ममता बनर्जी की अर्थव्यवस्था फेल, राजनीति पलट देगी चुनाव?
सुरजीत एस. भल्ला द्वारा ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि आर्थिक आंकड़े ममता बनर्जी के खिलाफ हैं, जबकि उनकी राजनीति उन्हें मजबूत बना रही है. पश्चिम बंगाल की सांस्कृतिक समृद्धि के बावजूद आर्थिक स्थिति लगातार बिगड़ रही है. 1950 में राज्य की प्रति व्यक्ति आय भारत के औसत की 113.8% थी, जो 1976 में 90.3% और 2010 में 80.8% रह गई. ममता बनर्जी के 2011-2024 के शासन में यह गिरावट -1% प्रति वर्ष की दर से हुई और आज यह बड़े राज्यों के औसत का मात्र 70.3% है. यह भारत में किसी भी राज्य की सबसे खराब गिरावट है. फिर भी लेखक 'नारी शक्ति' को ममता की सबसे बड़ी ताकत मानते हैं.
सुरजीत एस भल्ला लिखते हैं कि 2021 विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने पुरुषों की तुलना में कम महिला उम्मीदवार उतारे, लेकिन 80% जीत हासिल की, जबकि भाजपा की 57 महिला उम्मीदवारों में केवल 5 जीतीं. तृणमूल लगातार सभी दलों से आगे महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी में है. महिला श्रम बल भागीदारी दर (FLFPR) 2011-12 के 21.7% से 2024-25 में 35.3% हो गई, लेकिन लेखक इसे गरीबी के दबाव का नतीजा भी बताते हैं.
चार बार से ज्यादा मुख्यमंत्री बने रहना दुर्लभ उपलब्धि है. केवल पश्चिम बंगाल और ओडिशा में ही ऐसा हुआ है. लेखक का मानना है कि अगर ममता जीतीं तो 2031 में भी जीतने की संभावना है. हालांकि, रिकॉर्ड 90%+ मतदान और आर्थिक गिरावट के चलते लेखक भाजपा को मामूली बढ़त देते हैं. अंत में भल्ला कहते हैं कि अगर भाजपा जीती तो उसे अर्थव्यवस्था सुधारने का मौका मिलेगा, वरना भारत की विकास यात्रा प्रभावित होगी. कुल मिलाकर, ममता की अर्थव्यवस्था फेल है, लेकिन उनकी राजनीति चुनाव पलट सकती है.
वोटिंग से लेकर नतीजे तक न्यूज़ चैनल का व्यवहार
अभिषेक अस्थाना ने हिन्दुस्तान टाइम्स में चुनाव परिणामों के दिन भारतीय समाचार चैनलों के व्यवहार और वहां के माहौल पर करारा कटाक्ष किया है. लेखक बताते हैं कि कैसे पत्रकार चुनाव वाले राज्यों में टैक्सी ड्राइवरों से बातचीत को "जनता की आवाज" या "ग्राउंड रिपोर्ट" मान लेते हैं. परिणामों के दिन, इन्हीं ड्राइवरों के बयानों को विशेषज्ञ राय की तरह पेश किया जाता है, जबकि वास्तविकता यह होती है कि पत्रकार भीषण गर्मी के कारण बाहर निकलकर व्यापक सर्वे करने से कतराते हैं.
लेखक ने एग्जिट पोल्स की तुलना 'राशिफल' से की है जिन्हें लोग तभी सच मानते हैं जब वे उनके पक्ष में हों. समाचार चैनल अक्सर अस्पष्ट सीट सीमाएं (जैसे 100 में से 30-60 सीटें) देकर सुरक्षित खेलने की कोशिश करते हैं. जो चैनल खर्च नहीं उठा सकते, वे 'पोल-ऑफ-ऑल-पोल्स' (विभिन्न सर्वेक्षणों का औसत) का सहारा लेते हैं.
