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संडे व्यू: ट्रंप के नेतृत्व और रणनीति पर सवाल, भारत तक युद्ध की आंच

पढ़ें इस रविवार करन थापर, तवलीन सिंह, शशि थरूर, असीम अली, अदिति फडणीस और जुग सुरैया के विचारों का सार.

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ट्रंप के नेतृत्व और रणनीति पर सवाल

करन थापर ने हिन्दुस्तान टाइम्स में लिखा है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रणनीति और नेतृत्व पर तीखे सवाल उठ रहे हैं. ईरान से युद्ध में ट्रंप सबसे बड़े लूज़र के रूप में उभर रहे हैं. ट्रंप प्रशासन युद्ध के उद्देश्यों को लेकर पूरी तरह भ्रमित नजर आता है. कभी ट्रंप कहते हैं कि वे ईरान के परमाणु कार्यक्रम को खत्म करना चाहते हैं, तो कभी बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को. युद्ध शुरू होने पर उन्होंने 'सत्ता परिवर्तन' का संकेत दिया, लेकिन अब वे उसी शासन के साथ बातचीत करने की कोशिश कर रहे हैं.

ट्रंप का रुख दिन-प्रतिदिन बदलता रहा है. पहले उन्होंने दावा किया कि युद्ध 4-5 हफ्तों में खत्म हो जाएगा, फिर G7 देशों से कहा कि ईरान आत्मसमर्पण करने वाला है, लेकिन इसके विपरीत उन्हें और अधिक अमेरिकी सैनिक भेजने पड़े.

करन थापर लिखते हैं कि ट्रंप ईरान की जवाबी कार्रवाई से 'हैरान' हैं. जब ईरान ने खाड़ी देशों के होटलों, हवाई अड्डों और आवासीय इमारतों को निशाना बनाया और हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को ब्लॉक कर दिया, तो ट्रंप ने कहा कि उन्हें इसकी उम्मीद नहीं थी, जो उनकी खुफिया और रणनीतिक विफलता को दर्शाता है.

ट्रंप ने एक इंटरव्यू में ईरान के खार्ग द्वीप पर बमबारी को मजे के लिए की गयी कार्रवाई कहा. वैश्विक स्तर के नेता के लिए यह बेहद अनुचित और गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार हैं. लेखक का मानना है कि ट्रंप अंतरराष्ट्रीय कानूनों और नियमों की अवहेलना करने में आगे रहे हैं. वे एक ऐसी संकटपूर्ण स्थिति पैदा करके पीछे हटने की कोशिश कर रहे हैं, जिसे उन्होंने खुद उकसाया था.

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युद्ध की आंच भारत तक

तवलीन सिंह ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि वर्तमान युद्ध केवल दो देशों के बीच नहीं, बल्कि आधुनिक लोकतंत्र और धार्मिक कट्टरवाद के बीच का टकराव है. यह युद्ध जहां इजराइल के अस्तित्व की लड़ाई है वहीं हमास और हिजबुल्लाह जैसे समूहों को ईरान का समर्थन प्राप्त है, जिनका घोषित उद्देश्य इजराइल का विनाश है. यदि इजराइल हारता है, तो यह केवल एक देश की हार नहीं बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों की हार होगी. भारत ने इस मुद्दे पर एक संतुलित लेकिन रणनीतिक रुख अपनाया है. प्रधानमंत्री मोदी ने हमास के आतंकी हमलों की निंदा की, लेकिन साथ ही फिलिस्तीन के लिए मानवीय सहायता और दो राष्ट्र समाधान का समर्थन भी जारी रखा.

