बिहार के वोटर लिस्ट में संशोधन पर चिंता
करन थापर ने हिन्दुस्तान टाइम्स में लिखा है कि 24 जून को चुनाव आयोग द्वारा बिहार की मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) के आदेश ने गंभीर चिंताएं और परेशान करने वाले सवाल उठाए हैं. क्या इससे संभवतः करोड़ों लोग मताधिकार से वंचित हो जाएंगे? क्या गरीब और हाशिए पर रहने वाले समुदाय सबसे अधिक प्रभावित होंगे? और क्या इस समय इसकी आवश्यकता थी? हालांकि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम आयोग को किसी भी समय और किसी भी तरह से विशेष संशोधन करने का अधिकार देता है, फिर भी क्या बिहार में विधानसभा चुनाव से सिर्फ चार महीने पहले इसे करना उचित था?
थापर आगे लिखते हैं कि 2003 में, विशेष गहन संशोधन चुनाव से दो साल पहले किया गया था, न कि चार महीने पहले. ये निश्चित रूप से समय के सवाल हैं, लेकिन ये उस प्रक्रिया पर भी काले बादल मंडराते हैं जो आगे होगी. ये आगे बढ़ने के बजाय पुनर्विचार करने के कारण हैं. चिंताएं समय से परे प्रक्रिया तक फैली हुई हैं. घर-घर सत्यापन और अपडेट से जुड़े इस गहन संशोधन से अनजाने में वैध मतदाता बाहर हो सकते हैं, खासकर वे जिनके पास पहचान दस्तावेजों तक आसान पहुंच नहीं है, जैसे प्रवासी मजदूर, दिहाड़ी श्रमिक और ग्रामीण आबादी.
ऐतिहासिक आंकड़े बताते हैं कि ऐसे संशोधन अक्सर हाशिए पर रहने वाले समुदायों को असमान रूप से प्रभावित करते हैं, जिनके पास नौकरशाही बाधाओं को पार करने के लिए संसाधन या जागरूकता की कमी हो सकती है. उदाहरण के लिए, पहले के संशोधनों में मतदाता सूची में त्रुटियां—जैसे नामों की गलत वर्तनी या गलत पते—के कारण कई लोगों का नाम हट गया, जिससे वे मतदान करने में असमर्थ रहे.
बिहार में किसानों की दुर्दशा और नीतिगत नाकामी
पवन खेड़ा ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि पिछले हफ्ते वे बिहार में थे. एक युवा किसान, राजू सिंह, ने हाथ जोड़कर उनका स्वागत किया, लेकिन उनकी मुस्कान उनकी आँखों तक नहीं पहुँची. “सर, बिजली कभी आती है, कभी नहीं. अब DAP (डाई-अमोनियम फॉस्फेट) भी गायब है. अब बताइए, क्या उगाएँ? क्यों उगाएँ?” “क्यों खेती करें?” यह सवाल दिल्ली के नीति निर्माताओं को बेचैन कर देना चाहिए. जब किसान यह सोचना बंद कर दें कि क्या उगाना है और क्यों उगाना है, तो यह कृषि संकट नहीं, बल्कि राष्ट्रीय मनोबल के ह्रास का संकट है. राजू अकेले नहीं हैं.
सिवान, समस्तीपुर, दरभंगा में किसानों की एक ही कहानी है: उर्वरक के लिए कतारें, लेकिन “इंतज़ार करो” का जवाब. निजी एजेंट काउंटर के नीचे कीमतें बढ़ा रहे हैं. स्थानीय मंडी रिपोर्ट्स के अनुसार, कुछ ने DAP को 1,750 रुपये प्रति बोरी—निर्धारित मूल्य से 400 रुपये अधिक—में खरीदा. कई ने हार मान ली. भारत में उर्वरक स्टॉक पिछले साल की तुलना में आधा है.
पवन खेड़ा आगे लिखते हैं कि खरीफ बुवाई के मौसम में DAP और विशेष उर्वरकों की कमी किसानों की कमर तोड़ रही है. आत्मनिर्भर भारत के नारे उठे, लेकिन कृषि जैसे प्राथमिक क्षेत्रों में यह भावना नहीं दिखती. इसे वैश्विक ताकतों का दोष बताया जाता है, लेकिन यह भारत-विशिष्ट प्रतिबंध है. चीन व्यापार को हथियार बनाकर क्षेत्रीय विवाद सुलझाने की रणनीति अपनाता है. 2010 में, सेनकाकू द्वीप विवाद के बाद, चीन ने जापान को दुर्लभ पृथ्वी तत्वों का निर्यात रोका था. भारत का भी चीन के साथ अनसुलझा क्षेत्रीय विवाद है. यह भारत को दबाने की चीन की रणनीति है. मोदी सरकार ने अभी तक चीन की आलोचना नहीं की. CII ने इंडिया रेयर अर्थ मिशन की सलाह दी, लेकिन इसे नज़रअंदाज़ किया गया. हाल के महीनों में ही केंद्र ने इस पर कार्रवाई शुरू की—जो बहुत कम और देर से है. भारतीय कृषि को पीक सीजन में नुकसान हो रहा है. पिछले 11 वर्षों में नीतियों के नाम पर केवल पुनर्ब्रांडेड योजनाएँ और नारे मिले.
