रेलवे को नयी कारोबारी योजना की दरकार
टीएन नाइनन ने बिजनेस स्टैंडर्ड में लिखा है कि किफायती होने के बावजूद रेल परिवहन नुकसान का सौदा बना हुआ है. सड़क परिवहन के मुकाबले बेहद सस्ता होने के बावजूद ऐसा हो रहा है. सामान्य, एसी और दूसरी तरह की सभी यात्राओं के लिए औसतन प्रति किमी दो रुपये रेलवे कमाता है. नीति आयोग के आकलन के मुताबिक सड़क यात्रा की यह आधी है.
रेलवे अधिक किराया क्यों नहीं वसूलता? बजट में भारी भरकम वित्तीय मदद की जाती है. एक्सप्रेस को सुपरफास्ट में बदलना, सस्ती श्रेणी के डिब्बे कम करना जैसे उपाय किए जाते हैं. फिर भी बहीखाता दुरुस्त नहीं हो पाता है.
नाइनन लिखते हैं कि मालवहन एक दशक में 40 प्रतिशत बढ़ा लेकिन यात्रियों की स्थिति में बदलाव नहीं हुआ. लगातार माल ढुलाई का भाड़ा बढ़ाने की नीति के कारण रेलवे ने सड़क मार्ग से होने वाली माल ढुलाई के हाथों कारोबार गंवाया है. अब केवल एक चौथाई माल ढुलाई ट्रेनों के जरिए होती है. इसमें भी कोयला और लौह अयस्क जैसी सामग्री है.
रेलवे मुश्किल में है. उसका मुनाफे वाला कारोबार प्रतिस्पर्धियों के हाथों में जा रहा है. बढ़ते यात्रियों की मांगें पूरी नहीं हो रही है क्योंकि नुकसान बढ़ने का डर है. रेलवे अपने सालाना व्यय के आसपास ही व्यय भी करता है. अधिकांश निवेश उधारी से किया जा रहा है. रेलवे को तत्काल नयी कारोबारी योजना और नई मूल्य निर्धारण योजना की आवश्यकता है.