तवलीन सिंह लिखती हैं कि भारत के लिए क्षेत्रीय स्थिरता जरूरी है क्योंकि इन देशों में लाखों भारतीय काम करते हैं और भारत की ऊर्जा सुरक्षा उसी क्षेत्र पर निर्भर है. लेखिका ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय और विशेष रूप से पश्चिमी उदारवादियों की आलोचना की है. उनका तर्क है कि जहाँ इजराइल की सैन्य कार्रवाई पर सवाल उठाए जाते हैं, वहीं ईरान और उसके समर्थित समूहों द्वारा फैलाए जा रहे आतंक और मानवाधिकारों के उल्लंघन पर अक्सर चुप्पी साध ली जाती है.

अगर यह युद्ध बढ़ता है, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ-साथ भारत पर भी बुरा असर पड़ेगा. तेल की कीमतों में उछाल और सप्लाई चेन में बाधा भारत के आर्थिक विकास के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है. सार यह है कि भारत को अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए इस जटिल स्थिति में सावधानी से आगे बढ़ना होगा. इजराइल का समर्थन करना भारत की सामरिक आवश्यकता है, लेकिन ईरान के साथ पुराने संबंधों और क्षेत्र की समग्र शांति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. यह समय भारत के लिए अपनी कूटनीतिक शक्ति दिखाने का है.

उत्तर-दक्षिण में बढ़ती दूरी चिंताजनक

शशि थरूर ने हिन्दू में लिखा है कि भारत में उत्तर और दक्षिण राज्यों के बीच आर्थिक और राजनीतिक असंतुलन बढ़ता जा रहा है. दक्षिण भारतीय राज्य (जैसे तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक) आर्थिक विकास, प्रति व्यक्ति आय और मानव विकास सूचकांक में उत्तर भारतीय राज्यों से काफी आगे निकल गए हैं. दक्षिण की अर्थव्यवस्था सेवा और विनिर्माण क्षेत्र पर टिकी है, जबकि उत्तर का एक बड़ा हिस्सा अभी भी कृषि और निम्न उत्पादकता पर निर्भर है.

परिसीमन की चर्चा करते हुए लेखक का कहना है कि जनसंख्या नियंत्रण में दक्षिण के राज्य सफल रहे हैं, जबकि उत्तर की जनसंख्या तेजी से बढ़ी है. भविष्य में सीटों के पुनर्वितरण से उत्तर भारत का राजनीतिक प्रभुत्व बढ़ेगा, जिससे दक्षिण को यह डर है कि बेहतर प्रदर्शन के बावजूद राष्ट्रीय राजनीति में उनकी आवाज कमजोर हो जाएगी.

थरूर लिखते हैं कि राजस्व के बंटवारे को लेकर भी तनाव है. दक्षिण के राज्यों का तर्क है कि वे केंद्र को अधिक टैक्स देते हैं, लेकिन वित्त आयोग के फार्मूले के कारण उस धन का बड़ा हिस्सा उत्तर के पिछड़े राज्यों को स्थानांतरित कर दिया जाता है. इसे वे "सजा" के रूप में देखते हैं.

थरूर केवल बाहरी विभाजन की बात नहीं करते बल्कि यह भी लिखते हैं कि दक्षिण के भीतर भी मिडिल इनकम ट्रैप और जातिगत व पितृसत्तात्मक संरचनाएं मौजूद हैं. सामाजिक न्याय और आर्थिक समानता अभी भी पूरी तरह हासिल नहीं हुई है.

लेखक का तर्क है कि इस विभाजन को केवल "उत्तर बनाम दक्षिण" की बयानबाजी तक सीमित नहीं रखना चाहिए. भारत की एकता के लिए एक ऐसे नए 'संघीय समझौते' की आवश्यकता है, जहां विकास करने वाले राज्यों को दंडित न किया जाए और पिछड़े राज्यों को भी साथ लेकर चला जा सके. समावेशी विकास और राजनीतिक सुरक्षा ही इस खाई को पाट सकती है.

