म्यांमार में चुनाव का नाटक, भारत चुप
करन थापर ने हिन्दुस्तान टाइम्स में लिखा है कि म्यांमार में वर्तमान में चल रहे चुनावों को केवल धोखाधड़ी ही कहा जा सकता है. ये चुनाव तीन चरणों में आयोजित हो रहे हैं: पहला चरण 28 दिसंबर 2025 को, दूसरा 11 जनवरी 2026 को (आज चल रहा है), और तीसरा 25 जनवरी को. बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, प्रमुख राजनीतिक दल भंग किए जा चुके हैं, नेता जेल में हैं और गृहयुद्ध के कारण देश के आधे हिस्से में मतदान की उम्मीद नहीं है. यह व्यर्थ प्रयास लगता है.
थापर लिखते हैं कि आंग सान सू की की नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (NLD) प्रतिबंधित है जिसने 2015 और 2020 में भारी बहुमत हासिल की थी. सू की पिछले छह वर्षों से नजरबंद हैं. 20 साल से ज्यादा की सजाएं झेल रही हैं. उनकी लोकप्रियता बरकरार है. 15 वर्ष की नजरबंदी और नोबेल पुरस्कार के कारण लोग उन्हें “मा सू” कहते हैं.
संयुक्त राष्ट्र विशेष प्रतिवेदक टॉम एंड्र्यूज ने इसे “बंदूक के बल पर बेहूदा नाटक” बताया है जहां जुंटा नागरिकों पर बमबारी, नेताओं की गिरफ्तारी और असहमति को अपराध बनाए हुए है. सैन्य प्रमुख जनरल मिन आउंग ह्लाइंग “स्वतंत्र-निष्पक्ष” दावा करते हैं, लेकिन परिणाम पूर्वनिर्धारित हैं—सैन्य समर्थित USDP पहले चरण में भारी बहुमत से आगे है. नई दिल्ली की चुप्पी से लगता है कि भारत को जुंटा के सत्ता में बने रहने पर कोई आपत्ति नहीं. वहीं, बांग्लादेश इस चुनाव की जोरदार आलोचना करता है. यह भारत के लोकतांत्रिक छवि को नुकसान पहुँचाता है. पड़ोसी के रूप में भारत को लोकतंत्र समर्थकों का साथ देना चाहिए, जैसा नेहरू पुरस्कार देकर पहले किया था. एक दिन म्यांमार लोकतंत्र वापस पाएगा. तब क्या भारत को मजबूत मित्र मानेगा या तानाशाहों से आंख मूंदने वाला पड़ोसी?
नाटो में टूट की वजह बनेगा ग्रीनलैंड?
साई पांडे ने हिन्दू में लिखा है कि अमेरिका ग्रीनलैंड को रणनीतिक और आर्थिक कारणों से निशाना बना रहा है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में ग्रीनलैंड को “किसी भी तरह से” अपने कब्जे में लेने की धमकी दी है. इसमें सैन्य कार्रवाई भी शामिल है. यह धमकी वेनेजुएला में मादुरो की गिरफ्तारी के बाद तेज हुई है. ग्रीनलैंड आर्कटिक क्षेत्र में स्थित है, जो अमेरिका, कनाडा, यूरोप और रूस के बीच है. इसका नियंत्रण आर्कटिक पर प्रभुत्व देता है. जलवायु परिवर्तन के कारण बर्फ पिघलने से नए समुद्री मार्ग खुले हैं, जहाँ जहाजों की संख्या 30% बढ़ी है. यह स्वेज नहर से तेज और सस्ता है. अमेरिका रूसी पनडुब्बियों की निगरानी और यूरेशियाई मिसाइल खतरों का पता लगाने के लिए पिटुफिक बेस (शीत युद्ध से रडार स्टेशन) पर निर्भर है. रूस ने आर्कटिक को सैन्यीकृत किया है और चीन निवेश कर रहा है. ट्रंप इसे राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बताते हैं, ताकि रूस-चीन को रोक सकें.
साई पांडे ने ग्रीनलैंड का आर्थिक महत्व बताते हुए आगे लिखा है कि ग्रीनलैंड में 4 ट्रिलियन डॉलर मूल्य के तेल, हाइड्रोकार्बन, दुर्लभ पृथ्वी खनिज और बेस मेटल हैं. ये खनिज इलेक्ट्रिक वाहन, मोबाइल, F-35 जेट आदि के लिए जरूरी हैं. चीन का ऐसी ही खनिज संपदा पर एकाधिकार है. 2025 में उसने अमेरिका को निर्यात रोका, जिससे उद्योग प्रभावित हुए. आर्कटिक में अज्ञात तेल का 13% और गैस का 30% है. ट्रंप इसे ‘रियल एस्टेट डील’ मानते हैं, और उनके बाद अमीर निवेशक (बिल गेट्स, जेफ बेजोस आदि) कंपनियों के जरिए निवेश कर रहे हैं.
