अमेरिकी दरवाजे बंद होने से अर्थव्यवस्थाएं ढूंढ़ रही नए रास्ते
देवांशु दत्ता ने बिजनेस स्टैंडर्ड में लिखा है कि अमेरिका और उसके पारंपरिक सहयोगियों जैसे कनाडा, यूरोपीय संघ, जापान आदि के बीच लंबे समय से चले आ रहे गठबंधन अब कमजोर पड़ रहे हैं. ऐतिहासिक रूप से अमेरिका-कनाडा के बीच आखिरी सैन्य संघर्ष 1812 में हुआ था, जबकि जर्मनी-जापान के साथ 1945 में. डॉलर की वैश्विक स्थिति 1971 से मजबूत रही, जब स्वर्ण मानक छोड़ा गया. लेकिन डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों ने इस स्थायित्व को चुनौती दी है. ट्रंप ने कनाडा को 51वां राज्य बनाने की बात कही, जिसके बाद कनाडा ने अमेरिकी सैन्य कार्रवाई की आशंका में सैन्य आकस्मिक योजनाएं (हाइपोथेटिकल इनवेजन मॉडल, गुरिल्ला टैक्टिक्स सहित) बनाईं. ग्रीनलैंड पर कब्जे की इच्छा ने नाटो को टूटने के कगार पर ला दिया, हालांकि बाद में कुछ समझौते हुए. सैन्य खतरा कम होने पर भी आर्थिक संघर्ष बढ़ने की संभावना है.
देवांशु लिखते हैं कि ट्रंप की टैरिफ नीतियां सहयोगियों से जवाबी टैरिफ और अन्य उपाय को जन्म दे सकती हैं जैसे, यूरोपीय संघ द्वारा अमेरिकी पेटेंट/कॉपीराइट की अनदेखी या अरबपतियों पर संपत्ति कर की मांग. अमेरिका का राष्ट्रीय ऋण भारी (जीडीपी से अधिक), जिसमें विदेशी हिस्सा करीब 9-9.5 ट्रिलियन डॉलर है. यदि विदेशी निवेशक नए बॉन्ड न खरीदें या बेचें, तो यील्ड बढ़ेगी और अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी.
डॉलर की आरक्षित मुद्रा स्थिति कमजोर होने से दुनिया अलग विकल्प तलाश रही है. भारतीय बाजार वैश्विक अस्थिरता से जुड़े हैं; 2025 में एफपीआई ने भारी बिकवाली की, लेकिन घरेलू म्यूचुअल फंड्स ने संभाला. यदि बिकवाली बढ़ी तो मंदी आ सकती है. निष्कर्ष यह है कि परिवर्तन नहीं, बल्कि 'दरार' है, जैसा कनाडाई पीएम मार्क कार्नी ने कहा. सोना-चांदी में तेजी इसी अनिश्चितता का संकेत है. बाजारों में उतार-चढ़ाव जारी रहेंगे, निवेशकों को सतर्क रहना चाहिए.
ट्रेड डील न चमत्कार न आपदा
प्रभु चावला ने न्यू इंडियन एक्सप्रेस में भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को कूटनीतिक नाटक बताया है, जो ट्रंप और मोदी द्वारा भव्य रूप से प्रस्तुत किया गया. ट्रंप ने दावा किया कि भारत के रूसी तेल खरीद पर 50% टैरिफ 18% तक घटेंगे, बदले में भारत अमेरिकी सामानों पर पूर्ण टैरिफ हटाएगा, कृषि उत्पादों को असीमित पहुंच देगा, रूसी तेल छोड़ अमेरिकी/वेनेजुएलन स्रोत अपनाएगा और 500 अरब डॉलर अमेरिकी उत्पाद खरीदेगा. यह अमेरिकी घरेलू उपभोग के लिए था, जहां 53.5 अरब डॉलर का व्यापार घाटा ठीक करने का वादा था. भारतीय पक्ष ने इसे कम करके दिखाया.
चावला लिखते हैं कि मोदी ने नए अवसरों का स्वागत किया लेकिन ट्रंप के विशिष्ट दावों (तेल, कृषि, पूर्ण टैरिफ उन्मूलन) का समर्थन नहीं किया. वाणिज्य मंत्री गोयल ने 18% पारस्परिक टैरिफ सीमा पर अस्थायी समझ और ऊर्जा/प्रौद्योगिकी आयात बढ़ाने की बात कही, लेकिन संवेदनशील कृषि और उद्योगों की सुरक्षा पर जोर दिया. कोई कानूनी दस्तावेज नहीं है; भारतीय प्रणाली में टैरिफ बदलाव जटिल हैं. ऊर्जा में भारत मूल्य और रणनीतिक विविधीकरण पर टिका रहेगा.
