कठिन वक्त में कठिन फैसले जरूरी
तवलीन सिंह ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि यह समय देश के लिए कठिन है जब कठिन फैसले लेने की आवश्यकता है. वर्तमान वैश्विक और घरेलू परिस्थितियों के संदर्भ में नेतृत्व और नीतिगत निर्णयों की आवश्यकता वक्त का तकाजा है. पश्चिम एशिया से जुड़े तनाव और डोनाल्ड ट्रंप के आक्रामक बयान का जिक्र करती हुईं लेखिका ने इसे असंवेदनशील और ऐतिहासिक समझ की कमी वाला बयान कहा है. वह इस बात की भी आलोचना करती हैं कि लोग केवल बाहरी बयानों पर प्रतिक्रिया देते हैं, लेकिन उन आंतरिक समस्याओं पर ध्यान नहीं देते जो किसी देश की सभ्यता और समाज को नुकसान पहुंचाती हैं.
तवलीन सिंह लिखती हैं कि दुनिया और भारत दोनों ही कठिन दौर से गुजर रहे हैं, जहां भावनात्मक प्रतिक्रिया या राजनीतिक बयानबाजी के बजाय ठोस और साहसिक निर्णयों की आवश्यकता है. भारत में अक्सर राजनीतिक वर्ग कठिन फैसलों से बचता है और वास्तविक समस्याओं की बजाय सतही मुद्दों पर बहस करता है.
वह यह भी इंगित करती हैं कि देश में कई सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक चुनौतियां मौजूद हैं, जिनका समाधान केवल मजबूत नेतृत्व और स्पष्ट नीतियों से ही संभव है. कठिन समय में लोकप्रियता की चिंता किए बिना सही निर्णय लेना ही सच्चे नेतृत्व की पहचान है. यदि भारत को आगे बढ़ना है, तो उसे साहसी और व्यावहारिक निर्णय लेने होंगे. केवल आलोचना या भावनात्मक प्रतिक्रियाओं से बदलाव संभव नहीं है—इसके लिए दृढ़ इच्छाशक्ति और जिम्मेदार नेतृत्व अनिवार्य है.
कांग्रेस दफ्तर से पहले बर्मा हाऊस था 24 अकबर रोड
करन थापर ने हिन्दुस्तान टाइम्स में 24 अकबर रोड के दो अलग-अलग पहलुओं के बारे में लिखा है जो इसके राजनीतिक महत्व और लेखक की व्यक्तिगत स्मृतियों को उजागर करता है. सर एडविन लुटियंस द्वारा 1911 और 1925 के बीच निर्मित यह बंगला ब्रिटिश
औपनिवेशिक वास्तुकला का एक शानदार उदाहरण है. आम लोगों की नजर में इस बंगले की पहचान मुख्य रूप से इसलिए है क्योंकि जनवरी 1978 से लेकर हाल के वर्षों तक यह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी का मुख्यालय रहा है.
करन थापर बताते हैं कि उनके लिए इस घर का महत्व इसकी राजनीतिक पहचान से बिल्कुल अलग और बेहद भावनात्मक है. 1960 में, यह भारत में बर्मा (म्यांमार) की राजदूत दाव खिन ची (राष्ट्रीय नायक आंग सान की विधवा) का आधिकारिक निवास बना. तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उनके सम्मान में इस बंगले का नाम 'बर्मा हाउस' रखा था. इसी घर में दाव खिन ची अपनी बेटी और भविष्य की प्रसिद्ध नेत्री आंग सान सू ची के साथ रहती थीं.
करन अपने बचपन के दिनों को याद करते हैं जब उनके परिवार के बर्मी राजदूत के साथ बहुत करीबी और पारिवारिक संबंध थे. वे अक्सर वहां जाते थे और दाव खिन ची उन्हें बड़े प्यार से 'खाओ सुए' और काले चावल की खीर जैसे स्वादिष्ट बर्मी व्यंजन खिलाती थीं. उस समय सू ची किशोरी थीं, लेकिन लेखक के अनुसार, उनमें भविष्य की एक महान नेत्री बनने के संकेत तभी से दिखाई देते थे. अंत में, लेखक इस बात पर जोर देते हैं कि भले ही लोग 24 अकबर रोड को कांग्रेस मुख्यालय के रूप में जानते हों, लेकिन उनके लिए यह 'मैडम आंग सान' के समय का वह खूबसूरत घर है जिसकी सुनहरी यादें समय की धुंध में खो जाने से पहले वह सहेजना चाहते हैं.
