ईरान की क्षेत्रीय ताकत को झटका
टीसीए राघवन ने टेलीग्राफ में लिखा है कि ठीक 47 वर्ष पहले जनवरी 1979 में ईरान की इस्लामी क्रांति ने शाह को निर्वासित कर शिया गणराज्य स्थापित किया था. आज 2026 की शुरुआत में ईरान फिर उसी तरह के जन-विरोध और गहन संकट से गुजर रहा है. सड़कों पर बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हो रहे हैं, जिनकी तीव्रता 1979 की याद दिलाती है. भारी दमन के बावजूद सैकड़ों-हजारों मौतों की रिपोर्ट्स आ रही हैं. आर्थिक स्थिति भयावह है. 2025 में रियाल की कीमत लगभग 90% गिरी, महंगाई चरम पर पहुंची. दिसंबर के अंत में व्यापारी समुदाय (बाज़ार) ने भी दुकानें बंद कर विरोध में शामिल होकर स्थिति को नया मोड़ दिया—ठीक वैसे ही जैसे 1979 में शाह के खिलाफ बाज़ार का मुड़ना निर्णायक साबित हुआ था.
राघवन लिखते हैं कि क्षेत्रीय स्तर पर ईरान की स्थिति भी कमजोर हुई है. हमास और हिजबुल्लाह को इजरायल से करारी शिकस्त मिली, सीरिया में असद शासन दिसंबर 2024 में गिरा, जून 2025 के 12-दिवसीय युद्ध में वरिष्ठ कमांडरों और परमाणु वैज्ञानिकों की मौत हुई तथा परमाणु सुविधाएं बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुईं.
ट्रंप प्रशासन की सख्त चेतावनियां, अमेरिकी सैन्य-साइबर क्षमता और नए प्रतिबंधों ने दबाव बढ़ाया है. ईरानी सरकार दमन को और तेज कर रही है, पर आर्थिक संकट के कारण त्वरित समाधान दिखाई नहीं देता.सत्ताधारी व्यवस्था में अभी गंभीर विद्रोह के संकेत नहीं हैं, विपक्ष में नेतृत्व और एकता की कमी है. फिर भी ये विरोध 1979 के बाद की सबसे बड़ी चुनौती हैं. क्या यह किसी बड़े राजनीतिक परिवर्तन की शुरुआत है—यह अभी अनिश्चित है, परंतु इसके क्षेत्रीय व वैश्विक प्रभाव गहरे हो सकते हैं.
भारतीय प्रवासियों पर MAGA का खतरा
राम माधव ने इंडियन एक्सप्रेस में अपनी दो अमेरिका यात्राओं (अगस्त 2025 और जनवरी 2026) के आधार पर देश की खतरनाक दिशा का वर्णन किया है. अगस्त 2025 में बहस मुख्य रूप से ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गए उच्च टैरिफ पर थी—भारत पर 25% से बढ़ाकर 50% तक. भारत-अमेरिका मुक्त व्यापार समझौते पर बात चल रही थी, जो टैरिफ समस्या हल कर सकता था. भारतीय प्रवासी दोहरी मार में थे: व्यापार समझौते के लिए दबाव बनाने की कमी का ताना और ट्रंप की 'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन' (MAGA) विचारधारा के प्रति वफादारी दिखाने की मजबूरी. जनवरी 2026 तक स्थिति गंभीर हो गई.
राम माधव लिखते हैं कि 10 सितंबर 2025 को यूटा वैली यूनिवर्सिटी में टर्निंग पॉइंट USA के संस्थापक चार्ली किर्क की हत्या ने MAGA आंदोलन को 'एंटी-इमिग्रेंटिज्म' का केंद्र बना दिया. अमेरिका को सदियों से 'मेल्टिंग पॉट' (विभिन्न पहचानों का मिश्रण) माना जाता था, लेकिन MAGA ने इसे अस्वीकार कर केवल श्वेत अमेरिकी ईसाई-केंद्रित 'टमाटर सूप' राष्ट्रवाद को बढ़ावा दिया.
