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संडे व्यू: विकास पर खर्च हड़प रहे हैं नकद हस्तांतरण, शरद पवार के पास तीन विकल्प

पढ़ें अदिति फडणीस, सुशांत सिंह, अनु रघुनाथन, करण थापर के विचार और आर्थिक सर्वेक्षण पर टाइम्स ऑफ इंडिया का संपादकीय

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विकास पर खर्च हड़प रहे हैं नकद हस्तांतरण

टाइम्स ऑफ इंडिया ने लिखा है कि आर्थिक सर्वेक्षण सतही रूप से सकारात्मक बताया है. लेकिन, यह गहराई में सावधानी भरा संदेश देता है. वर्तमान वित्तीय वर्ष में विकास दर 7.4% तक पहुंचने की उम्मीद है (प्रारंभिक अनुमान 6.3-6.8% था). भारत अब भी प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेजी से बढ़ रहा है, मुद्रास्फीति कम है, राजकोषीय घाटा नियंत्रण में है और पिछले अगस्त में S&P से रेटिंग अपग्रेड मिला. फिर भी, सर्वेक्षण चेतावनी देता है कि सामान्य तरीके से काम चलाने से भारत निम्न-मध्यम आय वर्ग से बाहर नहीं निकल पाएगा. पिछले सर्वेक्षण में बात की गई 8% की निरंतर विकास दर एक-दो दशक तक अब भी दूर की कौड़ी लगती है. वैश्विक भू-राजनीतिक माहौल में व्यापार कठिन हो गया है और यदि इस वर्ष AI बुलबुला फूटा तो 2008 के संकट से भी बदतर स्थिति बन सकती है.

सर्वेक्षण 2026 को 2025 से बेहतर या बराबर रहने की संभावना मात्र 40-45% बताता है, जिससे 2026-27 के लिए 7% विकास अनुमान आशावादी लग सकता है. इससे उबरने के लिए नीतियों से परे मौलिक बदलाव जरूरी हैं.

संपादकीय में आगे लिखा गया है कि सर्वेक्षण एक रोचक विचार प्रस्तुत करता है—‘उद्यमी राज्य’ (entrepreneurial state) का, यानी ऐसी सरकार जो सही काम करने में सक्षम हो. जापान, दक्षिण कोरिया और सिंगापुर ने ऐसा किया, लेकिन इसके लिए नौकरशाही को अनिश्चितता में प्रयोग करने से नहीं डरना चाहिए. सरकार को त्रुटि और भ्रष्टाचार में फर्क करना होगा तथा अच्छे इरादे से लिए निर्णयों को दंडित नहीं करना चाहिए.

दूसरी ओर, सर्वेक्षण चेतावनी देता है कि बिना शर्त नकद हस्तांतरण (फ्रीबीज) विकास को बढ़ावा देने वाले खर्चों को निगल रहे हैं. केंद्र और राज्य स्कूल, अस्पताल, बिजली ट्रांसफॉर्मर और सड़कों में निवेश कैसे बढ़ाएंगे यदि राजस्व फ्रीबीज में खर्च हो रहा है?

रुपया पिछले वर्ष प्रमुख मुद्राओं में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली थी, और सेवाओं के निर्यात बूम के बिना यह और बदतर दिखती. सर्वेक्षण सुझाव देता है कि विनिर्माण पर फोकस करें, क्योंकि यह दीर्घकालिक मुद्रा स्थिरता और मजबूती के लिए महत्वपूर्ण है. विनिर्माण देश को बदलता है—सरकार को वित्त, श्रम कानून और लॉजिस्टिक्स जैसी कमजोरियों को सुधारने के लिए मजबूर करता है. लेकिन यह तभी संभव जब निर्माता वैश्विक प्रतिस्पर्धा की इच्छाशक्ति रखें, न कि बेलआउट और टैरिफ पर निर्भर रहें.अंत में, सर्वेक्षण नागरिकों को भी उपदेश देता है—काम का सम्मान करें, सही खाएं, सोशल मीडिया की लत न पालें, यानी तत्काल सुख को टालें. लेकिन यदि ऐसा हुआ तो जीडीपी का 61.5% हिस्सा बनाने वाला उपभोग व्यय क्या होगा?