सब्सिडी से ‘नम्मा’ मेट्रो में सुविधा और किराया में तालमेल संभव
वी रंगनाथन ने द हिन्दू में लिखा है कि बेंगलुरु मेट्रो (नम्मा) के किराए और उसके वित्तीय प्रबंधन के बीच तालमेल बैठाने की जरूरत है. हाल ही में बेंगलुरु मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (BMRCL) द्वारा किराए में की गई भारी वृद्धि (लगभग 71% तक) के कारण यात्रियों में काफी असंतोष देखने को मिला था, जिसके बाद राज्य सरकार को हस्तक्षेप करके इसे वापस लेना पड़ा था.
लेखक का मुख्य तर्क यह है कि नम्मा मेट्रो को अपनी क्षमता के अधिकतम उपयोग पर ध्यान देना चाहिए. इसके लिए आवश्यक है कि टिकटों की कीमतें कम रखी जाएं ताकि अधिक से अधिक आम लोग इसका लाभ उठा सकें. किराया कम होने से यात्रियों की संख्या बढ़ेगी, जिससे शहर में ट्रैफिक जाम और प्रदूषण जैसी गंभीर समस्याओं से भी बड़ी राहत मिलेगी.
वी रंगनाथन इस बात पर भी जोर देते हैं कि किराए कम करने की प्रक्रिया में BMRCL को आर्थिक नुकसान नहीं उठाना चाहिए. मेट्रो के सुचारू संचालन और रखरखाव में भारी लागत आती है. इस वित्तीय घाटे और सस्ती यात्रा के बीच संतुलन बनाने के लिए लेखक का सुझाव है कि राज्य सरकार को आगे आकर सब्सिडी (Subsidy) प्रदान करनी चाहिए. सरकार द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी इस समस्या का सबसे प्रभावी समाधान है. इससे न केवल यात्रियों को सस्ती और सुलभ सार्वजनिक परिवहन सेवा मिलेगी, बल्कि मेट्रो कॉर्पोरेशन भी बिना आर्थिक दबाव के सुचारू रूप से कार्य कर सकेगा.
यह लेख सार्वजनिक परिवहन को लाभदायक व्यवसाय के बजाय एक जन-कल्याणकारी सेवा के रूप में देखने की वकालत करता है. सरकार और BMRCL को मिलकर एक जनहितैषी मॉडल अपनाना चाहिए.
टेस्ट क्रिकेट का आकर्षण आज भी अद्वितीय
रामचंद्र गुहा ने टेलीग्राफ में लिखा है कि भले ही इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) ने क्रिकेट को अधिक लोकप्रिय, तेज और व्यावसायिक बना दिया हो लेकिन टेस्ट क्रिकेट का आकर्षण आज भी अद्वितीय और गहरा है. टेस्ट क्रिकेट केवल खेल नहीं बल्कि धैर्य, रणनीति, कौशल और मानसिक दृढ़ता की परीक्षा है. जहां टी20 और आईपीएल तुरंत रोमांच देते हैं, वहीं टेस्ट क्रिकेट धीरे-धीरे अपने नाटक, उतार-चढ़ाव और अप्रत्याशित मोड़ों से दर्शकों को बांधता है. इसमें खिलाड़ियों को लंबे समय तक ध्यान, अनुशासन और तकनीक का प्रदर्शन करना पड़ता है, जो इसे सबसे कठिन प्रारूप बनाता है.
गुहा ने लेख में यह भी बताया गया है कि टेस्ट क्रिकेट में कहानी धीरे-धीरे विकसित होती है—कभी एक सत्र में मैच बदल जाता है, तो कभी पांचवें दिन आखिरी घंटे में परिणाम तय होता है. यही अनिश्चितता और गहराई इसे खास बनाती है. टेस्ट क्रिकेट से विपरीत आईपीएल जैसे प्रारूप में खिलाड़ियों पर तुरंत प्रदर्शन का दबाव होता है और खेल अधिक मनोरंजन-केंद्रित हो जाता है. इससे क्रिकेट की कला और सूक्ष्मता कुछ हद तक कम हो जाती है.
लेखक यह भी मानते हैं कि टेस्ट क्रिकेट खिलाड़ियों को अपनी असली पहचान बनाने का अवसर देता है—जहां वे सिर्फ रन या विकेट से नहीं, बल्कि संघर्ष, धैर्य और चरित्र से पहचाने जाते हैं. अंततः लेख यह संदेश देता है कि क्रिकेट के विभिन्न प्रारूपों के बीच संतुलन जरूरी है. आईपीएल की चमक के बावजूद, टेस्ट क्रिकेट खेल की आत्मा है और इसे संरक्षित रखना जरूरी है क्योंकि यही प्रारूप क्रिकेट को गहराई और अर्थ प्रदान करता है.