अभिषेक लिखते हैं कि चुनाव नतीजे वाले दिन सुबह 8.01 बजे से ही चैनलों के बीच एक युद्ध छिड़ जाता है. रुझान आने से पहले ही एंकर विजेताओं की घोषणा करने लगते हैं. स्टूडियो में सायरन, 'ब्रेकिंग न्यूज' के शोर और भारी-भरकम शब्दों (जैसे 'थर्मोन्यूक्लियर डेटा इंटेलिजेंस') का इस्तेमाल केवल दर्शकों को बांधे रखने और टीआरपी बढ़ाने के लिए किया जाता है. चैनलों पर विभिन्न प्रकार के विश्लेषक और भविष्यवक्ता बैठे होते हैं. बड़ी-बड़ी डिजिटल स्क्रीन और ग्राफिक्स का दिखावा किया जाता है, जो अक्सर तकनीकी रूप से केवल एक साधारण स्प्रेडशीट ही होते हैं. आखिरकार चुनावी परिणामों के दिन शोर-शराबे और अतिशयोक्ति के बीच पत्रकारिता के मूल सिद्धांत कहीं खो जाते हैं. शाम तक हर चैनल खुद को नंबर-1 घोषित कर देता है और इस पूरे ड्रामे में असली विजेता लोकतंत्र और चैनलों की टीआरपी होती है.
आंध्र में गठबंधन की मजबूरी में फंसी बीजेपी
अदिति फडणीस ने बिजनेस स्टैंडर्ड में आंध्र प्रदेश की वर्तमान राजनीति में भारतीय जनता पार्टी, तेलुगु देशम पार्टी और जनसेना के बीच गठबंधन के जटिल समीकरणों और इसके दीर्घकालिक परिणामों का विश्लेषण किया है. लेखक का तर्क है कि आंध्र प्रदेश में भाजपा का टीडीपी और पवन कल्याण की जनसेना के साथ गठबंधन एक रणनीतिक मजबूरी है. भाजपा का प्राथमिक लक्ष्य केंद्र में अपनी सीटों की संख्या बढ़ाना है, जिसके लिए उसे राज्य के दो मजबूत क्षेत्रीय दलों में से एक का साथ चाहिए था.
हालांकि, यह गठबंधन भाजपा की अपनी स्वतंत्र जमीन तैयार करने की दीर्घकालिक योजना में बाधा बन सकता है. आंध्र प्रदेश के विभाजन के बाद से 'विशेष राज्य का दर्जा' और 'अमरावती' राजधानी का निर्माण बड़े मुद्दे रहे हैं. टीडीपी के साथ गठबंधन करने से भाजपा पर इन वादों को पूरा करने का भारी दबाव रहेगा. यदि केंद्र सरकार इन मांगों पर नरम पड़ती है, तो यह अन्य राज्यों के लिए एक नजीर बन सकता है, जिससे भाजपा की राष्ट्रीय राजकोषीय नीति प्रभावित हो सकती है.
अदिति लिखती हैं कि मुख्यमंत्री वाई.एस. जगन मोहन रेड्डी की 'कल्याणकारी राजनीति' बहुत मजबूत है. विपक्ष का तीन-पक्षीय गठबंधन वोट बंटवारे को रोकने के लिए बनाया गया है, लेकिन लेखक चेतावनी देते हैं कि गठबंधन के भीतर सीटों के बंटवारे और जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल की कमी जगन को फायदा पहुँचा सकती है. भाजपा के लिए संकट यह है कि वह राज्य में एक 'तीसरे विकल्प' के रूप में उभरना चाहती थी. लेकिन क्षेत्रीय दिग्गजों के पीछे खड़े होने से उसकी अपनी पहचान धुंधली होने का डर है.
लेख यह सवाल उठाता है कि क्या अल्पकालिक चुनावी लाभ के लिए भाजपा ने अपनी दीर्घकालिक विकास रणनीति और राज्य में स्वतंत्र विस्तार की संभावनाओं से समझौता कर लिया है. आदिति मानती हैं कि आंध्र प्रदेश का यह गठबंधन केवल सत्ता हासिल करने का एक गणित है, जो भविष्य में भाजपा के लिए शासन और संगठन दोनों स्तरों पर जटिल चुनौतियां पैदा कर सकता है.