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शरद पवार के पास तीन विकल्प

अदिति फडणीस ने बिजनेस स्टैंडर्ड में लिखा है कि शरद पवार (85 वर्ष) ने कई बार राजनीति से संन्यास की बात की है. आखिरी बार नवंबर 2024 के विधानसभा चुनाव के दौरान बारामती में प्रचार करते हुए कहा कि वे अब कोई चुनाव नहीं लड़ेंगे, राज्यसभा का कार्यकाल डेढ़ साल बचा है और उन्हें कहीं तो रुकना होगा. उन्होंने मतदाताओं को 14 बार चुनने के लिए धन्यवाद दिया. इस पर उनके भतीजे अजित पवार ने पलटवार किया कि 80 साल के बाद भी कुछ लोग रिटायरमेंट के लिए तैयार नहीं होते. शरद पवार ने जोरदार जवाब दिया: "न टायर्ड हूं और न रिटायर्ड हूं."

लेख के अनुसार, अजित पवार अब राजनीतिक परिदृश्य से विदा हो चुके हैं. वे महायुति सरकार में उपमुख्यमंत्री थे, लेकिन सत्ता में निराशा के कारण परिवार में वापसी की बातचीत चल रही थी. उनकी अनुपस्थिति में राकांपा (शरद गुट) की विरासत फिर शरद पवार पर आ सकती है.

अदिति लिखती हैं कि राकांपा (शरद गुट) के पास तीन विकल्प हैं :

1. विलय/बातचीत: महायुति में शामिल होकर सत्ता में बने रहना, लेकिन कुछ पद खतरे में पड़ सकते हैं. महाराष्ट्र में अगले चुनाव 2029 तक नहीं.

2. भाजपा में विलय: हिस्सेदारी मिलेगी, लेकिन प्रतिस्पर्धा ज्यादा.

3. कांग्रेस में शामिल होना: जितेंद्र आव्हाड जैसे नेताओं के लिए अनुकूल, क्योंकि अल्पसंख्यक वोट प्रभावित हो सकते हैं.

अजित पवार के पद (उपमुख्यमंत्री, वित्त मंत्री) खाली हैं. खेल मंत्री माणिकराव कोकाटे ने इस्तीफा दिया. वित्त मंत्रालय संभवतः मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को मिलेगा. दो पद खाली होने से विलय का दबाव बढ़ा है. प्रफुल्ल पटेल जैसे नेताओं ने अजित की पत्नी सुनेत्रा पवार को उपमुख्यमंत्री बनाने का सुझाव दिया, लेकिन वे राज्यसभा सदस्य हैं और राजनीतिक रूप से नई हैं. परिवार में महत्वाकांक्षाओं का टकराव जारी है. शरद पवार का राज्यसभा कार्यकाल अप्रैल में खत्म हो रहा है; वे सांसद न बनने की बात कह चुके हैं, लेकिन वापसी की जरूरत पड़ सकती है.

मोदी सरकार के दावे और सच्चाई में बढ़ी खाई

सुशांत सिंह ने टेलीग्राफ में लिखा है कि हाल तक भारत को विश्व मामलों का केंद्र बताया जाता था, लेकिन वास्तविकता में मोदी-जयशंकर की "लीडिंग पावर" वाली छवि खोखली साबित हो रही है. मोदी और जयशंकर दावा करते थे कि कोई बड़ा वैश्विक फैसला मोदी की मंजूरी के बिना नहीं होता. जयशंकर ने भारत को "बैलेंसिंग पावर" से "लीडिंग पावर" बनने की बात कही, जहां मोदी की "केमिस्ट्री" से अभूतपूर्व प्रभाव मिला. ट्रंप 2.0 से पहले जयशंकर ने कहा कि भारत ट्रंप से नर्वस नहीं है. लेकिन ट्रंप 2.0 में ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण भारत ने चाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट चुपचाप छोड़ दिया. यह प्रोजेक्ट रणनीतिक स्वयात्तता का प्रतीक था. अब भारतीय कंपनियां हिस्सेदारी बेच रही हैं, डायरेक्टर्स इस्तीफा दे रहे हैं.