महाराष्ट्र में पिछले तीन महीनों में 750 से अधिक किसानों ने आत्महत्या की. उर्वरक की कमी फल और सब्जियों की कीमतें बढ़ाएगी, जिससे ग्रामीण भारत में खाद्य मुद्रास्फीति बढ़ेगी और शहरी मध्यम वर्ग प्रभावित होगा. बिहार जैसे राज्य, जो पहले से ही पोषक तत्वों से भरपूर फसलों के आयातक हैं, सबसे अधिक प्रभावित होंगे.
यह विदेशी ताकतों का नहीं, बल्कि भारतीय नीति निर्माताओं की नाकामी है, जिन्होंने आत्मनिर्भरता का वादा किया और निर्भरता दी. देशभर के किसान, मज़दूर और परिवार BJP की प्रचार रणनीति को समझ रहे हैं. वह दिन दूर नहीं जब वे BJP की उदासीनता का जवाब लोकतंत्र में एक शांत, निर्णायक सबक के साथ देंगे.
टाटा-ममता में दोस्ती!
इंद्रजीत हाजरा ने द इकोनॉमिक टाइम्स में लिखा है कि पिछले पखवाड़े में अतीत और भविष्य को जोड़ने वाली घटनाएँ घटीं. 4 जुलाई को कार्डिफ में ओएसिस का पुनर्मिलन और 5 जुलाई को बर्मिंघम में ब्लैक सब्बाथ का अंतिम कॉन्सर्ट हुआ. लेकिन 9 जुलाई को कोलकाता में टाटा सन्स के चेयरमैन नटराजन चंद्रशेखरन और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की मुलाकात अधिक महत्वपूर्ण थी. यह 14 साल में टाटा चेयरमैन और बंगाल सीएम की पहली बैठक थी, जो सिंगुर विवाद के बाद हुई, जब ममता ने टाटा मोटर्स को राज्य से बाहर किया था. 16 साल बाद ओएसिस भाइयों और 20 साल बाद ओज़ी ऑस्बॉर्न की वापसी से भी यह मुलाकात बंगाल के आर्थिक इतिहास के लिए अधिक भाग्यशाली लगती है.
हाजरा लिखते हैं कि ममता के बंगाल ग्लोबल बिजनेस समिट में कॉरपोरेट्स एमओयू पर हस्ताक्षर करते हैं, लेकिन निवेश अक्सर हकीकत नहीं बनता. टीएमसी ने इस बैठक को नवाचार और निवेश के लिए बंगाल की प्रतिबद्धता बताया, लेकिन सिंगुर का भूत और बंगाल की व्यवसाय-विरोधी संस्कृति संदेह पैदा करती है. कोलकाता की खराब सड़कें और ढहता बुनियादी ढांचा बंगाल की समस्याओं का प्रतीक है. निवेश के वादों के बावजूद, लालफीताशाही और श्रमिक संघ निवेशकों को डराते हैं. फिर भी, बंगाल का शिक्षित कार्यबल और रणनीतिक स्थान इसे आकर्षक बनाता है.
टाटा की वैश्विक महत्वाकांक्षाएँ—एयर इंडिया अधिग्रहण, टीसीएस विस्तार—बंगाल को अवसर दे सकती हैं. ममता की राजनीतिक चतुराई और चंद्रशेखरन की व्यावसायिक दृष्टि इस मुलाकात को टर्निंग पॉइंट बना सकती है. लेकिन जब तक वास्तविक निवेश नहीं होता, यह एक और स्वीट एमओयू ही रहेगा. बंगाल को सड़कों, नीतियों और धन के प्रति मानसिकता में बदलाव चाहिए. यह मुलाकात शुरुआत हो सकती है, अगर इतिहास खुद को न दोहराए.
कट्टर हुई मुंबई
रामचंद्र गुहा ने टेलीग्राफ में लिखा है कि 2006 में उन्होंने टाइम आउट मुंबई में लिखा था कि एक शहर को "विश्व शहर" कहलाने के लिए विशाल आकार, ऐतिहासिक गहराई, समृद्ध सांस्कृतिक जीवन, सामाजिक विविधता और आर्थिक शक्ति की आवश्यकता होती है. लेखक मानते हैं कि केवल लंदन, न्यूयॉर्क और मुंबई इस श्रेणी में आते हैं.
न्यूयॉर्क के मेयर पद के लिए जोहरान ममदानी के अभियान ने उन्हें यह याद दिलाया कि मुंबई ने छह मुस्लिम मेयर देखे हैं, पहला 1934 में और आखिरी 1963 में. इस तरह मुंबई कई मायनों में लंदन और न्यूयॉर्क से आगे है. यह लेख बॉम्बे के एक मुस्लिम मेयर, यूसुफ मेहरल्ली, पर केंद्रित है, जिनकी मृत्यु जुलाई 1950 में हुई.