कृषि में अमेरिकी घुसपैठ की कल्पना ग्रामीण राजनीति को नजरअंदाज करती है. यह प्रारंभिक ढांचा है—टैरिफ शत्रुता कम करने की राजनीतिक प्रतिबद्धता है न कि अंतिम सौदा. मोदी के लिए यह 'हग्लोमेसी' की जीत का ऑप्टिक है, जबकि विपक्ष इसे समर्पण बताता है. बाजारों में सतर्क तेजी आई. ट्रंप का तरीका मीडिया स्पेक्टेकल है, लेकिन असली सफलता कठिन बातचीत, कानूनी मसौदा और घरेलू हितों की सुरक्षा पर निर्भर है. यह न चमत्कार है, न आपदा—बल्कि आर्थिक एकीकरण और संप्रभुता के बीच संतुलन की नाजुक शुरुआत है.
बजट सुस्त और चुनौतियों से मुंह मोड़ने वाला
पी चिदंबरम ने इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित अपने लेख में यूनियन बजट 2026-27 की तीखी आलोचना की है. बजट को 'सतर्क' और 'नाव को मत हिलाओ' कहकर वर्णित करने वाले मीडिया और सरकारी प्रवक्ताओं पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि यह अमेरिकी मुहावरे 'अगर खराब नहीं, तो ठीक मत करो' का अनुसरण लगता है. आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 ने कई गंभीर चुनौतियां उजागर की थीं, जैसे ट्रंप की टैरिफ नीति, कम विदेशी निवेश, जीएफसीएफ जीडीपी के 30% पर अटकना, नाममात्र जीडीपी वृद्धि में गिरावट, 15% की युवा बेरोजगारी, नियमित वेतनभोग का केवल 21.7% कार्यबल, मैन्युफैक्चरिंग का महज 15-16% योगदान और धीमा राजकोषीय समेकन.
चिदंबरम ने लिखा है कि 2025-26 का कर जुआ विफल रहा. आरबीआई के 3 लाख करोड़ से ज्यादा के लाभांश ने स्थिति संभाली. लेखक का आरोप है कि वित्त मंत्री ने मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) की सलाह को अनदेखा किया. सीईए ने सतर्कता लेकिन निराशावाद नहीं, विश्वसनीय राजकोषीय पथ, और शहरीकरण में बोल्ड कदम की सिफारिश की, लेकिन बजट भाषण में अर्थव्यवस्था की स्थिति, ट्रंप के हमले, वैश्विक उथल-पुथल, चीन की वृद्धि या बेरोजगारी, गरीबी, असमानता, निवेश ठहराव, रुपये का अवमूल्यन, इंफ्रास्ट्रक्चर गैप पर कोई चर्चा नहीं हुई.
2025-26 में व्यय कटौतियां क्रूर रहीं. ग्रामीण/शहरी विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि में 60,052 करोड़ कट, जल जीवन मिशन 67,000 करोड़ से 17,000 करोड़ पर आ गया. पूंजीगत व्यय 3.2% से 3.1%, रक्षा 1.6% पर पहुंच गए. विशेषज्ञों ने भी इसकी आलोचना की. बजट में 24 से ज्यादा योजनाएं/मिशन घोषित किए गये लेकिन कई के लिए फंड ही नहीं है. बजट बौद्धिक आलस्य का उदाहरण है. यह आर्थिक रणनीति और दूरदर्शिता की परीक्षा में असफल है. सर्वेक्षण उपयोगी था, लेकिन बजट सुस्त और चुनौतियों से मुंह मोड़ने वाला है.
यूजीसी रूल पर रोक के खोखले आधार
सुखदेव थोराट ने टेलीग्राफ में प्रकाशित अपने लेख में यूजीसी (प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस) रेगुलेशंस, 2026 की रक्षा की है. ये नियम 2012 के यूजीसी नियमों (यूपीए-II द्वारा बनाए गए) में सुधार के लिए लाए गए थे, लेकिन सामान्य वर्ग के कुछ छात्रों के विरोध के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इन्हें स्थगित कर दिया और समीक्षा का आदेश दिया, क्योंकि प्रावधान अस्पष्ट और दुरुपयोग की संभावना वाले लगे. याचिकाकर्ताओं ने मुख्य रूप से एससी/एसटी/ओबीसी के खिलाफ "केवल जाति या जनजाति आधारित भेदभाव" के अलग उल्लेख का विरोध किया. उनका तर्क है कि जाति भेदभाव सामान्य 'भेदभाव' परिभाषा में शामिल है, अलग उल्लेख समाज को विभाजित करेगा. रैगिंग को भी इसमें शामिल करना चाहिए था. कोर्ट ने इन बिंदुओं से सहमति जताई.