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अतीत के दर्पण से राजनीति

असीम अली ने टेलीग्राफ में लिखा है कि राजनीति केवल भविष्य के दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि अतीत के दर्पण से संचालित होती है. राजनीतिक पहचान और कार्रवाइयों को अक्सर इतिहास के 'प्रतिशोध' या 'बदले' के नैरेटिव के माध्यम से आकार दिया जाता है. राजनीतिक दल अपनी पहचान बनाने और जनता को लामबंद करने के लिए इतिहास को एक हथियार के रूप में उपयोग करते हैं.

'अपमान का बदला' लेना एक शक्तिशाली राजनीतिक उपकरण है. माओ के समय से ही चीन ने "अपमान की सदी" का बदला लेने को अपना राष्ट्रीय लक्ष्य बनाया. उन्होंने आर्थिक आत्मनिर्भरता और संप्रभुता के माध्यम से पश्चिमी और यूरोपीय साम्राज्यवाद को चुनौती दी.

भारत में नेहरू, इंडोनेशिया में सुकर्णो और मिस्र में नासिर जैसे नेताओं ने राज्य के नेतृत्व में औद्योगिक विकास के माध्यम से उपनिवेशवाद का जवाब देने की कोशिश की थी. हालांकि, लेखक का तर्क है कि बाद के वर्षों में भारतीय अभिजात वर्ग ने 'इतिहास के अंत' के पश्चिमी विचार को अपना लिया और अपनी स्वतंत्र आर्थिक दृष्टि खो दी.
असीम ने आगे लिखा है कि कांग्रेस के पास इतिहास का कोई प्रभावी नैरेटिव नहीं था, जिसका फायदा बीजेपी ने उठाया. हालांकि, लेखक का तर्क है कि मोदी सरकार का 'इतिहास का बदला' उपनिवेशवाद से लड़ने के बजाय अक्सर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और प्रतीकात्मकता तक सीमित रहता है, जबकि वास्तविक आर्थिक और संरचनात्मक संप्रभुता पर ध्यान कम है. मोदी शासन के इतिहास का बदला लेने के नैरेटिव का उपनिवेशवाद का बदला लेने से बहुत कम लेना-देना है.

यह वास्तव में आश्चर्यजनक है कि एक पूर्व ब्रिटिश उपनिवेश वर्तमान एंग्लो-हेगमन (पश्चिमी प्रभुत्व) को अपनी विदेश और व्यापार नीतियों को निर्देशित करने की अनुमति दे सकता है. यह अक्सर सांप्रदायिक लामबंदी के लिए एक आवरण के रूप में कार्य करता है—जो एक ऐसे कुलीन राजनीतिक संस्कृति को दर्शाता है जो अभी भी पदानुक्रम और नियंत्रण की औपनिवेशिक मानसिकता से आकार लेती है. भारत आज भी विदेशी शक्तियों (विशेषकर अमेरिका) के प्रभाव में है और वास्तविक डी कोलोनाइजेशन के बजाय केवल संकीर्ण अंधराष्ट्रवाद को बढ़ावा दिया जा रहा है.

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छोटे दलों के हाथों में पुदुचेरी की चाबी

अदिति फडणीस ने बिजनेस स्टैंडर्ड में लिखा है कि पुदुचेरी जैसे छोटे केंद्र शासित प्रदेश की राजनीति में छोटी पार्टियां और निर्दलीय उम्मीदवारों की अहमियत लगातार बढ़ती चली गयी है. छोटी विधानसभा होने की वजह से यहां न सिर्फ जीत-हार का अंतर बहुत कम होता है बल्कि यहां एआईएनआरसी (AINRC), एआईएडीएमके (AIADMK) और अन्य क्षेत्रीय दलों की भूमिका निर्णायक हो जाती है. ये दल केवल 'वोट काटने' वाले नहीं, बल्कि 'किंगमेकर' की भूमिका में उभर रहे हैं. पुदुचेरी में कोई भी राष्ट्रीय पार्टी अपने दम पर पूर्ण बहुमत पाने की स्थिति में कम ही रहती है. इसलिए, उन्हें क्षेत्रीय क्षत्रपों और छोटी पार्टियों के साथ गठबंधन करना पड़ता है.

