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संडे व्यू: थोपा गया युद्ध, भविष्य में भी आते रहेंगे एपस्टीन?

पढ़ें इस रविवार मानव सचदेवा, करन थापर, तवलीन सिंह, अदिति फडणीस और शैफाली संध्या के विचारों का सार

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थोपा गया युद्ध

मानव सचदेवा इंडियन एक्सप्रेस में लिखते हैं कि 28 फरवरी की सुबह तेहरान के केंद्रीय इलाकों में विस्फोटों ने शहर को हिला दिया. इज़राइल ने ईरान पर हमला किया, जिसमें आयतुल्लाह अली खामेनेई के कार्यालयों के निकट इलाके प्रभावित हुए. इज़राइल ने इसे एहतियातन हमला बताया और अमेरिका ने इसका समर्थन किया. ईरान ने आपातकाल घोषित कर दिया और जवाबी कार्रवाई की तैयारी की. यह लेख इस हमले को पिछले अमेरिकी-नेतृत्व वाले अभियानों (अफगानिस्तान 2001, इराक 2003, सीरिया) से जोड़ते हुए इसकी निन्दा करता है. लेखक का तर्क है कि नैतिक स्पष्टता के नाम पर बमबारी से क्षेत्र ठीक नहीं हुआ, बल्कि टूटा है. ईरान की घरेलू दमनकारी नीतियां निर्विवाद हैं—प्रदर्शनों को कुचला गया, असहमति दंडित हुई—लेकिन इससे बाहरी हमलावरों को नैतिक छूट नहीं मिलती.

लेख में परमाणु प्रसार के बहाने पर सवाल उठाया गया है: इज़राइल और अमेरिका के पास परमाणु हथियार हैं, ईरान के पास नहीं. फिर भी, उनके हथियारों को "स्थिरकारी" माना जाता है, जबकि ईरान के संभावित हथियारों को "अस्थिरकारी". यह दोहरा मापदंड है. शक्तिशाली राज्य हथियार रख सकते हैं, लेकिन दूसरों को रोकने के लिए बमबारी की जा सकती है.

सीमित हमले भी नागरिकों की मौत का कारण बनते हैं, अस्पतालों को नुकसान पहुंचाते हैं. ईरान के मिसाइल/ड्रोन से जवाबी हमले, हिजबुल्लाह जैसे सहयोगियों से बहु-मोर्चा युद्ध दरपेश है. भौगोलिक—हॉर्मुज जलडमरूमध्य से विश्व का 1/5 तेल गुजरता है; युद्ध से तेल कीमतें आसमान छू सकती हैं, वैश्विक मुद्रास्फीति, मंदी. रणनीतिक—ईरान के परमाणु/मिसाइल ठिकाने बिखरे, मजबूत; हमले से कार्यक्रम रुक सकता है, लेकिन समाप्त नहीं होता. उल्टे कट्टरपंथी मजबूत होते हैं, सुधारवादी कमजोर. इतिहास दिखाता है कि बमबारी से स्थिरता नहीं, अस्थिरता आती है. भारत के संदर्भ में: मोदी की इज़राइल यात्रा से रणनीतिक संबंध मजबूत, लेकिन भारत को पश्चिम एशिया से ऊर्जा और प्रवासी निर्भरता है. क्षेत्रीय युद्ध से तेल मूल्य, मुद्रास्फीति, रेमिटेंस प्रभावित. भारत को रणनीतिक स्वायत्तता और कूटनीति, संयम, अंतरराष्ट्रीय सत्यापन का समर्थन करना चाहिए, न कि एकतरफा बमबारी का.

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कानून के शासन का प्रमाण है एंड्रयू की गिरफ्तारी

करन थापर ने हिन्दुस्तान टाइम्स में लिखा है कि एंड्र्यू माउंटबेटन-विंडसर (पूर्व में प्रिंस एंड्र्यू) की 19 फरवरी 2026 को हुई गिरफ्तारी से लोग सकते में हैं. लेखक उस पीढ़ी से हैं जो उन्हें प्रिंस एंड्र्यू कहते थे, उन्हें स्वर्गीय रानी का प्रिय पुत्र, वर्तमान राजा चार्ल्स III का छोटा भाई और फॉकलैंड युद्ध का राष्ट्रीय नायक मानते थे. उनकी गिरफ्तारी—जेफ्री एपस्टीन से जुड़े गोपनीय सरकारी/व्यापार दस्तावेज साझा करने के संदेह में—एक ऐतिहासिक पतन है, जैसा शेक्सपियर के शब्दों में "ओह, क्या पतन हुआ था!". पुलिस कार में झुके, सदमे में उनकी तस्वीर अविश्वसनीय लगती है.