राष्ट्रीय गौरव है जनजातीय खेल प्रतिभा
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने टाइम्स ऑफ इंडिया में ग्रामीण और वन क्षेत्रों के बच्चों विशेषकर जनजातीय समुदायों की प्राकृतिक खेल प्रतिभा की ओर देश का ध्यान खींचा है. वे लिखती हैं कि प्रकृति के करीब पलने वाले ये बच्चे सीमित संसाधनों के बावजूद खेलों के अपने अनूठे तरीके खोज लेते हैं—जैसे सूखे पत्तों और कपड़ों से गेंद बनाना या बांस से गोलपोस्ट तैयार करना. वे तालाबों में तैरते हैं और बिना जूतों या जर्सी के भी पूरे उत्साह से खेलते हैं. 'खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स' में ओडिशा की 15 वर्षीय अंजलि मुंडा की हालिया सफलता इसी प्राकृतिक प्रतिभा का बेहतरीन प्रमाण है.
द्रौपदी मुर्मू जनजातीय समुदायों की तीरंदाजी में स्वाभाविक निपुणता का भी जिक्र करती हैं जिसे 1855 के ऐतिहासिक 'संथाल हूल' विद्रोह और महान धनुर्धर एकलव्य की प्रेरणादायक कहानी से जोड़ा गया है. राष्ट्रपति अपनी व्यक्तिगत स्मृति साझा करते हुए बताती हैं कि उनके भाई भी एक बेहतरीन फुटबॉलर थे, जो इस बात का प्रतीक है कि जनजातीय परिवारों में खेलों की कितनी जीवंत परंपरा रही है.
पहले खेल सुविधाएं केवल बड़े शहरों तक सीमित थीं, लेकिन अब 'एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों' में स्थित 'स्पोर्ट्स एक्सीलेंस सेंटर' और 'खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स' जैसी पहल इन बच्चों को आधुनिक प्रशिक्षण प्रदान कर रही हैं. 1928 में भारत द्वारा जीते गए पहले ओलंपिक हॉकी स्वर्ण पदक में भी जनजातीय खिलाड़ियों का अहम योगदान था.
राष्ट्रपति मुर्मू मानती हैं कि जनजातीय युवाओं की यह खेल प्रतिभा हमारे देश की एक अमूल्य सामाजिक पूंजी है. यदि इस प्रतिभा को सही प्रशिक्षण और संसाधन मिलें, तो खेल इन युवाओं के लिए केवल मनोरंजन न रहकर आर्थिक सशक्तिकरण और सामाजिक सम्मान का माध्यम बनेंगे. इससे देश खेल जगत में सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित कर सकेगा.
एआई पर चीनी नजरिया अमेरिका से बेहतर
श्याम शरण ने बिजनेस स्टैंडर्ड में लिखा है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के क्षेत्र में चीन एक अलग और रणनीतिक रास्ता अपना रहा है जो उसे लेट मूवर एडवांटेज का फायदा देता है. चीन मानता है कि वह अमेरिका के साथ प्रतिस्पर्धा में है, जबकि अन्य देशों—विशेषकर भारत—को अभी इस दौड़ में गंभीर खिलाड़ी नहीं मानता. अमेरिका AI में एक “मैजिक बुलेट” यानी एक शक्तिशाली एजीआई (आर्टिफिशियल जनरल इंटेलिजेंस) विकसित करने पर ध्यान केंद्रित कर रहा है. इसके विपरीत, चीन का दृष्टिकोण अधिक व्यावहारिक और व्यापक है. वह एआई को हर क्षेत्र—उद्योग, अर्थव्यवस्था और समाज—में लागू करने पर जोर दे रहा है, ताकि इसका उपयोग बड़े पैमाने पर हो सके.
श्याम शरण बताते हैं कि चीन की ताकत उसके विविध और व्यापक इकोसिस्टम में है, जहां विश्वविद्यालय, शोध संस्थान और निजी कंपनियां मिलकर काम कर रही हैं. यह मॉडल अमेरिका की तुलना में अधिक विकेन्द्रित और समन्वित है. साथ ही, चीन ओपन-सोर्स और किफायती एआई समाधान विकसित कर रहा है जिससे तकनीक का तेजी से प्रसार संभव हो रहा है.
लेख यह भी बताता है कि लेट मूवर एडवांटेज का मतलब है कि चीन पहले से विकसित तकनीकों से सीखकर उन्हें बेहतर, सस्ता और अधिक उपयोगी बना रहा है. लेखक का भारत के लिए संदेश यह है कि उसे भी अमेरिका की तरह शीर्ष-स्तरीय एजीआई की दौड़ में अंधाधुंध भागने के बजाय अपनी जरूरतों और संसाधनों के अनुसार एआई का उपयोग करना चाहिए. भारत को व्यावहारिक और क्षेत्र-विशेष में एआई समाधानों पर ध्यान देना चाहिए जिससे आर्थिक और सामाजिक लाभ अधिक मिल सके.