ग्रीनलैंड डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है. नाटो की सदस्यता के कारण हमला डेनमार्क पर हमला माना जाएगा. अमेरिका नाटो का 70% खर्च करता है. सैन्य कार्रवाई से गठबंधन टूट सकता है. यूरोपीय रक्षा व्यवस्था चरमरा सकती है. ग्रीनलैंड में 85% लोग अमेरिका में विलय नहीं चाहते. 84% अंततः स्वतंत्रता चाहते हैं लेकिन डेनमार्क के साथ रहना पसंद करते हैं. आलोचक अमेरिका को संसाधन लूटने वाला गुंडा बताते हैं. ट्रंप का व्यवसायी दृष्टिकोण इसे पूंजीवादी अवसर मानता है, लेकिन यह अमेरिकी छवि और नाटो को नुकसान पहुंचा सकता है.
अहंकार में अमेरिका
प्रभु चावला ने न्यू इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि महान राष्ट्र बाहर से नहीं, अंदर से सड़ते हैं जब अहंकार दृष्टि पर हावी हो जाता है. वाशिंगटन में यही हो रहा है, जहाँ डोनाल्ड ट्रंप भारत—अमेरिका के सबसे बड़े लोकतांत्रिक सहयोगी—को बयानबाजी का निशाना बना रहे हैं. यह रणनीतिक साहस नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक मूर्खता है. ट्रंप की कूटनीति प्रदर्शन और प्रभुत्व पर आधारित है. वे सहयोगियों को तोड़ रहे हैं. भारत पर हमला करके उन्होंने गलत लक्ष्य चुना है. भारत सभ्यतागत शक्ति है—स्थिर, परिपक्व और लचीला—जिसे दबाया नहीं जा सकता. टकराव की शुरुआत अमेरिकी वाणिज्य मंत्री हॉवर्ड लुटनिक के बयान से हुई, जिन्होंने दावा किया कि भारत के साथ व्यापार सौदा इसलिए टूटा क्योंकि मोदी ने ट्रंप को “कॉल नहीं किया”. विदेश मंत्रालय ने तुरंत खंडन किया—2025 में मोदी-ट्रंप ने 8 बार बात की. सौदा वाशिंगटन की बदलती शर्तों और ट्रंप के व्यक्तिगत अहंकार से अटका.
प्रभु चावला लिखते हैं कि ट्रंप ने आगे बढ़कर सैंक्शनिंग रशिया एक्ट लागू किया, रूसी ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर 500% टैरिफ की धमकी दी. भारत ने आँख नहीं झपकाई. ट्रंप ने इंटरनेशनल सोलर अलायंस से भी अमेरिका को बाहर निकाला, लेकिन भारत ने जापान, EU और अफ्रीकी बैंक से फंडिंग कर परियोजना को मजबूत किया. ट्रंप पाकिस्तान की सेना और बांग्लादेश की नई सरकार के करीब आ रहे हैं, जबकि भारत-पाक युद्ध रोकने का झूठा दावा करते हैं. इससे इंडो-पैसिफिक में चीन को रोकने वाली धुरी कमजोर हो रही है.
अमेरिका ओवरस्ट्रेच और जनसांख्यिकीय ठहराव से जूझ रहा है. भारत उभरती महाशक्ति है जिसके पास 1.4 अरब का बाजार है, हिंद महासागर पर नियंत्रण है और युवा प्रतिभाएं हैं. एप्पल, गूगल, टेस्ला जैसी कंपनियाँ भारत पर निर्भर हैं. अमेरिका को भारत की जरूरत भारत को अमेरिका से कहीं अधिक है. ट्रंप को बुद्धिमत्ता अपनानी होगी. सहयोग को चुनना होगा न कि टकराव. भारत के साथ साझेदारी से ही अमेरिका 21वीं सदी में प्रासंगिक रह सकता है अन्यथा वह खुद को अलग-थलग कर लेगा.
कर्नाटक में अक्षम हाईकमान
रामचंद्र गुहा ने टेलीग्राफ में लिखा है कि कर्नाटक में हाल के महीनों में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उप-मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के बीच सत्ता की खींचतान प्रमुख मुद्दा बना हुआ है. शिवकुमार समर्थक दावा करते हैं कि 2023 में कांग्रेस सत्ता में आने पर उच्च कमान ने सिद्धारमैया को पहले ढाई साल मुख्यमंत्री रहने और फिर शिवकुमार को सौंपने का समझौता किया था, जबकि सिद्धारमैया के लोग पूरे पांच साल का कार्यकाल चाहते हैं. इस विवाद ने दोनों नेताओं को विधायकों और जातीय संगठनों में समर्थन जुटाने में व्यस्त कर दिया है. लेख सरकार के समग्र प्रदर्शन की समीक्षा करता है.
