज्यों को नियम-निर्माण में स्वायत्तता मिली.

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बिग बैंक चिनगारी है आग राज्यों को लगानी है

अरविंद पनगढ़िया (16वें वित्त आयोग के अध्यक्ष) ने टाइम्स ऑफ इंडिया में लिखा है कि नई चार श्रम संहिताएं “सभी सुधारों की जननी” हैं. 29 पुराने, स्वतंत्रता-पूर्व के उद्यम-विरोधी श्रम कानूनों को खत्म कर मोदी सरकार ने 25 साल पुरानी माँग पूरी की, जिसे नरसिम्हा राव के बाद हर सरकार सोचती रही लेकिन साहस नहीं जुटा पाई. संहिताओं ने 1,200 से अधिक धाराओं को आधा कर दिया, रजिस्टर-रिटर्न-लाइसेंस की संख्या नाटकीय रूप से घटाई, आपराधिक सजाओं को सिविल जुर्माने में बदला. यह लालफीताशाही से उद्यमियों की मुक्ति है.

लेकिन लेखक कहते हैं कि यह आधी कहानी है. मेगा फैक्टरियां (हजारों नौकरियाँ देने वाली) तभी आएंगी जब राज्य संहिताओं में मिली छूट का पूरा इस्तेमाल करेंगे. राज्य अब 300 (विशेष मामलों में 1,000) कर्मचारियों तक की फैक्टरियों को छंटनी की पूर्व अनुमति, ठेका मजदूरी व निश्चित अवधि रोजगार के कठोर नियमों से छूट दे सकते हैं. सबूत मौजूद हैं. गुजरात-आंध्र ने पहले ऐसा किया तो संगठित विनिर्माण में 5 लाख से ज्यादा नौकरियां बढ़ीं. तमिलनाडु को 13 लाख करोड़ के प्रस्ताव मिले. राजस्थान की मध्यम इकाइयाँ 25-30% तेज बढ़ीं. हरियाणा में बेरोजगारी 9.3% से 3.4% गिरी.
बिहार-उत्तर प्रदेश जैसे राज्य अब फॉक्सकॉन जैसी मेगा इकाइयां खींच सकते हैं यदि स्थानीय नियम स्केलेबिलिटी को मुकदमेबाजी से मुक्त करें. आलोचना “मजदूर शोषण” की होगी, पर डेटा औपचारिकीकरण और नौकरियों में वृद्धि दिखाता है. मोदी का बिग बैंग चिंगारी है; असली आग राज्यों को लगानी है. इस संघीय प्रतिस्पर्धा में जो राज्य सबसे उदार नियम बनाएँगे, वही पूँजी और नौकरियाँ लूटेंगे तथा भारत की विकास गाथा को नया लिखेंगे.
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