वैश्विक व्यापारिक मुद्रा बनेगा रुपया?
टीसीए रंगनाथन ने डेक्कन हेराल्ड में भारतीय रुपये के अंतरराष्ट्रीयकरण और उसके मूल्य के प्रबंधन से जुड़ी चुनौतियों का सूक्ष्म विश्लेषण पेश किया है. भारत सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक रुपये को वैश्विक व्यापारिक मुद्रा बनाने की दिशा में सक्रिय हैं. रूस के साथ रुपये में व्यापार और अन्य देशों के साथ 'वोस्ट्रो' खातों की शुरुआत इस गौरवपूर्ण लक्ष्य का हिस्सा है. हालांकि, यह गौरव अपनी सीमाओं के साथ आता है, क्योंकि रुपये का मूल्य केवल राष्ट्रीय भावना से नहीं, बल्कि वैश्विक बाजार की शक्तियों से निर्धारित होता है.
लेख में रुपये के गिरते मूल्य और निर्यात के बीच संबंध पर चर्चा की गई है. एक 'मजबूत' रुपया राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक लग सकता है, लेकिन व्यावहारिक रूप से यह भारतीय निर्यात को महंगा और कम प्रतिस्पर्धी बना देता है. इसके विपरीत, रुपये का नियंत्रित अवमूल्यन निर्यातकों के लिए फायदेमंद हो सकता है, जो चीन और वियतनाम जैसे प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले भारत की स्थिति मजबूत करता है.
रंगनाथन लिखते हैं कि RBI के सामने सबसे बड़ी चुनौती अस्थिरता को रोकना है. यदि केंद्रीय बैंक रुपये को बहुत अधिक गिरने से बचाने के लिए विदेशी मुद्रा भंडार खर्च करता है, तो यह भंडार कम होने का जोखिम रहता है. लेख यह तर्क देता है कि रुपये को बाजार की वास्तविकताओं के अनुसार धीरे-धीरे गिरने देना व्यावहारिकता है, न कि कमजोरी. अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दरें, वैश्विक तेल की कीमतें और भू-राजनीतिक तनाव रुपये पर भारी दबाव डालते हैं. इन कारकों के बीच रुपये की स्थिरता बनाए रखना एक कठिन संतुलन है.
लेख का निष्कर्ष है कि रुपये के प्रबंधन को केवल राजनीतिक गौरव या प्रतिष्ठा के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए. दीर्घकालिक आर्थिक विकास के लिए एक 'स्थिर लेकिन प्रतिस्पर्धी' रुपया अधिक महत्वपूर्ण है, भले ही इसका अर्थ डॉलर के मुकाबले इसके मूल्य में गिरावट ही क्यों न हो. वास्तविक ताकत मुद्रा की विनिमय दर में नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था की लचीलापन और निर्यात क्षमता में निहित है.
समुद्र पर अधिकार के नियमों में स्पष्टता जरूरी
एम कल्याणरमण ने हिन्दू में लिखा है कि हाई सीज़ के रूप में जिस समुद्री क्षेत्र या जल को जाना जाता है वास्तव में वह किसी भी देश के अधिकार क्षेत्र से बाहर होता है. यहाँ किसी एक देश का संप्रभु अधिकार नहीं होता, बल्कि यह संपूर्ण मानवता की साझा संपत्ति मानी जाती है. तट से 12 समुद्री मील तक टेरिटोरियल वाटर्स यानी क्षेत्रीय जल माना गया है जहां तटीय देश की पूर्ण संप्रभुत्ता स्वीकार की गयी है. तट से 200 समुद्री मील तक विशेष आर्थिक क्षेत्र माना गया है जहां देश को मछली पकड़ने और संसाधनों के खनन का विशेष अधिकार होता है. हाई सीज़ के तौर पर 200 समुद्री मील के बाद का क्षेत्र माना गया है जहां अंतरराष्ट्रीय नियम लागू होते हैं.