थोराट का तर्क है कि यह विरोध भेदभाव की सैद्धांतिक समझ की कमी से है. भेदभाव सामाजिक समूहों (जाति, जनजाति, नस्ल, लिंग आदि) से जुड़ा होता है, न कि व्यक्तिगत. सभी समूह भेदभाव झेलते हैं, लेकिन स्रोत और प्रकृति अलग होती है—इसलिए अलग उल्लेख जरूरी. बी.आर. आंबेडकर की किताबों से उद्धृत करते हुए वे बताते हैं कि जाति व्यवस्था ग्रेडेड इनइक्वालिटी (क्रमिक असमानता) पर आधारित है. शूद्र (ओबीसी) सामाजिक-आर्थिक-धार्मिक अधिकारों से वंचित होते हैं, लेकिन अस्पृश्य (दलित) अतिरिक्त अपवित्रता/प्रदूषण के कलंक से पीड़ित—उनका स्पर्श/दृष्टि प्रदूषित करती है, जिससे अलगाव, घृणा और असम्मान होता है.
दलितों के खिलाफ अपराध अनोखे हैं. आदिवासी, महिलाएं, धार्मिक अल्पसंख्यक, नस्लीय भेदभाव आदि में भी अंतर है. इसलिए सामान्य परिभाषा में सभी शामिल हों, लेकिन जाति-विशिष्ट भेदभाव को अलग सूचीबद्ध करना चाहिए. याचिकाकर्ताओं का अलग उल्लेख न करने का तर्क टिकाऊ नहीं. कम आय वाले छात्रों या रैगिंग को समूह-आधारित भेदभाव से भ्रमित नहीं करना चाहिए—ये व्यक्तिगत हैं और सामान्य शिकायत निवारण से संभाले जा सकते हैं. आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए नौकरियां आरक्षित जरूरी, लेकिन इन्हें समूह पहचान-आधारित आरक्षण में शामिल करना गलत. गरीब दलितों पर बेहतर दलितों द्वारा उत्पीड़न शामिल करने का सुझाव निरर्थक है. कोर्ट ने प्रतिष्ठित व्यक्तियों की समिति गठित करने का फैसला किया है. थोराट सुझाव देते हैं कि इसमें शिक्षाविदों को शामिल कर अकादमिक दृष्टिकोण से भेदभाव समझकर मजबूत कानूनी सुरक्षा बनाई जाए.
बोलचाल की भाषा में शेक्सपीयर
करण थापर ने हिन्दुस्तान टाइम्स में लिखा है कि विलियम शेक्सपियर अंग्रेजी भाषा में योगदान देने वालों में बड़ा नाम हैं. उनकी 38 रचनाओं से परिचित कम लोग हैं, लेकिन उनका भाषा पर प्रभाव असीमित है. एक अनुमान के अनुसार, उन्होंने अंग्रेजी में 1,700 नए शब्द दिए या पहली बार दर्ज किए, जिनमें से कई आज भी रोज इस्तेमाल होते हैं. शेक्सपियर ने न केवल नए शब्द गढ़े, बल्कि मौजूदा शब्दों के साथ भी खेला—संज्ञाओं को क्रिया, क्रियाओं को विशेषण बनाया, उपसर्ग-प्रत्यय जोड़े. उदाहरण के लिए एलिगेटर, बेडरूम, क्रिटिक, फैशनेबल, गॉसिप, लोनली, मैनेजर, ऑब्सीन, आईबॉल, अनकम्फर्टेब्ल, टु एल्बो, टु चैंपियन, टु कॉउ आदि. ये शब्द आज इतने सामान्य हैं कि उनकी साहित्यिक जड़ें भुला दी गयी हैं.
थापर लिखते हैं कि शेक्सपीयर का सबसे बड़ा योगदान वाक्यांशों में है, जो हमारी रोजमर्रा की भाषा का हिस्सा बन चुके हैं. हम यह जानते भी नहीं कि ये वाक्यांश शेक्सपियर ने दिए हैं. उदाहरण के लिए ‘वी हैव सीन बेटर डेज़’ ‘टू मच ऑफ ए गुड थिंग’, ‘नाइदर राइम नॉर रीज़न’, ‘क्रूएल टु बि काइंड’, ‘ग्रीन आईड मॉन्स्टर’, ‘ऑल दैट ग्लिटर्स इज नॉट गोल्ड’, ‘द वर्ल्ड इज माइ वाय्स्टर’, ‘ब्रेक द आइस’, ‘वाइल्ड गूज चेज’, ‘हॉर्ट ऑफ गोल्ड’, ‘इन ए पिक्ल’, ‘वन फेल स्वूप’, ‘ऑल द वर्ल्ड्स स्टेज’, ‘मेथड इन द मैडनेस’, ‘गुड रिडेन्स’, ‘लव इज ब्लाइंड’ आदि.
इन उदाहरणों से साफ है कि शेक्सपियर का प्रभाव इतना गहरा है कि हम दिन में कई बार अनजाने में उन्हें उद्धृत करते हैं. सबसे साधारण वाक्य भी उनका समृद्ध अतीत रखते हैं. लेखक कहते हैं—शेक्सपियर का धन्यवाद! उनकी भाषा से डरने की बजाय, जब पता चले कि हमारी रोज की बातें उनकी रचनाओं से निकली हैं, तो मंच पर उनके नाटक देखना स्कूल की पढ़ाई से कहीं अधिक जीवंत लगेगा.