गुहा लिखते हैं कि सकारात्मक पक्ष यह है कि सांप्रदायिक तापमान में उल्लेखनीय कमी आई है; मुस्लिम (13%) और ईसाई समुदाय मई 2023 के बाद अधिक सुरक्षित महसूस करते हैं. पाँच गारंटी योजनाएँ (महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा, ग्रहलक्ष्मी, गृहज्योति, अन्न भाग्य, युवा निधि) ने सामाजिक सुरक्षा जाल को मजबूत किया है. नकारात्मक पक्ष में प्रशासनिक अक्षमता प्रमुख है, विशेषकर बेंगलुरु में जहां सड़कें, ट्रैफिक और इन्फ्रास्ट्रक्चर का पतन हो रहा है.
डीके शिवकुमार की प्रस्तावित भूमिगत सुरंग परियोजना को विशेषज्ञों ने महँगी, अव्यवहारिक और निजी वाहनों को लाभ पहुँचाने वाली बताया है. राज्य के व्यापक विकास—अन्य आर्थिक केंद्र, कृषि सुधार, स्वास्थ्य-शिक्षा, पर्यटन—पर ध्यान नगण्य है. राष्ट्रीय कांग्रेस नेतृत्व की बहु-केंद्रित अक्षमता समस्या को और बढ़ाती है. विपक्ष (भाजपा अधिक सांप्रदायिक, जेडीएस परिवारवादी) कोई सकारात्मक विकल्प नहीं प्रस्तुत करता.पहले कार्यकाल में सिद्धारमैया ने स्थिर शासन दिया था, लेकिन दूसरे में गुटबाजी, भटकाव और ध्यान का अभाव दिखता है. 2028 चुनाव से पहले कांग्रेस के पास सुधार का समय है, पर क्या वह इसे भुना पाएगी, यह संदिग्ध है.
रुपये को गिरते रहने देना अनुचित
तनय दलाल ने इंडियन एक्सप्रेस में एक लेख में इसी अखबार में 30 दिसंबर 2025 को प्रकाशित उस संपादकीय से असहमति जतायी है जिसमें सुझाव दिया गया था कि RBI रुपये की गिरावट को रोकना बंद कर दे, ताकि व्यापार और पूंजी प्रवाह से निर्धारित ‘उचित मूल्य’ तक पहुंचा जा सके. RBI एक जटिल अनुकूलन समस्या का सामना कर रहा है. बाजार में विश्वास, कॉर्पोरेट बैलेंस शीट में नुकसान और विदेशी मुद्रा भंडार की सेहत को न्यूनतम रखते हुए रुपये को उचित स्तर तक लाना चुनौती है. संपादकीय का ‘उचित मूल्य’ संतुलन विनिमय दर के करीब है, जो REER (Real Effective Exchange Rate) में दीर्घकालिक बदलावों को व्यापार-पूंजी प्रवाह से जोड़ता है. 2010 के शुरुआती दशक में इसकी वैश्विक सराहना हुई थी, लेकिन अब IMF के पूर्वानुमानों में वैश्विक बचत घटने से संतुलन पूंजी प्रवाह कम हो सकता है.
2011-2013 की तरह ‘तेज गिरावट’ से रुपये में ओवरशूट हो सकता है. 2023 से रुपये की अनुमानितता बढ़ने से हेजिंग कम हुई है, जिससे स्वस्थ कॉर्पोरेट बैलेंस शीट प्रभावित हो सकती हैं. ओवरशूट से मुद्रास्फीति बढ़ सकती है, वृद्धि समर्थन की स्वतंत्रता घट सकती है. वैश्विक घर्षणों में निर्यात तेजी की संभावना कम है, समायोजन घरेलू अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा.
लेखक का सुझाव है कि झटकों से बचते हुए उचित मूल्य तक धीरे-धीरे पहुंचना अनिश्चित है. सीमित दो-तरफा अस्थिरता से हेजिंग बढ़ेगी. यह प्रो साइक्लिकल प्रवाह से अस्थिरता घटाएगी और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम करेगी. समय के साथ यह ऑपरेशन उचित मूल्य का अनुमान लगाएंगे, तेज गिरावट के नुकसान न्यूनतम रखेंगे और स्थिरता बढ़ाएंगे. यह भंडार में कमी लाएगा, लेकिन दीर्घकालिक बदलाव सुचारू करना और नुकसान सीमित करना बफर का उद्देश्य है. IMF के के अनुसार मुद्रा पर कम नियंत्रण से बाद में भंडार पुनः संचय की जरूरत घटेगी. यह पूरी प्रक्रिया अनुकूलन समस्या का समाधान है.
