विनाश की ओर विश्वविद्यालय
प्रताप भानु मेहता ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि भारतीय सार्वजनिक विश्वविद्यालय चुपचाप विनाश की ओर धकेले जा रहे हैं. 1970 के दशक से राजनीतिक हस्तक्षेप, फंड कटौती और अकादमिक आत्मसमर्पण ने उन्हें खोखला कर दिया है. पहले राज्य, फिर केंद्रीय विश्वविद्यालय संकटग्रस्त हुए. यूपीए-2 के केंद्रीकरण ने बाद के हमलों की नींव रखी, लेकिन प्रणाली टिकी रही. पहले पहुंच पर जोर था, गुणवत्ता पर नहीं, लेकिन छात्र सीखने को उत्सुक थे.अब स्थिति निराशाजनक है.