अदिति लिखती हैं कि पुदुचेरी में स्थानीय मुद्दे राष्ट्रीय मुद्दों पर हावी रहते हैं और छोटी पार्टियां सौदेबाजी की मेज पर मजबूत स्थिति में आ जाती हैं. पुदुचेरी की राजनीति का एक बड़ा हिस्सा दलबदल और गठबंधन बदलने से प्रभावित रहता है. छोटी पार्टियों के विधायक पाला बदलकर पूरी सरकार गिराने या बनाने की क्षमता रखते हैं. पिछले कुछ वर्षों के राजनीतिक घटनाक्रमों को नजदीक से देखने से यह बात स्पष्ट हो जाती है.

पुदुचेरी का मतदाता अक्सर व्यक्तिगत संबंधों और स्थानीय विकास के आधार पर वोट देता है. यही कारण है कि निर्दलीय और छोटे दलों के उम्मीदवार अपनी पकड़ बनाए रखने में सफल होते हैं. सार यह है कि पुदुचेरी की सत्ता की चाबी उन छोटी पार्टियों के पास है जो बड़े राष्ट्रीय दलों के विजय रथ को रोक सकती हैं या उसे सहारा दे सकती हैं. आगामी चुनावों में भी इन छोटे खिलाड़ियों का रुख ही तय करेगा कि पुदुचेरी की राजनीति किस दिशा में जाएगी.

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समय नियंत्रित न हुआ, हम समय के गुलाम होते गए

जुग सुरैया ने टाइम्स ऑफ इंडिया में समय की अवधारणा पर कटाक्ष किया. मजाकिया लहजे में यह समझाने की कोशिश की है कि हम समय को नियंत्रित करने की कोशिश में खुद ही समय के गुलाम बन गए हैं. वे ध्यान दिलाते हैं कि कैसे प्राचीन काल में समय का अनुभव सूरज की रोशनी या ऋतुओं के बदलने से होता था, लेकिन अब हम नैनो-सेकंड और डिजिटल घड़ियों के जाल में फंसे हैं. आज हर काम के लिए 'डेडलाइन' तय है, जिससे जीवन में सहजता खत्म हो गई है. तकनीक ने हमें समय बचाने के साधन तो दिए, लेकिन वास्तव में हम पहले से कहीं ज्यादा व्यस्त और तनावग्रस्त हो गए हैं. 'टाइम मैनेजमेंट' के नाम पर हम हर पल को उत्पादक बनाने की कोशिश करते हैं, जिससे विश्राम का अर्थ ही बदल गया है.

क्रिकेट के 'टाइम आउट' नियम का उदाहरण देते हुए जुग सुरैया लिखते हैं कि जीवन की विडंबना देखिए. जैसे खेल में एक बल्लेबाज के पास क्रीज पर पहुंचने के लिए सीमित समय होता है, वैसे ही असल जिंदगी में भी हम हर वक्त घड़ी की सुइयों के साथ दौड़ रहे हैं.

दार्शनिक अंदाज में लेखक समझाते हैं कि समय वास्तव में एक भ्रम है. हम जितना अधिक समय को 'पकड़ने' या 'बचाने' की कोशिश करते हैं, वह उतनी ही तेजी से फिसलता जाता है. सार यह है कि हमें घड़ी की टिक-टिक से थोड़ा ब्रेक लेना चाहिए. जीवन को केवल लक्ष्यों और समय-सीमाओं में बांधने के बजाय उसे उसके प्राकृतिक प्रवाह में जीने की जरूरत है. यह व्यंग्यात्मक लेख हमें याद दिलाता है कि कभी-कभी 'समय बर्बा.द करना' भी मानसिक शांति के लिए अनिवार्य हो सकता है.

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