सुशांत लिखते हैं कि ट्रंप के वेनेजुएला आक्रमण या ग्रीनलैंड दावे पर मोदी चुप रहे. अमेरिकी टैरिफ बने हुए हैं, भारतीय नागरिक हथकड़ी लगाकर निर्वासित हो रहे हैं. रूस ने सैकड़ों भारतीयों को यूक्रेन युद्ध में भर्ती किया, मोदी सरकार ने कोई मदद नहीं की. ईरान ने भारतीय नाविकों को हिरासत में रखा. चीन ने बॉर्डर पर अतिक्रमण और नागरिक अपमान जारी रखा, व्यापार घाटा 2014 के 37.8 अरब से 2025 में 116.1 अरब डॉलर पहुंच गया.

यूरोप ने रूसी तेल आयात पर फटकार लगाई, जयशंकर चुप रहे. घरेलू मोर्चे पर भारत अब पाकिस्तान-बांग्लादेश के साथ तुलना में देखा जाता है. नोटबंदी, कृषि कानून, कोविड कुप्रबंधन, प्रदूषण, मणिपुर हिंसा जैसी विफलताएं मोदी सरकार के नाम चस्पां हैं. विदेश नीति में सच्ची शक्ति "ना" कहना और नागरिकों-हितों की रक्षा करना होता है, लेकिन मोदी इसमें असफल रहे. दावों और वास्तविकता के बीच खाई बढ़ी है.

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सर्विस नहीं मैन्युफैक्चरिंग केंद्रित अर्थव्यवस्था वक्त की जरूरत

अनु रघुनाथन ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि भारत का वैश्विक सेवा क्षेत्र में उदय उसकी सबसे सफल आर्थिक उपलब्धियों में से एक है. आईटी सेवाएं, सॉफ्टवेयर निर्यात और ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटरों ने तीन दशकों तक बड़े पैमाने पर रोजगार, विदेशी मुद्रा और अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा प्रदान की, जिससे भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था में गहराई से जुड़ा. लेकिन अब सवाल यह है कि क्या सेवा-आधारित मॉडल भविष्य के लिए पर्याप्त है? सेवा-प्रधान अर्थव्यवस्था लोगों (श्रम) को स्केल करती है, जबकि उत्पाद-प्रधान अर्थव्यवस्था विचारों को स्केल करती है. उत्पाद ज्ञान को प्लेटफॉर्म, प्रक्रियाओं और विनिर्माण में अंतर्निहित करते हैं, जो कर्मचारियों की संख्या से स्वतंत्र रूप से बढ़ सकते हैं. ऑटोमेशन और एआई के कारण सेवा क्षेत्र की मार्जिन कम हो रही हैं, और श्रम-आधारित विकास की सीमाएं उजागर हो रही हैं. सेवाएं वैश्विक मूल्य श्रृंखला में नीचे रहती हैं—वे मांग का जवाब देती हैं, जबकि उत्पाद-स्वामित्व वाले देश बाजार बनाते हैं, मानक तय करते हैं और अधिक मूल्य हासिल करते हैं.

अनु लिखते हैं कि भारत की असली चुनौती क्षमता की नहीं, बल्कि वैश्विक स्थिति की है. बायोमैन्युफैक्चरिंग इस अंतर को दर्शाता है. भारत जेनेरिक दवाओं और फार्मा मैन्युफैक्चरिंग में विश्वसनीय है, लेकिन उन्नत बायोलॉजिक्स, इंजीनियर्ड एंजाइम्स, सस्टेनेबल केमिकल्स और सेल-थेरेपी जैसे क्षेत्रों में उत्पाद स्वामित्व और प्लेटफॉर्म नियंत्रण ज्यादातर विदेशी हाथों में है. यह विज्ञान की कमी नहीं, बल्कि स्केल-अप इंफ्रास्ट्रक्चर, जोखिम पूंजी और संस्थागत समर्थन की कमी है.