कल्याणरमण लिखते हैं कि नौवहन की स्वतंत्रता हर देश के पास है. अंतरराष्ट्रीय जल में सभी देशों के जहाजों को बिना किसी बाधा के आवाजाही का अधिकार है. यहां कोई भी देश वैज्ञानिक शोध कर सकता है और समुद्र के नीचे संचार केबल या पाइपलाइन बिछा सकता है. यह भी जरूरी है कि समुद्री क्षेत्र का उपयोग केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए किया जाना चाहिए.
अंतरराष्ट्रीय जल में जहाज उस देश के कानूनों के अधीन होते हैं जिसका झंडा उन पर लगा होता है. हालाँकि, समुद्री डकैती, अवैध शिकार और तस्करी जैसे मामलों में अंतरराष्ट्रीय सहयोग और सार्वभौमिक अधिकार क्षेत्र के नियम लागू होते हैं. लेख निष्कर्ष निकालता है कि अंतरराष्ट्रीय जल के नियम वैश्विक व्यापार, सुरक्षा और संसाधनों के प्रबंधन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं. वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन और गहरे समुद्र में खनन जैसे नए विषयों के कारण इन नियमों में और अधिक स्पष्टता और सहयोग की आवश्यकता है.
शिखंडी को भीष्म नहीं कृष्ण के नजरिए से देखें
देवदत्त पटनायक ने न्यू इंडियन एक्सप्रेस सनातन धर्म के भीतर लिंग तरलता और पहचान के प्रति बदलते दृष्टिकोण का विश्लेषण किया है. लेखक महाभारत के एक प्रसंग से शुरुआत करते हैं जहाँ भीष्म ने शिखंडी को केवल उसके स्त्री शरीर के कारण स्त्री माना और युद्ध से इनकार कर दिया, जबकि कृष्ण ने शिखंडी की स्वयं की पहचान (पुरुष) का सम्मान किया. लेखक का तर्क है कि आज का 'सनातन धर्म' कृष्ण के 'प्रगतिशील' दृष्टिकोण के बजाय भीष्म की 'कठोर' और 'पारंपरिक' सोच की ओर झुक रहा है.
लेखक के अनुसार, प्राचीन भारतीय संस्कृति ने कभी भी दुनिया को कठोर हिस्सों में नहीं देखा. अर्धनारीश्वर, नरसिंह और गणेश जैसे रूप इसी 'अस्पष्टता' और 'संक्रमण' के प्रतीक थे. इला, बहुचरा माता और शिखंडी की कहानियाँ दर्शाती हैं कि भारतीय सभ्यता में लिंग भिन्नता को न केवल स्वीकार किया गया, बल्कि उसे अनुष्ठानों और मिथकों में स्थान भी दिया गया.
देवदत्त लिखते हैं कि पहचान को प्रमाणित करने या उसे 'मेडिकलाइज़' करने की प्रवृत्ति औपनिवेशिक काल की देन है. ब्रिटिश शासन ने 'क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट' जैसे कानूनों के माध्यम से हिजड़ा समुदायों और उनकी पहचान को अपराधी घोषित कर दिया. विडंबना यह है कि आज के आधुनिक कानूनी ढांचे और सामाजिक सोच में वही औपनिवेशिक मानसिकता झलकती है, जो पहचान के लिए प्रमाण पत्र और नौकरशाही सत्यापन की मांग करती है.
लेखक मानते हैं कि आज की चुनौती केवल कानूनी बहिष्कार नहीं, बल्कि भारतीय कल्पनाशीलता का सिकुड़ना है. एक सभ्यता जो कभी मिथकों और अनुष्ठानों के माध्यम से विविधता के लिए जगह बनाती थी, अब यूरोपीय विचारधाराओं और कठोर जीवविज्ञान के दबाव में अपनी मौलिक बहुलता खो रही है. लेखक चेतावनी देते हैं कि औपनिवेशिक विचारों को 'वैदिक' बताकर प्रचारित करना बंद करना चाहिए. सच्चा सनातन धर्म वह था जो पहचान को प्रमाणित करने के बजाय उसे भागीदारी और अनुष्ठानिक सम्मान प्रदान करता था.