रामचंद्र गुहा आगे लिखते हैं कि 1903 में जन्मे मेहरल्ली ने एल्फिंस्टन कॉलेज में पढ़ाई की और स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रहे. 1928 के साइमन कमीशन विरोध और 1930 के नमक सत्याग्रह में उनकी भूमिका उल्लेखनीय थी. उन्हें अपने राजनीतिक विचारों के कारण वकालत का लाइसेंस नहीं मिला. 1934 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के नेता के रूप में, उन्होंने श्रमिक अधिकारों और औपनिवेशिक-विरोधी आंदोलनों को बढ़ावा दिया.
1942 में बॉम्बे के मेयर बने मेहरल्ली ने गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन का स्वागत किया. कहा जाता है कि उन्होंने "भारत छोड़ो" और "साइमन वापस जाओ" जैसे नारे गढ़े. जेल में उन्होंने अपनी डायरी में लाला लाजपत राय और भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों की स्मृति को दर्ज किया.
अमेरिकी पत्रकार बरट्राम वोल्फ के साथ उनकी दोस्ती ने उनके मानवतावादी समाजवाद को उजागर किया, जो गांधी के प्रभाव से प्रेरित था.मेहरल्ली की निःस्वार्थता और मानव कल्याण के प्रति समर्पण ने उन्हें असाधारण बनाया. उनकी मृत्यु ने विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं को एकजुट किया. हालांकि, मुंबई की बढ़ती कट्टरता के कारण अब उनके जैसा मेयर चुनना मुश्किल लगता है.
ऊर्जा की जरूरत में आर्टिफिशिएल इंटेलिजेंस
गॉडविन पॉल एडम्स और एंजेलिना चौमुआ ने द हिन्दू में लिखा है कि भारत में ऊर्जा की मांग तेजी से बढ़ रही है. इस जरूरत को पूरा करने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग बढ़ेगा और भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था एवं तेजी से विकसित शहरी परिदृश्य के साथ 2030 तक ऊर्जा खपत दोगुनी होने की उम्मीद है. अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने ऐसा अनुमान लगाया है.
इस मांग को टिकाऊ ढंग से पूरा करने के लिए, भारत सरकार ने 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता और 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है, जो पेरिस समझौते के तहत जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने, ऊर्जा सुरक्षा बढ़ाने और वायु गुणवत्ता सुधारने की प्रतिबद्धता के अनुरूप है.
एडम्स और एंजेलिना लिखते हैं कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ऊर्जा प्रबंधन को अनुकूलित करने में महत्वपूर्ण उपकरण के रूप में उभर रहा है, जिसमें रखरखाव से लेकर ग्रिड संतुलन शामिल है. हालांकि, AI के ऊर्जा क्षेत्र में अपार संभावनाओं के बावजूद, खराब डेटा गुणवत्ता और सीमित AI अवसंरचना जैसे अवरोध इसके प्रभावी कार्यान्वयन में बाधा हैं.
भारत का बिजली क्षेत्र विश्वसनीयता, ग्रिड स्थिरता और ऊर्जा हानि जैसे महत्वपूर्ण चुनौतियों का सामना कर रहा है. नवीकरणीय क्षमता वृद्धि के बावजूद, ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन (T&D) हानि कुल उत्पन्न बिजली का 20%-30% है. 75% बिजली कोयले से प्राप्त होने के कारण, यह क्षेत्र ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में बड़ा योगदान देता है. डीकार्बनाइजेशन और बढ़ती मांग को समर्थन देने के लिए, AI-संचालित समाधान महत्वपूर्ण हैं. AI मांग के उतार-चढ़ाव की भविष्यवाणी, नवीकरणीय ऊर्जा एकीकरण और वास्तविक समय निगरानी के माध्यम से T&D हानि को कम कर सकता है.
उदाहरण के लिए, AI एल्गोरिदम उपकरण विफलताओं का पहले से पता लगा सकते हैं, जिससे डाउनटाइम और रखरखाव लागत कम होती है. AI-संचालित स्मार्ट ग्रिड सौर और पवन जैसे रुक-रुक कर चलने वाले स्रोतों को संतुलित कर सकते हैं. AI का पूर्ण लाभ उठाने के लिए, भारत को प्रमुख अवरोधों को दूर करना होगा. प्रभावी AI मॉडल के लिए उच्च-गुणवत्ता, मानकीकृत डेटा आवश्यक है, लेकिन कई उपयोगिताओं में असंगत या अपूर्ण डेटा की समस्या है. सार्वजनिक-निजी भागीदारी, सरकारी प्रोत्साहन और अंतरराष्ट्रीय सहयोग प्रगति को तेज कर सकते हैं. इन चुनौतियों को पार करके, भारत AI का उपयोग कर अपने नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्यों को प्राप्त कर सकता है, उत्सर्जन कम कर सकता है, और एक टिकाऊ, विश्वसनीय ऊर्जा भविष्य सुनिश्चित कर सकता है.