करन थापर भारत से तुलना करते हैं, जहां अमीर, प्रभावशाली और विशेषाधिकार प्राप्त लोग अक्सर कानून से बच जाते हैं. उदाहरण: लाइसेंस-रहित अमीर बच्चे दुर्घटनाओं में निर्दोषों को कुचलते हैं लेकिन पुलिस कार्रवाई धीमी; राजनेता सांप्रदायिक टिप्पणियां करते हैं बिना जवाबदेही के. भारत में "चाहे कितने ऊंचे हों, कानून ऊपर है" का सिद्धांत प्रचारित होता है, लेकिन शक्तिशाली इसे टालते हैं—पुलिस को रिश्वत, प्रभाव से केस दबाना या ड्राइवर पर दोष मढ़ना आम है.

इसके विपरीत, किंग चार्ल्स का बकिंघम पैलेस बयान सराहनीय है: कानून अपना कोर्स ले, जांच "पूर्ण, निष्पक्ष और उचित" हो, उचित तरीके से चले और उन्हें "पूर्ण समर्थन" मिले. ब्रिटिश मीडिया की स्तब्धकारी सुर्खियां दर्शाती हैं कि ब्रिटेन में भी राजपरिवार को pedestal पर रखा जाता है; आखिरी ऐसा मामला 1647 में चार्ल्स I का था. लेखक ब्रिटेन की इस निष्पक्षता की प्रशंसा करते हैं—यह अप्रत्याशित था, लेकिन गर्व का विषय. एंड्र्यू पर आरोप, दोषसिद्धि या सजा के सवाल अब वास्तविक हैं, जो ब्रिटेन के कानून के शासन को मजबूत बनाते हैं.

शान की रक्षा सुधारों की अनदेखी

तवलीन सिंह का इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित यह लेख सुप्रीम कोर्ट की हालिया कार्रवाई पर व्यंग्यपूर्ण टिप्पणी करता है, जहां NCERT की क्लास 8 की सामाजिक विज्ञान किताब से 'न्यायपालिका में भ्रष्टाचार' वाले हिस्से को हटवाया गया. कोर्ट ने इसे न्याय की 'मजेस्ट्री' पर हमला माना और NCERT को कड़ी फटकार दी. लेखक सहमत हैं कि बच्चों को न्याय व्यवस्था भ्रष्ट लगे, यह ठीक नहीं, लेकिन असली मुद्दे अनदेखे रहते हैं.

भारतीय न्यायपालिका में मुख्य समस्याएं बरकरार हैं. अदालत जाना आम आदमी के लिए बेहद महंगा है. वकीलों की फीस से लोग हार मान लेते हैं. दूसरा, केसों की अत्यधिक लंबित संख्या (5.4 करोड़, सुप्रीम कोर्ट में 92,000), निचली अदालतों में 90% बैकलॉग.

अदालतें गंदी, अव्यवस्थित हैं. ग्रामीण इलाकों में जानवर घूमते हैं. पुरानी इमारतें जर्जर. न्याय की गति इतनी धीमी है कि अपराधी सालों तक सजा से बचते हैं. जेलों में 70% से ज्यादा अंडरट्रायल कैदी हैं. सरकार खुद आधी से ज्यादा मुकदमों की पक्षकार है. लेखक ब्रिटिश कोर्ट की साफ-सफाई से तुलना करते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने किताब बैन कर दी, लेकिन कंप्यूटर युग में अनावश्यक कागजी कार्रवाई क्यों नहीं खत्म की? CJI किताब पर इतना गुस्सा क्यों, लेकिन इन समस्याओं पर नहीं? सुधार दशकों से लंबित हैं. बच्चे बड़े होकर सच्चाई जानेंगे—फिल्मों में ही न्याय व्यवस्था परफेक्ट दिखती है.

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सुक्खू को फायदा दे गया विवाद

अदिति फडणीस ने बिजनेस स्टैंडर्ड में दिल्ली पुलिस और हिमाचल प्रदेश पुलिस के बीच हुए असाधारण टकराव को बेहद हैरान करने वाला बताया गया है. एक राज्य की पुलिस दूसरे राज्य के पुलिसकर्मियों को गिरफ्तार करे तो यह चौंकाने वाला है. यह सब भारतीय युवा कांग्रेस (IYC) के कुछ सदस्यों द्वारा दिल्ली में आयोजित AI इम्पैक्ट समिट में 'शर्टलेस' विरोध प्रदर्शन से शुरू हुआ. दिल्ली पुलिस ने इन युवाओं को गिरफ्तार करने के लिए शिमला जिले के चिरगांव इलाके में छापा मारा और तीन को हिरासत में लिया. हिमाचल प्रदेश पुलिस ने दावा किया कि दिल्ली पुलिस ने उचित कानूनी प्रक्रिया (ट्रांजिट रिमांड और स्थानीय पुलिस को सूचना) का पालन नहीं किया, इसलिए उन्हें अपहरण का मामला दर्ज कर दिल्ली टीम को कुछ घंटों के लिए रोका और वाहन जब्त किए.