इसके बाद भारतीय प्रवासियों पर दबाव बढ़ा: "गो बैक" के नारे, नौकरियाँ चुराने के ताने, सोशल मीडिया पर हिंदू धर्म को "डेविल वर्शिप" कहना. पिछले साल सिख ट्रक ड्राइवरों से जुड़ी घटनाओं का इस्तेमाल एंटी-इमिग्रेंट भावना फैलाने में हुआ. एफबीआई निदेशक कश पटेल और टेक्सास गवर्नर द्वारा दीवाली आयोजन पर चरम MAGA समूहों की कड़ी आलोचना हुई. रेड स्टेट्स (फ्लोरिडा, टेक्सास) में ICE द्वारा बढ़ती जाँच और जबरन निर्वासन आम हो गए.समुदाय नेता "फोर्ट्रेस अमेरिका" में बढ़ते नस्लवाद से चिंतित हैं. वे भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के शीघ्र समापन को MAGA के एंटी-इंडियन बयानबाजी के खिलाफ संदेश मानते हैं. यह चिंता वास्तविक और गंभीर है.
140 साल की कांग्रेस में संरचनात्मक संकट
जोया हसन ने हिन्दू में लिखा है कि 28 दिसंबर 2025 को 140 वर्ष पूरे करने पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस लंबे संस्थागत क्षरण के संचयी प्रभावों से जूझ रही है. वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह के हालिया बयानों ने इस मुद्दे को फिर से सुर्खियों में ला दिया, जिसमें उन्होंने बीजेपी और आरएसएस की संगठनात्मक ताकत की तारीफ की और कांग्रेस से तुलना की. उन्होंने एक पुरानी तस्वीर साझा की जिसमें युवा नरेंद्र मोदी जमीन पर बैठे थे, और कहा कि आरएसएस-बीजेपी में जमीनी कार्यकर्ता ऊपर तक पहुँच सकते हैं – यह "संगठन की ताकत" है. हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि वे आरएसएस की विचारधारा के कट्टर विरोधी हैं.
जोया हसन मुख्य अंतर बताती हैं कि बीजेपी आरएसएस द्वारा समर्थित घने वैचारिक-संस्थागत पारिस्थितिकी तंत्र में काम करती है, जिसमें प्रचार, चुनाव प्रबंधन और बूथ-स्तरीय समन्वय की मजबूत क्षमता है. कोई अन्य दल ऐसी बाहरी कैडर बेस नहीं रखता जो निरंतर नेतृत्व देता है. इसके विपरीत, कांग्रेस कैडर-आधारित नहीं है, जिससे जिला-बूथ स्तर पर प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं की कमी है.
कांग्रेस का पतन स्वतंत्रता के बाद केंद्रीकरण, आंतरिक लोकतंत्र की कमी और परिवार-केंद्रित फैसलों से तेज हुआ. इंदिरा गांधी युग से शुरू होकर राज्य नेताओं की स्वायत्तता घटी. नवंबर 2025 में बिहार विधानसभा चुनावों में महागठबंधन की हार में कांग्रेस का खराब प्रदर्शन (केवल 6 सीटें) इस कमजोरी को उजागर करता है.सीडब्ल्यूसी बैठक में दिग्विजय सिंह ने "अधिक केंद्रीकरण" की आलोचना की और विकेंद्रीकरण, अनुशासन तथा जमीनी स्तर पर मजबूती की मांग की. पार्टी को आंतरिक लोकतंत्र मजबूत करना, राज्य नेतृत्व सशक्त बनाना, युवा कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करना और प्रगतिशील विजन के साथ जन-संपर्क बढ़ाना होगा. यदि ये सुधार नहीं हुए, तो 2026 के चुनाव (तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, असम आदि) में पार्टी की प्रासंगिकता खतरे में पड़ सकती है.
अनलकी या लकी नंबर है तेरह?
करण थापर ने हिन्दुस्तान टाइम्स में संख्या 13 के प्रति अपने विशेष लगाव का वर्णन किया है. वे इसे अपना भाग्यशाली नंबर मानते हैं. वे कहते हैं कि उनके जीवन में 13 बार-बार सकारात्मक रूप से प्रकट हुआ—डून स्कूल में रोल नंबर 238 (2+3+8=13), स्टो में 490 (4+9+0=13), जिमखाना क्लब, इंडिया इंटरनेशनल सेंटर और इंडिया हैबिटेट सेंटर की सदस्यता संख्या भी 13 पर आई. पहली नौकरी, पत्नी से पहली मुलाकात और प्रस्ताव—सभी 13 तारीख को हुए.