नेक्सकार 19 (भारत का पहला स्वदेशी CAR-T थेरेपी) इसका अपवाद है, जो दिखाता है कि अनुसंधान, उत्पादन, नियामक मंजूरी और मांग का संरेखण संभव है. ऐसे उदाहरण दुर्लभ हैं. अधिकांश लैब ब्रेकथ्रू प्रूफ-ऑफ-कॉन्सेप्ट से आगे नहीं बढ़ पाते. यह पैटर्न जैव प्रौद्योगिकी से आगे जलवायु-ऊर्जा (ग्रीन हाइड्रोजन, बायोफ्यूल) और स्वास्थ्य क्षेत्र में भी दिखता है, जहां भारत निर्माण तो करता है, लेकिन उन्नत तकनीकें आयात या लाइसेंस पर निर्भर रहता है. भारत निष्पादन में मजबूत है, लेकिन निष्पादन अकेले नियंत्रण या दीर्घकालिक मूल्य नहीं देता.

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मार्क टुली: भारत का लाडला, भारत की आवाज़

हिंदुस्तान टाइम्स में करण थापर लिखते हैं, मार्क टुली की मृत्यु एक पूरे युग का अंत है. दशकों तक बीबीसी के भारत में ब्यूरो चीफ के रूप में, उन्हें स्नेह से "भारत की आवाज" कहा जाता था. 1970 से 1990 के दशक में विदेश में रहने वाले लाखों भारतीयों के लिए वे घर की विश्वसनीय खबरों का एकमात्र स्रोत थे. ग्रामीण झोपड़ियों से राष्ट्रपति भवन तक उनका नाम बीबीसी से पहले याद किया जाता था. करण थापर बताते हैं कि इंग्लैंड में रहते हुए वे टुली के बीबीसी वर्ल्ड सर्विस प्रसारणों पर निर्भर रहते थे. शॉर्टवेव ट्रांजिस्टर से सुबह उनकी रिपोर्ट सुनकर भारत से जुड़े रहते थे, क्योंकि उस समय ब्रिटिश मीडिया भारत की कवरेज में बहुत सीमित था. 1990 के मध्य में रिटायरमेंट से पहले थापर उनसे मिले. टुली बड़े कद, गहरी आवाज और आकर्षक मुस्कान वाले थे, लेकिन अपेक्षा के विपरीत बेहद सुलभ, मित्रवत और बातूनी निकले.

1980 के दशक में थापर ने उनका टीवी इंटरव्यू लिया, जहां टुली नर्वस थे क्योंकि वे रेडियो के आदी थे, टीवी के नहीं. फिर भी वे बेहद प्रभावशाली रहे और बाद में ऑटोग्राफ के लिए घिर गए. टुली विचारशील थे—थापर के करियर के संकट में उन्होंने फोन कर उत्साहित किया और लंच पर भविष्य की संभावनाएं बताईं. उनकी ताकत हिंदी बोलना और भारत की गहरी समझ थी, जिससे उन्हें अद्वितीय अंतर्दृष्टि और पहुंच मिली. आलोचक उन्हें "नेटिव" कहकर आलोचना करते थे, लेकिन यह उनकी ताकत थी. भारत में टुली ही बीबीसी थे—लाखों लोग सिर्फ उन्हें सुनने के लिए ट्यून करते थे और उनकी बात पर पूरा भरोसा करते थे. राजीव गांधी ने इंदिरा की मौत तभी मानी जब टुली ने बीबीसी पर रिपोर्ट की. 2005 का पद्म भूषण उन्हें 2002 के नाइटहुड से ज्यादा प्रिय था. कलकत्ता में जन्मे, दिल्ली में अधिकांश जीवन बिताने वाले टुली ने कहा, "मैं भारत का बच्चा हूं." वे भारत के सर्वश्रेष्ठ पत्रकारों में से एक थे.

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