ADVERTISEMENTREMOVE AD
Members Only
lock close icon

संडे व्यू: त्योहार-क्रिकेट के बीच फंसे बेचारे 40 मजदूर, 'मायावी' व्यक्तित्व की इंदिरा

पढ़ें आज टीएन नाइनन, तवलीन सिंह, करन थापर, पी चिदंबरम और रामचंद्र गुहा के विचारों का सार.

Published: 
story-hero-img
i
Aa
Aa
Small
Aa
Medium
Aa
Large

मुफ्त उपहारों के पीछे नाकामी छिपाते राजनेता

बिजनेस स्टैंडर्ड में टीएन नाइनन ने 1996 में तत्कालीन वित्तमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात का हवाला दिया है. चुनाव में आर्थिक सुधारों की चर्चा होगी क्या?- इसके जवाब में डॉ. सिंह ने कहा था कि आर्थिक सुधारों पर बात नहीं करेंगे तो करेंगे क्या? मगर, बाद के दौर में चुनाव के दौरान जो मुद्दे चर्चा के विषय रहे हैं, उनमें बट्टे खाते में कर्ज को डालना, बाजार मूल्य से अधिक कीमत पर अनाज की खरीद, मुफ्त खाद्यान्न वितरण, नौकरियों में आरक्षण, पेंशन और फ्रीबीज के साथ-साथ लगातार नकदी का वितरण शामिल हैं. शौचालय, बिजली, इंटरनेट संचार उपलब्ध कराने के लिए भी श्रेय लिया जाता है. अर्थशास्त्री जिसे सुधार कहते हैं, वो मार्केट ओरियंटेड होता है और जिसमें राजकोषीय अनुशासन होता है, वह कभी जगह नहीं पा सका.

नाइनन लिखते हैं कि:

मतदाता जान गए हैं कि कल की प्रतीक्षा करना व्यर्थ है. सरकारों पर इतना अविश्वास है कि स्कूली शिक्षा में सुधार या सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार जैसे दीर्घकालिक विकास के मुद्दों से जुड़े वादों की अनदेखी कर दी जाती है. कृषि, बेरोजगारी और कम आय जैसी वास्तविक समस्याओं को लेकर कोई ठोस और विश्वसनीय हल पेश नहीं किया जाता है. बिहार में 13.1 करोड़ की आबादी में 20 लाख सरकारी नौकरियां हैं. इन नौकरियों में भी सामान्य वर्ग के लोगों की संख्या असंगत रूप से अधिक है और कुछ हद तक ये नौकरियां पिछड़ा वर्ग के लोगों के पास हैं.
Become a Member to unlock
  • Access to all paywalled content on site
  • Ad-free experience across The Quint
  • Listen to paywalled content
  • Early previews of our Special Projects
×
×