अदिति लिखती हैं कि हिमाचल और दिल्ली दोनों राज्यों ने एक-दूसरे के खिलाफ FIR दर्ज कीं. हिमाचल ने दिल्ली पुलिस पर अपहरण का आरोप लगाया, जबकि मामला अदालत में विचाराधीन रहा. 24 घंटे के ड्रामाई स्टैंडऑफ के बाद कोर्ट के हस्तक्षेप से दिल्ली टीम आरोपी लेकर दिल्ली लौटी. राजनीतिक संदर्भ में, गृह मंत्रालय (अमित शाह) के अधीन दिल्ली पुलिस है, जबकि हिमाचल में कांग्रेस की सरकार है.

मुख्यमंत्री सुक्खू के लिए यह विवाद फायदेमंद साबित हुआ, क्योंकि 2022 चुनाव में कांग्रेस की जीत बेहद संकरी थी (वोट शेयर में सिर्फ 37,974 वोटों का अंतर, औसत 1.41%). पार्टी में आंतरिक कलह (वीरभद्र सिंह गुट, विक्रमादित्य सिंह का इस्तीफा) और प्राकृतिक आपदाओं (2025 में 3,500 करोड़ का नुकसान) के बावजूद, यह घटना 'हिमाचली बनाम गैर-हिमाचली' विवाद के रूप में उभरी, जो सुक्खू के लिए राजनीतिक सहारा बनी. लेखिका का मानना है कि पूरी घटना राजनीति से प्रेरित है, जहां कानून व्यवस्था राज्य विषय होने के बावजूद केंद्र-राज्य टकराव बढ़ा.

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भविष्य में भी आते रहेंगे एपस्टीन?

शैफाली संध्या ने डेक्कन हेराल्ड में जेफ्री एपस्टीन मामले को केंद्र में रखकर विश्लेषण रखा है कि कैसे बुद्धिमान और शक्तिशाली लोग स्पष्ट खतरे को नजरअंदाज कर खतरनाक व्यक्तियों की रक्षा करते हैं. एपस्टीन की दुनिया में गोपनीयता से ज्यादा महत्वपूर्ण था एलीट सर्कल्स में नैतिक निर्णय का सामान्यीकरण. शक्तिशाली लोग उनके नेटवर्क में खुले तौर पर घूमते थे—प्राइवेट जेट्स, महंगे गिफ्ट्स, करियर बदलने वाली परिचयों के जरिए. यह दोस्ती नहीं, बल्कि दायित्वों का इंफ्रास्ट्रक्चर था, जहां वफादारी अपराध में सहभागिता बन जाती थी.

शैफाली लिखती हैं कि क्लिनिकल साइकोलॉजी के नजरिए से एलीट पर्यावरण नैतिक धारणा को फिर से आकार देते हैं. डैचर केल्टनर के रिसर्च के हवाले से लेखिका बताती हैं कि संभ्रांत समाज में सहानुभूति घटती है जबकि निचले स्तर के पीड़ितों का दर्द अमूर्त हो जाता है.

एपस्टीन के दोस्तों ने आरोपों के बाद भी उन्हें पार्टीज, पब्लिसिटी मैनेजमेंट में मदद की. सर्वाइवर्स की गवाहियां भयावह हैं—एक ने शार्क-भरे पानी में कूदकर आत्महत्या की कोशिश की, वर्जीनिया गिफ्रे ने खुद को "फल की प्लेट की तरह पास किया जाना" बताया. घिस्लेन मैक्सवेल जैसी महिला मध्यस्थ ऐतिहासिक रूप से शोषण को सामान्य बनाती रही हैं. धन और सफलता अलगाव पैदा करती है, नैतिक ब्लाइंड स्पॉट्स बनाती है. एपस्टीन की रक्षा करने वाले सिस्टम सामान्य हैं. प्रिविलेज्ड नेटवर्क में नैतिक विजन रीसेट होता है. सवाल अब यह नहीं कि किसने एपस्टीन की रक्षा की, बल्कि क्या हम इन डायनामिक्स को पहचानेंगे और अगले ऐसे व्यक्ति को रोक पाएंगे.

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