वे पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का उदाहरण देते हैं, जिनके राजनीतिक जीवन में 13 प्रमुख रहा: 1996 में 13 दिनों की सरकार, 13 महीने बाद दूसरी सरकार की एक वोट से हार, और 13वीं लोकसभा (13 अक्टूबर 1999 से 13 मई 2004) में उनका सर्वश्रेष्ठ कार्यकाल.
थापर आगे लिखते हैं कि हालांकि दुनिया में अधिकांश लोग 13 को अशुभ मानते हैं. बाइबिल में जीसस की अंतिम भोज में 13 लोग थे और सूली शुक्रवार 13 को चढ़ी. नॉर्स किंवदंती में बाल्डुर की हत्या 13 लोगों के भोज में हुई. यह अंधविश्वास इतना गहरा है कि पेरिस में 13 नंबर के घर दुर्लभ हैं, इटली की लॉटरी में 13 नहीं आता, ब्रिटेन में 13 लोगों का डिनर टाला जाता है, और भारत के अधिकांश होटलों में 13वीं मंजिल नहीं होती. कोलंबो हिल्टन में 1997 के बम विस्फोट के बाद पुनर्निर्माण में भी 13वीं मंजिल हटा दी गई—जहाँ थापर उस दिन ठहरे थे!अंग्रेजी में 13 के डर को ट्रिस्काइडेकेनाफोबिया कहते हैं. थापर इसे भाग्यशाली मानकर मजाक में ट्रिस्काइडेकेनाफिलिया शब्द गढ़ते हैं. वे लिखते हैं कि हाल की 13 तारीख पर कुछ खास नहीं हुआ, लेकिन साल में अभी 11 और 13 तारीखें बाकी हैं!
मिठाइयों में बंगाली मिष्टी का जवाब नहीं
जुग सुरैया ने टाइम्स ऑफ इंडिया में लिखा है कि बंगाली भाषा विशेष रूप से मीठी लगती है खासकर जब इसमें रवींद्र संगीत गाया जाता है. यह भाषा गोल-मटोल स्वरों से भरी है, जो जीभ पर आसानी से लुढ़क जाते हैं और व्यंजनों की कठोरता से मुक्त रहते हैं. लेकिन यह मिठास केवल भाषाविज्ञान तक सीमित नहीं – लेखक इसे बंगाल की रसोई से भी जोड़ते हैं, जहाँ मिठाइयाँ बनाने की कला अद्वितीय है.
जग सुरैया बताते हैं कि 2025 में पाँच भारतीय मिठाइयों को GI टैग मिला, जिनमें से चार बंगाल की हैं – यह बंगाली मिठास की वैश्विक पहचान का प्रमाण है: नोलन गुड़ेर संदेश – सर्दियों की विशेष मिठाई, जिसमें तरल खजूर का गुड़ रेशमी छेना के साथ मिलकर बनाता है स्वाद और बनावट का जादू, जो ठंड को गर्माहट देता है. छानाबोरा (मुरशिदाबाद) – छेना के गोल, बाहर क्रिस्पी और अंदर रसीले, गुलाब जल वाली चाशनी में डूबे. मोतीचूर लड्डू (बिष्णुपुर) – छोटे सुनहरे गोले, पायल बीज के आटे से बने, चाशनी में डुबोकर लड्डू बनाए जाते हैं.
7वीं शताब्दी के मल्ल राजवंश से जुड़े, ये देवताओं और विशेष लोगों के लिए आदर्श भेंट हैं. सादा बोंडे (कमरपुर) – गेहूं के आटे के छोटे फ्रिटर्स, मीठी चाशनी में भिगोए – लेखक के लिए बंगाल पुनः जाने का बहाना. लेखक दो अन्य मिठाइयों के लिए भी GI टैग की प्रतीक्षा में हैं- एक है 19वीं सदी में लेडी शार्लोट के नाम पर बनी लेडिकेनी और बल्लीगंज का शोरभजा जो अमृत-समान हैं. लेखक का मानना है कि बंगाली भाषा की मिठास और बंगाल की मिठाइयाँ एक-दूसरे को पूरक बनाती हैं. बंगाल हमेशा उनके लिए मिष्टी (मीठा) का डंका बजाता रहेगा – भाषा में भी और स्वाद में भी.
